ये लो कर लो बात। विधानसभा चुनाव का वर्तमान चक्र पूरा भी नहीं हुआ है। और तो और बंगाल से मोदी जी और शाह जी के लश्कर अभी दिल्ली लौटे भी नहीं हैं। अभी तो आधे बंगाल में वोट भी नहीं पड़े हैं। और विरोधियों ने एक बार फिर, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव पेश कर दिया है। वैसे, हमें नहीं लगता है कि ज्ञानेश कुमार की रातों की नींद पर ऐसे प्रस्तावों का कोई असर पड़े वाला है। मोदी जी के विरोधियों ने कुछ महीने पहले भी ऐसा ही प्रस्ताव पेश किया था और राज्य सभा तथा लोकसभा, दोनों में ही प्रस्ताव पेश किया था। लेकिन, क्या हुआ? मोदी जी की कृपा बनी रहे, ऐसे सौ प्रस्ताव भी आ जाएंगे, तो संसद के सदनों के सभापतियों के हाथों, कूड़ेदान की ही शोभा बढ़ाएंगे! और विरोधी महाभियोग-महाभियोग का इतना शोर मचा क्यों रहे हैं? माना कि विरोधियों की इस तरह की भी शिकायतें हैं कि ज्ञानेश गुप्ता के चुनाव आयोग ने निष्पक्षता की चुनरिया तो उतार कर ही रख दी है। कहते रहो, क्या फर्क पड़ता है?
असली शिकायत यह है कि चुनाव आयोग सर के नाम से राज्य-राज्य में कैंची चला रहा है और मतदाता सूचियों से लाखों वोटरों के नाम उड़ा रहा है। और आंख मूंदकर नहीं, छांट-छांटकर वोटरों के नाम उड़ा रहा है। और तो और, जहां अपने ही सामान्य तरीके से वोटरों के नाम काटने से उसका मन नहीं भरता है, वहां अलग-अलग फार्मूले आजमा रहा है, और पहले से भी ज्यादा वोटरों के नाम उड़ा रहा है। जैसे बंगाल के लिए उसने खास फार्मूला निकाला, तार्किक विसंगति का और एक करोड़ पैंतीस लाख वोटरों के नाम पर सवाल खड़ा कर दिया। फिर उसके आधे को माफ भी कर दिया और आधे को न्यायिक निर्णय के खाने में डाल दिया। आखिरकार, 34 लाख के मामले में मतदान तक कोई फैसला ही नहीं आया और उनके वोट के बिना ही चुनाव हो गया।
बेशक, किसी का वोट कट जाना तो अच्छी बात नहीं है। नहीं कटना चाहिए। लेकिन, इसी के लिए विरोधियों को ज्ञानेश गुप्ता के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाना चाहिए क्या? आखिरकार, लाखों लोगों के वोट कटने के बाद भी चुनाव तो हो ही रहे हैं, डैमोक्रेसी चल ही रही है, फिर महज वोट कटने पर इतनी हायतौबा क्यों? और अगर कोई यह सोचता हो कि उसे अपने वोट से चुनी हुई सरकार ही चाहिए, तो उससे ज्यादा मुगालते में दूसरा कोई नहीं होगा। वो जमाने लद गए, जब वोटर सरकार चुना करते थे। यह मोदी-ज्ञानेश युग है, यहां सरकार ही अपने वोटर चुनती है। बाकी सरकार मोदी जी की ही बनना, ज्ञानेश गुप्ता ऐसे नहीं तो वैसे संभाल ही लेते हैं।
हम तो कहते हैं कि वोट में भी कुछ धरा नहीं है। रही बात भारत का नागरिक माने जाने की तो, न वोटर लिस्ट में होना नागरिकता का पर्याप्त सबूत है, न चुनाव दर चुनाव वोट डालना। न जन्म प्रमाणपत्र पर्याप्त सबूत है, न पासपोर्ट न पैन नंबर। फौज-वौज समेत सरकारी नौकरी भी नहीं। जो ज्ञानेश कुमार की तलवार के नीचे आए, उसकी नागरिकता कौन बचाए!

