Tuesday, April 21, 2026
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बंगाल में ममता को कड़ी टक्कर देती भाजपा

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Shree Nath Sahayaपश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कड़े मुकाबले से गुजर रही हैं। दस साल पहले वामदल की सरकार के शासन का अंत करके सत्ता पर काबिज होने वाली ममता चुनावी अखाड़े में खूब पसीना बहा रही है। ममता को कड़ी चुनौती भाजपा से मिल रही है। पिछले कई सालों से बंगाल में जमीनी काम कर रही भाजपा ने ममता को घेरने में कोई कसर नहीं रखी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से ही बंगाल की राजनीतिक फिजा बदलने लगी थी। जब भाजपा के 18 सांसद बंगाल से जीते थे। वहीं विधानसभा चुनाव के पहले उनकी पार्टी तृणमूल के ढेर सारे नेताओं का भाजपा में चला जाना उनके गुस्से को बढ़ाने वाला रहा। लेकिन उनकी नाराजगी इस बात पर ज्यादा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में भाजपा के प्रचार की बागडोर संभाल रखी है। ममता ने बाहरी बनाम बंगालवासी को मुद्दा बना रखा है। इसी मुद्दे पर अपने चुनाव अभियान को केंद्रित रखते हुए बंगाल की बेटी का नारा गुंजा दिया। तीसरे दौर के मतदान के एक दिन पहले उन्होंने तीखे शब्दों में ममता बनर्जी ने कहा कि बंगाल पर गुजरात के लोगों (मोदी-शाह) को राज नहीं करने देंगे। चुनाव परिणाम तो मतदाता तय करेंगे किन्तु प्रांतवाद की ये धारणा राष्ट्रीय एकता के लिए नुकसानदेह है।

सवाल ये है कि क्या बंगाल सिर्फ बंगालियों का है? इसी तरह क्या केवल मराठी भाषी महाराष्ट्र और तमिल बोलने वाले तमिलनाडु में रह सकते हैं? सुश्री बैनर्जी की अपनी पार्टी के तमाम प्रवक्ता गैर बंगाली हैं। बंगाल में भले ही गुजराती मूल के लोग कम रहते हों लेकिन उप्र और बिहार से लाखों लोग वहां रोजगार के लिए आए और वहीं के होकर रह गए। बाहरी व्यक्ति को लेकर स्थानीय भावनाएं दरअसल रोजगार के अवसर छिन जाने की आशंका से उग्र होती हैं। लेकिन जिस संदर्भ में ममता बनर्जी ने बंगाल पर किसी गुजराती द्वारा राज नहीं किए जाने की बात कही और उससे उनका मानसिक तनाव ही व्यक्त हुआ है।

दूसरे चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले ममता बनर्जी ने गैर भाजपा नेताओं को पत्र लिखकर सियासी हलचल मचा दी है। तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ने इस पत्र के जरिये विपक्षी राजनीतिक दलों से भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने की अपील की है। ‘दीदी’ के इस लेटर के सामने आते ही भाजपा ने इसे ममता बनर्जी की हार का संकेत बता दिया है। भाजपा को ‘बाहरी’ बताने वाली ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाहरी पार्टियों से समर्थन मांगने वाला बता दिया है। इस पत्र में विधानसभा चुनाव के बाद लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए भाजपा के खिलाफ साझा प्रयास की बात कही गई है। ये प्रयास पहले भी हो चुका है और उसका नतीजा पिछले लोकसभा चुनाव में सबके सामने पहले ही आ चुका है।

सवाल उठना लाजिमी है कि ममता बनर्जी को चुनाव के बीच में इस लेटर को लिखने की जरूरत क्यों पड़ गई? जानकारों की माने तो ममता बनर्जी के सामने भाजपा के स्टार प्रचारकों की फौज खड़ी है। कहा जा सकता है कि वह इस फौज के आगे अकेली पड़ गई हैं। अपने पत्र के सहारे उन्होंने यह दिखाने की कोशिश भी की है। ममता बनर्जी को देशभर के कई विपक्षी दलों ने अपना समर्थन देने की घोषणा की है। इन नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में रैलियां भी की हैं, लेकिन समर्थन देना और वोट मिलना दो अलग-अलग बात हैं।

शिवसेना ने दीदी को बंगाल की शेरनी बताते हुए समर्थन जताया था, लेकिन शिवसेना का बंगाल में कितना वोट है, इस पर भी ध्यान देना होगा। हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव आदि ने ममता बनर्जी के पक्ष में प्रचार किया है। सीमांत लोकसभा सीटों पर भाजपा का दबदबा है। इस स्थिति में ये नेता टीएमसी को कितने वोट दिला पाएंगे, ये देखने वाली बात होगी।

ममता की बेचैनी भाजपा की साथ साथ फुरफुरा शरीफ ने बढ़ा रखी है। फुरफुरा शरीफ पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के जंगीपारा में स्थित एक गांव का नाम है। यहां स्थित हजरत अबु बकर सिद्दीकी की दरगाह बंगाली मुसलमानों की आस्था का केंद्र है। यहां होने वाले सालाना उर्स में बंगाली और उर्दू भाषी मुसलमान बड़ी संख्या में आते हैं। इस दरगाह का बंगाल की 100 से ज्यादा सीटों पर असर है। हालांकि सिद्दीकी परिवार के बाकी सभी सदस्य ममता बनर्जी का सपोर्ट कर रहे हैं, लेकिन अब्बास सिद्दीकी ने लेफ्ट-कांग्रेस के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चे का गठन किया है और चुनावी मैदान में हैं।

बंगाल चुनाव के चंद दिनों पहले इंडियन सेक्युलर फ्रंट नाम की पार्टी बनाने वाले और फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी का कहना है कि जिस तरह कांग्रेस, लेफ्ट ने हिंदू-मुस्लिम से वोट मांगे और सरकारें चलार्इं, उसी तरह वे भी हिंदू बहन-भाइयों से वोट मांग रहे हैं और उनकी सेवा करना चाहते हैं। उनका कहना है, हमारी पार्टी को जो लोग कम्युनल बता रहे हैं, असल में वो खुद कम्युनल हैं। बंगाल में यदि वोटों में कोई गड़बड़ नहीं की गई तो संयुक्त मोर्चा ही सरकार बनाएगा।

किसी भी पक्ष की जीत-हार का दावा कोई नहीं कर सकता,, लेकिन नंदीग्राम की घटनाओं से स्पष्ट है कि ममता दबाव में हैं। पैर में चोट लगने, पट्टी बांधकर चुनाव प्रचार करने से लेकर राजनीतिक दलों को पत्र लिखने तक ममता सहानुभूति जुटाने की हर संभव कोशिश में लगी हैं। वह अपने प्रयास में कितना कामयाब होती हैं, ये तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे। लेकिन सहानुभूति बटोरने के फेर में दीदी एक के बाद एक गलती करती दिख रही है। खासकर पत्र लिखना उनकी बड़ी गलती है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि दीदी ने पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों को लेकर अपना डर जाहिर कर दिया है।


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