Tuesday, April 21, 2026
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भारत-श्रीलंका के सुधरेंगे संबंध

Prabhunathश्रीलंका से अपने संबंधों को सुधारने के लिए मोदी सरकार ने एक कूटनीतिक चाल चली है। अब उसकी यह नीति पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को लेकर एक मजबूत आधार देगी और भारत के साथ भरोसे को और मजबूत करेगी। श्रीलंका सरकार और भारतीय मूल के तमिल समुदाय के बीच हिंसक संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है। श्रीलंकाई और तमिलों के बीच हिंसा में अब तक कई हजार तमिलों की मौत हुई है। इस संघर्ष काफी संख्या में श्रीलंकाई नागरिक भी मारे गए जा चुके हैं। श्रीलंका में तमिलों के मानवाधिकार को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जेनेवा में श्रीलंका के खिलाफ एक प्रस्ताव लाया, जिस पर दुनिया के 22 देशों ने समर्थन में मतदान किया। जबकि भारत समेत 14 देश तटस्थ रहे। चीन और पाकिस्तान समेत 11 देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। भारत सरकार की इस नीति से तमिलों में नाराजगी हो सकती है, क्योंकि यह श्रीलंका में बसे तमिल हितों के खिलाफ है। लेकिन, कभी-कभी अपने हितों को भी किनारे रखना सरकार की मजबूरी होती है। मानवाधिकार प्रस्ताव पर भारत ने जो नीति अपनाई उसे गलत नहीं कहा जा सकता है। सरकार ने भविष्य को देखते हुए चीन और पाकिस्तान को मात दिया है। हालांकि दूसरे राजनीतिक दलों ने सरकार की इस नीति पर तल्ख टिप्पणी की भी है, डीएम के नेता स्टैलिन प्रस्ताव के पक्ष में मतदान चाहते थे लेकिन सरकार की अपनी नीति है।

श्रीलंका सरकार और तमिलों के अधिकारों को लेकर एक लंबा संघर्ष चला है। श्रीलंका यात्रा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी पर तमिल अधिकारों और सरकार की नीतियों को लेकर उन पर हमला भी हुआ था। यह हमला उस समय हुआ था जब वह गार्ड आफ आनर ले रहे थे।

भारत के हाथ वैश्विक समझौते से बंधे हुए हैं जिसकी वजह से उसे अपने हितों की भी अनदेखी करनी पड़ती है। श्रीलंका में मानवाधिकार की बहस बेहद पुराना मसला है। हाल में तमिल समुदाय के मानवाधिकार हितों को लेकर श्रीलंका सरकार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में एक प्रस्ताव लाया गया। जिसमें भारत ने तटस्थ नीति अपनाई और वह वोटिंग से गैरहाजिर रहा।

भारत का इसके पीछे का तर्क था कि हमारी प्राथमिकता में तमिल समुदाय की सुरक्षा और उनके हितों की प्राथमिकता के साथ-साथ उनके समता और समानता के अधिकारों की बात भी निहित है। लेकिन दूसरी तरफ श्रीलंका की क्षेत्रिय एकता और अखंडता भी अहम है, इस पर भी गौर करना चाहिए। किसी भी देश का अपना आतंरिक अधिकार है। हालांकि भारत सरकार के इस कदम से कई राजनीतिक दल असहमत हैं।

उनका मामना था कि भारत सरकार को इस प्रस्ताव के पक्ष में समर्थन करना चाहिए था। लेकिन सरकार तमिलहितों को खास तवज्जों नहीं दिया। जबकि केंद्र सरकार मतदान से अनुपस्थित रहकर चीन और पाकिस्तान को आइना दिखाया है जब यह प्रस्ताव संयुक्तराष्ट्र में आया था तो श्रीलंका के विदेश सचिव ने भारत के प्रति भरोसा जताया था कि भारत उसे अकेला नहीं छोड़ सकता। इस संबंध में श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र भी लिखा था।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सुरक्षा परिषद की तरफ से लाए गए इस प्रस्ताव पर दुनिया के देशों ने अपनी कूटनीति के अनुसार निर्णय लिया। क्योंकि कोई भी देश किसी देश के आतंकरिक मामले में शीघ्र दखल नहीं देना चाहता है। अगर वह ऐसा करेगा तो आने वाले समय में उसके खिलाफ भी यह स्थिति बन सकती है। इस प्रस्ताव में अनुपस्थित रहने वालों में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के 14 देश शामिल हैं। जबकि चीन और पाकिस्तान ने प्रस्ताव के विरोध में अपना मतदान किया। क्योंकि इस समय श्रीलंका और चीन के रिश्ते काफी अच्छे हैं जबकि भारत के संबंध उतने अच्छे नहीं हैं।

