
आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में होने वाली मौतों की तादाद हर साल लगातार बढ़ रही है। आकाशीय बिजली की बढ़ती आवृत्ति के पीछे अनियंत्रित तरीके से होने वाला शहरीकरण प्रमुख वजह बन रहा है। साथ में, ग्लोबल वार्मिंग के साथ लोकल वार्मिंग से भी इसका सीधा संबंध है। पृथ्वी एवं विज्ञान मंत्रालय द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पिछले पैंसठ वर्षों में वार्षिक औसत अधिकतम तापमान में 0.15 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान में 0.13 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा संबंध आंधी-तूफान आने और आकाशीय बिजली गिरने की अधिकता से है। बताते चलें कि आकाशीय बिजली का तापमान सूर्य के ऊपरी सतह से भी ज्यादा होता है। इसकी क्षमता 300 किलोवॉट यानी कि 12.5 करोड़ वॉट से ज्यादा चार्ज की होती है। इसीलिए, यह सैकडों में बहुत ज्यादा नुक्सान कर जाता है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर यह आकाशीय बिजली का निर्माण कैसे होता है?
बता दें कि आसमान में विपरीत एनर्जी के बादल हवा से उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये विपरीत दिशा में जाते हुए एक-दूसरे से टकराते भी हैं। इससे होने वाले घर्षण से बिजली पैदा होती है, जो धरती पर गिरती है। आसमान में किसी तरह का कंडक्टर याने कि चालक न होने से बिजली पृथ्वी पर चालक की तलाश में पहुंच जाती है, आकाशीय बिजली पृथ्वी पर पहुंचने के बाद ऐसे माध्यम को तलाशती है, जहां से वह गुजर सके। यदि यह आकाशीय बिजली, बिजली के खंभों के संपर्क में आती है तो वह उसके लिए कंडक्टर (चालक) का काम करता है। अगर उस समय कोई इंसान इसके दायरे में आ जाए तो उस चार्ज के लिए इससे अच्छा चालक भला और क्या होगा। ऐसे हालात में वो इंसान उस बिजली के लिए शॉर्ट सर्किट का काम करता है।
आज पर्यावरण का लगातार क्षरण हो रहा है, जिसमे वनों की कटाई, जल निकायों का क्षरण, कंक्रीटाइजेन, बढ़ता प्रदूषण और एरोसोल ने जलवायु परिवर्तन को चरम स्तर पर पहुंचा दिया है और आकाशीय बिजली पर इन जलवायु चरम सीमाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। अगर जल्दी ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण व जलवायु परिवर्तन पर काबू न पाया गया, तो समुद्री चक्रवातों, बिजली गिरने जैसी भयावह त्रासदियों की आवृत्ति कम करना कठिन हो जाएगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन को देखते हुए हमें विचार करना चाहिए कि कैसे हम कार्बन उत्सर्जन को सीमित करें और स्वच्छ ऊर्जा की ओर अधिक से अधिक कदम बढ़ाएं। क्योंकि समस्या की मूल जड़ में बढ़ता तापमान से अनियंत्रित मौसमी घटनाएं ही है।
मार्च 2021 में जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक अध्ययन में आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन और बिजली गिरने की बढ़ती घटनाओंं के मध्य संबंध बताया गया है। वर्ष 2010 से 2020 के मध्य गर्मियों के महीनों के दौरान आकाशीय बिजली गिरने की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है, जो वर्ष 2010 में 18,000 से बढ़कर वर्ष 2020 तक 1,50,000 से अधिक हो गई। वैज्ञानिक रिसर्च का कहना है कि अगर इसी तरह ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ता रहा, तो 2100 तक आते-आते आज के मुकाबले आकाशीय बिजली की आवृत्ति 50 प्रतिशत और बढ़ जाएगी। इसलिए अब हमें अपनी नीतियों के निर्माण करते समय इन आने वाली मुसीबतों को ध्यान में रखना होगा और अपनी सूचना तंत्र को और मजबूत करने पर जोर देना होगा।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक हर साल बिजली गिरने से औसतन 2500 लोगों की मौत हो जाती है। देश में बारह ऐसे राज्यों की पहचान की गई है, जहां सबसे अधिक आकाशीय बिजली गिरती है। जिनमें मध्य प्रदेश पहले नंबर पर है। इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा का स्थान आता है। सवाल उठता है कि आखिर भारत में ही सर्वाधिक आकाशीय बिजली गिरने की समस्या क्यों होती है? बता दें कि भारत की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार की है कि वह भूमध्य रेखा और हिंद महासागर से बिल्कुल नजदीक है, जिससे इस पूरे उपमहाद्वीप में भयंकर गरमी और अधिक आर्द्रता रहती है, जो आंधी-तूफान आने और आकाशीय बिजली गिरने के लिए सबसे जिम्मेदार कारक है। सर्वविदित है कि लगातार तापमान वृद्धि हो रहा है, अत: समुद्री सतह का तापमान भी उसी अनुपात म़े बढ़ रहा है, जिसकी वजह से लगातार चक्रवात भी भयावह बनते जा रहे है और आकाशीय बिजली की घटनाओं की संख्या भी बढ़ रही है।
हमें आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों को कम करने के लिए बांग्लादेश की रणनीति को अपनाना चाहिए। वहां लोक गीतों, नुक्कड़ नाटकों और कहानियों के जरिए लोगों को आकाशीय बिजली से बचने के उपायों की जानकारी दी जाती है। हम भी कुछ इसी तर्ज पर लोगों में जागरूकता अभियान चला कर मौतों पर काफी हद तक अंकुश लगा सकते है। वैसे, भारत सरकार ने आकाशीय बिजली गिरने की पूर्व सूचना देने के लिए ‘दामिनी’ नामक एक ऐप भी जारी किया है, जिस पर मौसम विभाग आगामी प्राकृतिक खतरे को आगाह करते हुए पूर्व चेतावनी भी जारी करता रहता है, लेकिन सुदूर भारतीय गांवों में इस उपयोगी ऐप की अभी भी पहुंच नहीं हुई है।
इसलिए, फिलहाल अभी रेडियो, टेलीविजन और मोबाईल आदि में संदेश देकर तथा छोटे-छोटे प्रायोजित कार्यक्रमों का सहारा लेकर जागरुकता की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। साथ में, राज्य सरकारें को चाहिए कि आईएमडी के पूवार्नुमान को सही समय पर लोगों के साथ साझा करने की रणनीति तैयार करें।


