
वृक्षारोपण और प्राकृतिक वन के बीच पारिस्थितिक अंतर को समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। आधिकारिक रिपोर्टें भले कुल वन आच्छादन में स्थिरता या मामूली वृद्धि का संकेत दें, किंतु विशेषज्ञ लगातार यह रेखांकित कर रहे हैं कि वृक्षारोपण से तैयार हरियाली और प्राकृतिक, बहुस्तरीय, जैविक रूप से समृद्ध वन एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। प्राकृतिक वन सैकड़ों वर्षों में विकसित होते हैं, जिनमें पेड़-पौधों, सूक्ष्मजीवों, कीटों, पक्षियों और स्तनधारियों का जटिल पारिस्थितिक जाल मौजूद रहता है। इसके विपरीत, एकल प्रजाति आधारित वृक्षारोपण या वाणिज्यिक प्लांटेशन अक्सर जैव विविधता की दृष्टि से सीमित होते हैं। इसी बुनियादी अंतर को नजरअंदाज करने का परिणाम है कि देश जैव विविधता के गहराते संकट से जूझ रहा है।
जूलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया और बॉटनिकल सर्वे आॅफ इंडिया के अभिलेखों के अनुसार देश में 96,000 से अधिक जीव-जंतुओं और लगभग 47,000 पौधों की प्रजातियां दर्ज हैं। देश के 10 प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्रों—वर्षावन, रेगिस्तान, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां, घासभूमियां और पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र—में विशिष्ट जैविक संपदा मौजूद है।
पेड़ और जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि पृथ्वी की जीवन रक्षक प्रणाली का आधार हैं। स्थलीय जैव विविधता का बड़ा हिस्सा वनों पर निर्भर है। प्राकृतिक वन कार्बन डाइआॅक्साइड को अवशोषित कर जलवायु को संतुलित रखते हैं, मृदा अपरदन रोकते हैं, जलस्रोतों को संरक्षित करते हैं और असंख्य प्रजातियों को भोजन व आश्रय देते हैं। किंतु जब प्राकृतिक वन कटते हैं और उनकी जगह एकल प्रजाति के वृक्षारोपण लगाए जाते हैं, तो पारिस्थितिकीय जटिलता और जैविक विविधता का वह स्तर पुनर्स्थापित नहीं हो पाता। यही कारण है कि ‘नेट फॉरेस्ट कवर’ में वृद्धि के बावजूद जैव विविधता में गिरावट की चिंता व्यक्त की जा रही है। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित नहीं किया गया तो इस सदी के अंत तक प्रवाल भित्तियों का बड़ा हिस्सा समाप्त हो सकता है। सुंदरवन के मैंग्रोव वन समुद्र-स्तर वृद्धि और चक्रवातों से जूझ रहे हैं।
हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुए जैसी प्रजातियां आवासीय क्षेत्र में बदलाव और मानवीय दबाव के कारण संवेदनशील स्थिति में हैं। कीट-पतंगों और परागण तंत्र के जीवनचक्र में बदलाव के संकेत मिले हैं, जो कृषि उत्पादन पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ों की कटाई लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। उत्तराखंड में सड़क, रेल और सुरंग परियोजनाओं को लेकर व्यापक सार्वजनिक बहस हुई है। मध्य प्रदेश में नई रेल लाइन के लिए 1.24 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। सिंगरौली के घिराली कोल ब्लॉक में कोयला खनन ने वन क्षेत्र को प्रभावित किया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में अनेक योजनाओं से जंगल सिमट रहे हैं। कर्नाटक और तेलंगाना में भी विभिन्न परियोजनाओं के लिए हजारों पेड़ों की कटाई को स्वीकृति मिली है। अंडमान-निकोबार के ग्रेट निकोबार विकास परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आकलन में लाखों पेड़ों की कटाई का अनुमान व्यक्त किया गया है। झारखंड की कारो ओपन कास्ट परियोजना के लिए भी हजारों पेड़ों की कटाई को मंजूरी मिली है, जिससे वन्यजीव आवास और पर्यावरण संतुलन पर प्रश्न उठे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार 1990 से 2020 के बीच विश्व स्तर पर करोड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र का शुद्ध ह्रास हुआ है। भारत में आधिकारिक आंकड़े कुल वन आच्छादन में स्थिरता दर्शाते हैं, किंतु विशेषज्ञों का मत है कि प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता और जैव विविधता का स्तर कम होने की प्रवृत्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वृक्षारोपण और प्राकृतिक वन के बीच यही पारिस्थितिक अंतर नीति-निर्माण के केंद्र में होना चाहिए।
पक्षियों और अन्य वन्यजीवों की अनेक प्रजातियां अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में संकटग्रस्त श्रेणी में दर्ज हैं। तटीय राज्यों में औद्योगिक विकास से मैंग्रोव और समुद्री कछुओं पर दबाव बढ़ा है। अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच ने आक्रामक बाहरी प्रजातियों को जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा बताया है, क्योंकि वे स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। स्पष्ट है कि जल, जंगल और जमीन का प्रश्न केवल हरित आच्छादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वास्तविक चुनौती प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की संरचना, उनकी जैविक विविधता और उनकी पुनरुत्पादक क्षमता को सुरक्षित रखने की है। वृक्षारोपण महत्वपूर्ण है, परंतु वह प्राकृतिक वनों का विकल्प नहीं हो सकता। जब तक नीति और विकास की प्राथमिकताओं में इस पारिस्थितिक अंतर को समझकर शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक जैव विविधता का संकट गहराता ही जाएगा।

