Tuesday, May 5, 2026
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जौ की खेती: सीमित लागत अधिक मुनाफा

KHETIBADI


भारत में जौ (बारले) की खेती प्राचीनकाल (9000 वर्ष पूर्व ) से होती आ रही है। हमारे देश मे जौ का प्रयोग रोटी बनाने के लिए शुद्ध रूप में और चने के साथ मिलाकर बेझर के रूप में किया जाता है। जौ और चना को भूनकर पीसकर सत्तू के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा जौ का प्रयोग माल्ट बनाने में किया जाता है जिससे बीयर एवं व्हिस्की का निर्माण किया जाता है।

आमतौर पर जौ का प्रयोग जानवरों के चारे व दाने तथा मुर्गी पालन हेतु उत्तम दाने के लिए किया जाता है। जौ के दाने में 11.12 प्रतिशत प्रोटीन, 1.8 प्रतिशत फॉस्फोरस, 0.08 प्रतिशत कैल्सिश्म तथा 5 प्रतिशत रेशा पाया जाता है। जौ खाद्यान में बीटा ग्लूकॉन की अधिकता और ग्लूटेन की न्यूनता जहाँ एक ओर मानव रक्त में कोलेस्ट्रॉल स्तर को कम करता है, वही दूसरी ओर सुपाच्यता व शीतलता प्रदान करता है।

इसके सेवन से पेट सबंधी गड़वड़ी , वृक में पथरी बनना तथा आंतो की गड़वड़िया दूर होती है। आज जौ का सबसे ज्यादा उपयोग पर्ल बारले, माल्ट, बियर, हॉर्लिक्स, मालटोवा टॉनिक, दूध मिश्रित बेवरेज आदि बनाने में बखूबी से किया जा रहा है। मानव स्वस्थ्य के लिए बेहद उपयोगी इस खाद्यान्न फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है की इसकी खेती कम पानी, सीमित खाद एवं उर्वरक एवं सभी तरह की भूमियों में लहलहाती रहती है। वर्तमान जलवायु परिवर्तन का इस फसल की बढ़वार एवं उत्पादन पर खास फरक नहीं पड़ता है यानी कृषि जलवायु की कठिन परिस्थितियों में भी इसे सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है।

उपयुक्त जलवायु

जौ शीतोष्ण जलवायु की फसल है, लेकिन उपोष्ण जलवायु में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। गेहूं की अपेक्षा जौ की फसल प्रतिकूल वातावरण अधिक सहन कर सकती है। इसलिए उत्तर प्रदेश के पूर्वी नम और गर्म भागों में जहां गेहूं की पैदावार ठीक नहीं होती है, जौ की फसल अच्छी होती है। बोने के समय इसे नम, बढ़वार के समय ठंडी और फसल पकने के समय सूखा तथा अधिक तापमय शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है। फसल वृद्धि के समय 12 से 15 डिग्री सेंटीग्रेडे तापक्रम तथा पकने के समय 30 डिग्री सेंटीग्रेडे तापक्रम की आवयकता पड़ती है। जौ की खेती 60 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी जलमाँग कम होने के कारण सूखा ग्रस्त क्षेत्रों के लिए यह उपयुक्त फसल है। नमी अधिक होने पर (विशेषकर पकने से पहलेच्) रोगों का प्रकोप अधिक होता है। जौ सूखे के प्रति गेहूँ से अधिक सहनशील है, जबकि पाले का प्रभाव इस फसल पर अधिक होता है।

भूमि का चयन

जौ की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियो में की जा सकती है परंतु इसके लिए अच्छे जल निकास वाली मध्यम दोमट मिट्टी जिसकी मृदा अभिक्रिया 6.5 से 8.5 के मध्य हो, सर्वोत्तम होती है। भारत में जौ की खेती अधिकतर रेतीली भूमि में कि जाती है। चूने की पर्याप्त मात्रा वाली मृदाओं में जौ की बढवार अच्छी होती है। इसमें क्षार सहन करने की शक्ति गेहूं से अधिक होती है इसलिए इसे कुछ क्षारीय (ऊसर) भूमि में भी सफलता पूर्वक जा सकता है।

भूमि की तैयारी

जौ के लिए गेहूं की भांति खेत की तैयारी की आवश्यकता नहीं होती है। खरीफ की फसल काटने के पश्चात खेत में मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करने के बाद 3-4 बार देशी हल से जुताइयां करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। इससे भूमि मे नमी संरक्षण भी होता है। भारी मृदाओ में बखर चलाकर भी खेत तैयार किया जाता है।

