
भारत के खिलाफ 23-24 अप्रैल की हालिया टिप्पणी और उससे पलटने से यह साफ हो गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी सनक या आवेग में बिना सोचे समझे टिप्पणी या निर्णय करते हैं और फिर उससे पलटने में देरी भी नहीं करने वाले आधुनिक युग के सबसे सनकी नेता बन गए हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल पर रेडियो होस्ट की टिप्पणी भारत और चीन को हेलहोल यानी की नरक का द्वार को रीपोस्ट करके विवादों में आ गए और भारत के कड़े विरोध और अमेरिका में ही पक्ष-प्रतिपक्ष की प्रतिक्रियाओं और नस्लीय टिप्पणी देखते हुए भारत को महान और दोस्त देश बताने में कोई देरी नहीं की। पर एक बात साफ हो चुकी है कि इतिहास में तुगलकी निर्णयों की चर्चा को कई बार अतिवादी मान भी लिया जाए पर ट्रंप ने यह सिद्ध कर दिया है कि इतिहास में ट्रंप जैसे सनकी और आवेश में निर्णय लेने और फिर उनके परिणामों से समूचे विश्व को संकट में ड़ालने वाला संभवत: दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा।
हिटलर या मुसोलिनी जैसे तानाशाहों के उदाहरण दिए जाते हैं पर ट्रंप इन सबसे अलग, दुनिया के देशों को डराने, धमकाने, दादागिरी, गुंडागिर्दी और अपने ही निर्णयों से पलटने वाला राष्ट्राध्यक्ष संभवत: ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। एक बात ट्रंप को समझ लेनी चाहिए कि केवल अमेरिका फर्स्ट के नारे से अधिक दिनों तक नहीं चला जा सकता। यही कारण है कि आज दुनिया के करीब-करीब सभी देश ट्रंप से गले तक भर आए हैं। अमेरिकी-ईरान युद्ध के चलते आज दुनिया के सामने संकट का जो दौर आया है, उससे अमेरिका भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। एक तरफ र्इंधन का संकट आ रहा है तो तनाव के चलते व्यापार प्रभावित हो रहा है, आने वाले समय में खाद्यान्नों सहित दवा व अन्य आवश्यक वस्तुओं की कमी से भी दुनिया के देशों को दो-चार होना पड़ जाएगा।
दरअसल आज ट्रंप पेपर टाइगर की भूमिका में होते हुए समूचे दुनिया को तनाव के दौर में धकेल दिया है। मजे की बात यह है कि करीब सवा साल के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और दुनिया के देशों में अपनी स्वीकार्यता के सबसे नीचले पायदान पर पहुंच चुके हैं। ईरान से टकराव के बाद केवल एक माह में ही स्वीकार्यता में दस प्रतिशत की गिरावट स्वयं सोचने को मजबूर कर देना चाहिए। इसी माह अप्रैल की ताजा रिपोर्टस की बात की जाए तो न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार 39 प्रतिशत, रॉयटर के अनुसार 36 प्रतिशत और एपी के अनुसार 33 प्रतिशत वैश्विक स्वीकार्यता रह गई है। यदि अमेरिका की ही बात करें तो आर्थिक नीतियों के चलते असन्तोष मुखर होता जा रहा है। अधिकांश अमेरिकी ईरान संघर्ष को लेकर भी ट्रंप की निर्णय से संतुष्ट नहीं है। दरअसल ट्रंप की नीतियां अमेरिका सहित दुनिया के देशों में अस्थिरता और तनाव पैदा करने वाली है।
ईरान को तबाह करने की घोषणा और ईरान के विद्युत और आॅयल संयत्रों को नष्ट करने की धमकी और उसके बाद हार्मुज जलडमरुमध्य को लेकर धमकी और फिर सीज फायर की बात करना और ईरान द्वारा समझौते की टेबल पर सकारात्मकता नहीं होने की स्थिति में अमेरिका की लगातार हेटी हो रही है। वैसे देखा जाए तो रूस यूक्रेन युद्ध को हवा देने और फिर जेलेंस्की को धमकाने व जेलेंस्की की अमेरिका में ही ठेगा दिखाना अमेरिका के लिए कम शर्मनाक हालात नहीं रहे हैं। नाटों से हटने की धमकी, वेनेजुएला पर आक्रमण और वहां के राष्ट्राध्यक्ष के साथ व्यवहार, चीन के साथ व्यापार युद्ध, भारत को बार बार टैरिफ गीदड़ भभकी, कनाड़ा का अमेरिका का राज्य घोषित करने, ग्रीनलैण्ड हथियाने का प्रयास, गाजा पट्टी, क्यूबा आदि से संबंधित सभी भभकियां भभकियां ही साबित हुई है और इससे कहीं ना कहीं अमेरिका और ट्रंप की विश्वसनीयता में कमी ही आई है।
अब तो सवाल यह उठने लगा है कि पलटू राम की गीदड़ भभकियों का कुछ असर भी रहेगा या नहीं। क्योंकि आज के जमाने में छोटे से छोटे देश को भी हल्के में नहीं लिया ज सकता है। यह भी सही है कि आज यदि जंग छेड़ते हैं तो दो चार दिन में फैसला हो जाएगा यह सोचना ही गलत होगा। इसका ताजातरीन उदाहरण रूस यूक्रेन तो है ही अब ताजा उदाहरण अमेरिका-इस्राइल और ईरान संघर्ष को देखा जा सकता है। इसलिए पाकिस्तान पर आपरेशन सिंदूर या सर्जिकल स्ट्राइक जैसी प्रतिक्रिया ही सबक सिखाने में सफल हो सकती है। लंबी जंग लड़ने की स्थिति में दुनिया का कोई देश नहीं है। आज अमेरिका ईरान संघर्ष में ईरान से अधिक हानि अमेरिका को ही उठानी पड़ रही है और ट्रंप ऐन केन प्रकारेण जंग को रुकवाने व सीज फायर के प्रयास कर रहे हैं। पर ट्रंप को यह सोच लेना चाहिए कि डर या धमकियां से नतीजा नहीं निकलने वाला है। दूसरा ट्रंप के ट्रेक रिकार्ड को देखते हुए उनकी कही बात पर लंबे समय तक विश्वास भी नहीं किया जा सकता। इसलिए ट्रंप को पहले विश्वसनीयता बनाने के ठोस प्रयास करने होंगे।