वर्तमान परिस्थिति में श्रीलंका चीन को अपना बड़ा हितैसी मानता है यही वजह है कि पोर्ट आॅफ कोलंबिया को विकसित करने को लेकर श्रीलंका सरकार ने भारत के साथ एक समझौता किया था, लेकिन उसे चीन के दबाब में निरस्त कर दिया। जबकि चीन श्रीलंका में काफी निवेश किया है। भारत इस समझौते को पुन: पाना चाहता है। वोटिंग से अनुपस्थित रहना भारत की एक कूटनीतिक नीति हो सकती है। भारत के इस निर्णय से श्रीलंका से संबंध और बेहतर होंगे। दूसरी बात चालबाज चीन और पाकिस्तान को भी भारत ने कड़ा संदेश पहुंचा दिया। भारत सरकार का यह कदम वास्तव में स्वागत योग्य कहा जाएगा।

भारत किसी भी देश के आतंरिक मामले में सीधी दखल से बचना चाहता है। तमिल समुदाय की सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है, लेकिन किसी देश के आतंरिक मामलों में वह सीधा हस्तक्षेप नहीं करना चाहता है। जिस तरह की भूल राजीव गांधी ने किया था सरकार संभत: उसकी पुनरावृत्ति नहीं चाहती है। लेकिन तमिलों की सुरक्षा और मानवाधिकार को लेकर वह चाहती है कि श्रीलंका सरकार और तमिल समुदाय एक मंच पर एक साथ आएं। सरकार सीधे हस्तक्षेप से बचना चाहती है। क्योंकि श्रीलंका में भारत सरकार चीन को अधिक मौका नहीं देना चाहती।

भारत एक ईमानदार और भरोसेमंद पड़ोसी की भूमिका निभाना चाहता है। सरकार चाहती है कि इस मसले पर वैश्विक बिरादरी के लोग एक साथ मिल कर श्रीलंका और तमिलों के बीच का रास्ता निकालें। भारत अगर तमिलहितों को ध्यान में रख कर प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करता तो श्रीलंका सरकार का विश्वास चीन की तरफ और अधिक बढ़ जाता, लेकिन भारत ने चीन और पाकिस्तान को यह मौका नहीं देना चाहा। पाकिस्तान ने तो एलटीटीई यानी तमिल टाइगर ईलम को एक आतंकवादी संगठन बताया है। अगर उस हालात में भारत मानवाधिकार प्रस्ताव के पक्ष में समर्थन करता तो श्रीलंका की नजरों में भारत के मुकाबले चीन और पाकिस्तान की अहमित अधिक बढ़ जाती।

भारत दक्षिण एशिया में अपनी कूटनीति को मजबूत करने के साथ पड़ोसी देशों से संबंध अच्छा चाहता है। क्योंकि उसे पाकिस्तान और चालबाज चीन को नीचे दिखाने के लिए श्रीलंका, म्यांमार, बंग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे देशों से बेहतर संबंध कायम रखने होंगे। पाकिस्तान से कोई सवाल ही नहीं उठता है। क्योंकि वह बेहद कायर मुल्क है। वह भारत को बर्बाद करने का सपना देखता है। आतंकी फसलें लाहौर में लहलहाती है। भारत के सामने नतमस्तक होना पाकिस्तान की मजबूरी है। प्रस्ताव पर भारत का कदम गलत नहीं कहा जा सकता है।


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