खाद एवं उर्वरक

फसल की प्रति इकाई पैदावार बहुत कुछ खाद एवं उर्वरक की मात्रा पर निर्भर करती है। जौ में हरी खाद, जैविक खाद एवं रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाता है। खाद एवं उर्वरक की मात्रा जौ की किस्म, सिंचाई की सुविधा, बोने की विधि आदि कारकों पर निर्भर करती है। अच्छी उपज लेने के लिए भूमि में कम से कम 35-40 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद 50 किलो ग्राम नीम की खली और 50 किलो अरंडी की खली आदि इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर खेत में बुवाई से पहले इस मिश्रण को समान मात्रा में बिखेर लें इसके बाद खेत में अच्छी तरह से जुताई कर खेत को तैयार करें इसके उपरांत बुवाई करें

रासायनिक खेती की दशा में

जौ से अधिकतम उपज लेने के लिए बोआई की परिस्थिति के अनुसार खाद एवं उर्वरक का प्रयोग किया जाना चाहिए। सिंचित समय से बोआई हेतु 60 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. फॉस्फोरस और 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। असिंचित (बारानी) दशा में 30 किग्रा. नत्रजन, 20 किग्रा. फॉस्फोरस और 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना उचित रहता है। सिंचित दशा में नत्रजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय कूड़ में 8-10 सेमी. की गहराई पर बीज के नीचे देनी चाहिए। शेष आधी नत्रजन को दो बराबर भाग में बाँटकर पहली व दूसरी सिंचाई के समय देना लाभप्रद रहता है। असिंचित दशा में तीनों उर्वरकों को बोआई के समय कूड़ में दिया जाना चाहिए।

सिंचाई

जौ को गेहूं की अपेक्षा कम पानी की आवश्यकता होती है परन्तु अच्छी उपज लेने के लिए 2-3 सिंचाइयां की जाती है। पहली सिंचाई फसल में कल्ले फूटते समय (बोने के 30-35 दिन बाद), दूसरी बोने के 60-65 दिन बाद व तीसरी सिंचाई बालियों में दूध पड़ते समय (बोने के 80-85 दिन बाद) की जानी चाहिए। दो सिंचाई का पानी उपलब्ध होने पर पहली सिंचाई कल्ले फूटते समय बोआई के 30-35 दिन बाद व दूसरी पुष्पागम के समय की जानी चाहिये। यदि सिर्फ एक ही सिंचाई का पानी उपलब्ध है तब कल्ले फूटते समय (बोआई के 30-35 दिन बाद) सिंचाई करना आवश्यक है। प्रति सिंचाई 5 – 6 सेमी. पानी लगाना चाहिए। दूध पड़ते समय सिंचाई शान्त मौसम में करनी चाहिए क्योंकि इस समय फसल के गिरने का भय रहता है। जौ के खेत में जल निकासी का भी उचित प्रबन्ध आवश्यक है।

खरपतवार नियंत्रण

जौ में प्राय: निराई-गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती है। सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण हेतु नीदनाशक दवा 2,4-डी सोडियम साल्ट (80 प्रतिशत) या 2,4-डी एमाइन साल्ट (72 प्रतिशत) 0.75 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को 700-800 लीटर पानी में घोलकर बोआई के 30-35 दिन बाद कतार में छिड़काव करना चाहिए, इससे। इससे चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रित रहते हैं। मंडूसी और जंगली जई के नियंत्रण के लिए आइसोप्रोटुरान 75 डव्लू पी 1 किग्रा या पेंडीमेथालिन (स्टोम्प) 30 ई सी 1. 5 किग्रा प्रति हेक्टेयर को 600-800 ली. पानी मे घोलकर बोआई के 2-3 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए।

फसल चक्र

आमतौर पर जौ के लिए वे सभी फसल चक्र अच्छे रहते है, जो गेहूं के लिए उपयुक्त होते है। सामान्यतौर पर खरीफ की सभी फसलें यथा धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, मूंग आदि के उपरांत जो की फसल ली जा सकती है। रबी की सभी फसलें (गेहूं, चना, मटर, सरसों आदि) के साथ जौ की मिलवां या अंतरफसली खेती की जा सकती है। असिंचित क्षेत्रों में जौ को प्राय: चना, मटर या मसूर के साथ ही मिलाकर बोया जाता है।


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