जनवाणी संवाददाता |
हस्तिनापुर: लगभग एक सप्ताह पूर्व गंगा नदी में आई बाढ़ का कहर इलाकों में अब तो धीरे-धीरे बाढ़ की विभीषिका समाप्ति की ओर अग्रसर हो रही है, लेकिन अपने पीछे जो तमाम दुश्वारियों का मंजर छोड़ गई है, आखिर उससे निजात कैसे मिलेगी? यह फिलहाल शासन-प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
जिन बाढ़ पीड़ित किसानों की फसलें पानी में डूबने से बर्बाद हो गई, जिनके घर बार उजड़ गये, उनके समक्ष अब दो जून के निवाले का संकट खड़ा हो गया है। राहत के नाम पर अब तक बाढ़ पीड़ितों को प्रशासन की तरफ से जो भी सामग्री उपलब्ध कराई गई। वह फिलहाल ऊंट के मुंह में जीरा ही प्रतीत हो रही है। लचर नौकरशाही व्यवस्था के चलते बाढ़ पीड़ितों का आक्रोश दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।
जो कभी न कभी लावा बनकर सड़क पर फूट सकता है। बता दें कि लगभग 15 दिन तक लगातार चले बाढ़ की विभीषिका ने इस तरह तबाही मचाई। जनपद स्थित गंगा के तटवर्ती इलाके में बसे क्षेत्र के लोगों के घर गृहस्थी सहित सब कुछ बर्बाद हो गये। बहरहाल बाढ़ के पानी के घटने का सिलसिला तो शुरू ही हो गया, किंतु अब बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के समक्ष रहने खाने-पीने सहित तमाम प्रकार की दुश्वारियां सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी हो गई हैं।
दो वक्त के निवाले के लिए बाढ़ पीड़ित विशेष रूप से गरीब लोगों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। ऐसे हालात में प्रशासन व सियासत की राजनीति करने वाले नेताओं की ओर से राहत के नाम पर जो भी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं, वह नाकाफी साबित हो रही।
नहीं शांत हो रही आक्रोश की ज्वाला
पूरी तरह बर्बाद हो चुके बाढ़ पीड़ितों में आक्रोश की ज्वाला शांत होने की बजाय और तेजी से बढ़ती ही जा रही है। समय रहते इस नजाकत को भांपते हुए दुश्वारियों को कम करने का प्रयास नहींं किया गया तो स्थिति गंभीर होने से कतई इंकार नहींं किया जा सकता।
उधर, बाढ़ का पानी घटने के साथ ही प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियां भी तेजी से पैर पसारना शुरू कर दी हैं, जिससे आमजन के साथ ही पशु भी अछूते नहींं है। ग्रामीणों का कहना है कि शासन के नुमाइंदों व नौकरशाहों से जनहित में तत्काल उचित व ठोस कदम उठाने की मांग की है, ताकि बाढ़ पीड़ित राहत महसूस कर सकें।
नाव में डगमगाता ग्रामीणों का जीवन

बाढ़ की विभीषिका अपने पीछे कितने दर्द छोड़ गई है। इसका अंदाजा महज इससे ही लगाया जा सकता है। करोड़ों रुपये की लागत से बना गंगा नदी का पुल बाढ़ के बाद लोगों की मदद के लिए तैयार नहीं है और महीनों तैयार होने के भी कोई असर नजर नहीं आ रहे हैं। बाढ़ के बाद लोगों को अपनी ठिकानों पर पहुंचने के लिए जान जोखिम में डालकर नाव की सवारी करने को मजबूर है। जिससे खादर के किसानों का जीवन नाव में ही डगमगा रहा है, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है।
सड़कें क्षतिग्रस्त, कब होगा सुधार?

गांव में अब भी पानी भरा होने से लोगों के सामने अवागमन की समस्या है। क्षेत्र की अधिकांश सड़कें क्षतिग्रस्त है। जलभराव के चलते लोगों को आवागमन में भारी दिक्कतें हो रही है। ग्रामीणों को व्यापक तौर पर सुविधाएं मुहैया कराने की आवश्यकता है, लेकिन प्रशासन ग्रामीणों की दिक्कतों को लेकर गंभीर नहीं है। छोटे-मोटे इलाजों के लिए ग्रामीण झोलाछाप डाक्टरों की शरण ले रहे हैं। गांवों में शुद्ध पानी को लेकर भी समस्या है। कई हैंडपंप आज भी पानी में डूबे हुए हैं, लेकिन कहीं कोई राहत ग्रामीणों को मिलती नजर नहीं आ रही है।

