नया साल लगभग आ पहुंचा है। यह नयेपन की मुनादी होने के बावजूद, पता नहीं क्यों, बहुत कुछ पुराना- पुराना सा लग रहा है। मदिरादि की भरपूर व्यवस्था तो हो ली है लेकिन उसे हलक से नीचे उतारने के लिए नमकीनादि का इंतजाम सरकार पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के तहत कर देती तो जरा बात भरपूर बन जाती । वैसे बधाइयों से मुंह और व्हाट्सएप्प भरा हुआ है ,उगलने लायक कुछ खट्टे मीठे कसैले और चरपरे वचन एआई चालित किसी वेंडिंग मशीन के जरिये ठोंगे में उपलब्ध हों जाएँ फिर तो क्या कहने। जरा बल्ले बल्ले हो जाये। अब वही चीज सुहाती है जी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिये आती है। आनंद वही जो तकनीक से प्रकट हो।
व्यतीत हो चुके साल को अपनी गति से अधोगति की ओर जाने दें। बहुत हो लिया निरर्थक विमर्श अब कुछ रसपगा हो जाए तो बात बनती सी समझ में आये ।सहिष्णुता असहिष्णुता कहने में जुबान अटकती है इसलिए प्रति सप्ताह दो की दर से अमरीका के ट्रम्प से इस्तीफे की मांग को सुसभ्य राजनीतिक आचरण मान लें तो इसमें हर्ज क्या है।
पुराने साल में हम बात-बेबात जरूरत से जयादा संजीदा होते रहे। सीरियसनैस को काम तमाम करने वाली सरकार,बैंक या अस्पताल वालों के लिए छोड़ दें तो कितना अच्छा। वे बीमार ग्राहक और तीमारदार की जेब के हिसाब से जो करना हो करें। यदि यह संभव न हो तो उसे उस प्रभु इच्छा पर बिंदास छोड़ दें जिसके अस्तित्व पर सवालिया निशान है। बात सिर्फ इतनी है कि बीमारी और राजनीति को पूरी खेल भावना से लें। बस इसमें एक्शन रीप्ले और डीआरएस की व्यवस्था हो जाए तो क्या कहने। जब जी चाहा स्लो मोशन में घुमा फिरा कर बीते वक्त को देख लिया और डीआरएस से जब जी चाहा विधि के विधान को उलट-पलट दिया।
राजनीति में खेल के सारे तत्व मौजूद हैं,बस भावना नदारद है।गेम तो खूब हो रहे हैं पर जेंटिलमैन दिखाई नहीं दे रहे, जैसे कभी क्रिकेट या लखनवीअंदाज में दृष्टिगोचर हुआ करते थे। मुल्क की राजनीति दिल्ली के ट्रेफिक जैसी हो ली है।ऊपर से सीटबेल्ट कसे और हैलमेट लगाये लेकिन बीच बीच में मौका ताड़ कर बीट कांस्टेबिल को धता बता कर शार्टकट पकड़ती।
नए साल में लगे हाथ महिलाओं के पहनावे को लेकर मुंह बिचकाने और नाक भौं सिकोड़ने के लिए मिलीमीटर के सौवे भाग तक की एक्यूरेसी वाले मानक भी तय हो जाएँ तो सारा झंझट ही खत्म हो जाए। इस तरह के दर्शनीय विवाद में इंचीटेप के जरिये मामले का निबटारा हो जाएगा।सुसपष्ट तरीके से पता चल जाएगा कि किस पहनावे से किस मजहब की कितनी हेठी हुई या फिर होते झ्रहोते बाल बाल बच गयी। बात सिर्फ बचने-बचाने की है, नैतकिता का कोई मुद्दा नहीं।
यदि ऐसा हो पाए तो बाय गॉड हैप्पी वाला न्यू ईयर मन जाए। न्यू इयर को वैसे तो किसी घाघ मेहमान की तरह हमेशा की तरह आ पसरना ही है।

