हमारे देश में जनता के घबराने का असली कारण कोई संकट नहीं, बल्कि सरकार का आश्वासन होता है। जैसे ही सरकारी नुमाईंदे ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा कि आम जन परेशान न हों , पेट्रोल और रसोई गैस का पर्याप्त भंडार है—जनता तुरंत समझ गई कि दाल में कुछ काला है। दरअसल जनता का अनुभव बहुत समृद्ध है। उसने नोटबंदी के समय भी यही सुना था—‘घबराने की कोई जरूरत नहीं, बैंकों में पर्याप्त नकदी है’—और अगले ही दिन लोग ऐसे भागे कि बैंकों के सामने की कतारें किलोमीटर छूने लगीं। इसी भागमभाग में कई लोग कतारों में लगे-लगे ही परलोक सिधार गए। फिर कोविड लॉकडाउन के समय कहा गया—‘जो जहां है वहीं रहे, प्रशासन पूरी खबर लेगा’—तो लोग इतने घबरा गए कि हजार-हजार किलोमीटर दूर बीवी-बच्चों सहित पैदल ही निकल पड़े।
इसीलिए जब हाल में सरकार ने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि देश में पेट्रोल और रसोई गैस की कोई किल्लत नहीं है, तब तक जनता पूरी तरह शांत थी। लोग अपने काम से आ-जा रहे थे। लेकिन जैसे ही यह बयान आया, पुरानी घटनाएं चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूमने लगीं। अचानक पेट्रोल पंपों पर वाहनों की बाढ़ आ गई। पहले जहां दस-पांच लोग आते थे, अब संख्या दस गुना हो गई। लोग गाड़ियों के साथ जरीकेन भी ले आए। कारण साफ था—सरकार ने कह दिया है कि समस्या नहीं है, मतलब समस्या गंभीर है। पेट्रोल पंप वाले भी कम अनुभवी नहीं हैं। उन्हें पता है कि सरकारी आश्वासन के बाद ही भीड़ उमड़ती है। इसलिए उन्होंने भी कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द कर दीं और अतिरिक्त इंतजाम कर लिए। उनका अनुभव कहता है कि ‘सब ठीक है’ का मतलब है—‘अब सब ठीक नहीं रहने वाला।’
रसोई गैस की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। पहले लोग सिलेंडर खत्म होने का इंतजार करते थे, अब आधा भरा देखकर ही दूसरा बुक कर देते हैं। घरवाली का फरमान साफ है—‘सिलेंडर लेकर ही घर आना, वरना बाहर ही रात काट लेना।’ नतीजा यह कि आदमी पूरी तैयारी से निकलता है—गुटखा, बिस्किट, अखबार और मोबाइल चार्जर के साथ। लोग कहते हैं कि पेट्रोल की लाइन में आदमी ज्यादा परेशान होता है, और गैस की लाइन में खड़े लोग दार्शनिक हो जाते हैं। वहां खड़े-खड़े जीवन का सार समझ में आ जाता है—हम जी क्यों रहे हैं? ताकि गैस मिले और दाल पक सके।
सरकार भी बड़ी दुविधा में रहती है। जब कोई संकट आता है और जनता बिल्कुल नहीं घबराती, तब सरकार खुद घबरा जाती है—‘ये लोग इतने शांत क्यों हैं?’ और फिर एक बयान जारी करती है—‘घबराने की आवश्यकता नहीं है।’ यह एक अजीब मनोविज्ञान है—सरकार चुप रहे तो जनता शांत रहती है, और जैसे ही वह कहती है ‘सब ठीक है’, लोगों को लगता है कि जरूर कुछ ठीक नहीं है। इसलिए गंगाधर की सलाह है कि संकट के समय अनावश्यक आश्वासन देने से बचना चाहिए, क्योंकि हमारे यहां आश्वासन सूचना नहीं, चेतावनी की तरह काम करता है।

