Wednesday, April 22, 2026
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तथ्य ‘देशद्रोह’ में शुमार!

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SUBHASH GATADEक्या दमनकारी कानूनों के अंधाधुंध इस्तेमाल के लिए लोकतंत्र में कोई जगह हो सकती है? क्या पत्रकार अगर वस्तुनिष्ठ ढंग से खबरें देने के कर्तव्य पर अड़िग रहें तो क्या उन्हें इसी के चलते देशद्रोह की धाराएं झेलनी पड़ेंगी? या पीड़ितों की कानूनी सहायता के लिए और उनके साथ हुई ज्यादतियों का पता करने के लिए सक्रिय वकीलों पर भी ऐसे ही कानूनों की धाराएं लगा देनी चाहिए? मुल्क की आला अदालत-जिसने पिछले कुछ वक्त से अपने फैसलों या अपने अवलोकनों से हुक्मरानों की बेचैनी बढ़ा दी है-को अब इस अहम मसले पर भी अपने रुख को स्पष्ट करना है कि आखिर ऐसे कानूनों की उपयोगिता क्या है, जो नागरिक स्वतंत्रता की समूची अवधारणा को ही बेमानी साबित कर देते हैं, अभिव्यक्ति की आजादी के संविधान के वादे को ही सिर के बल खड़ा कर देते हों! इस मामले में दक्षिणपूर्व का राज्य त्रिपुरा सुर्खियों में है। खबर के मुताबिक वहां पिछले दिनों सौ से अधिक सोशल मीडिया खातों को केंद्रित करते हुए एफआईआर दर्ज की गई है, जिसमें गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम की धारा 13 (यूएपीए) तथा दंड संहिता की धारा 153 ए ( विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाना), धारा 153 बी, 469, धारा 503 (आपराधिक आतंक), धारा 504 (शांतिभंग के इरादे से सचेतन अपमान), 120 बी (अपराधिक षडयंत्र) आदि शामिल की गई हैं। इस एफआईआर में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर के पत्रकार श्याम मीरा सिंह, आरिफ शाह और सी जे वेरलेमान आदि के भी नाम शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक इन सोशल मीडिया खातों ने जो बातें प्रकाशित की, उससे ‘आपसी तनाव बढ़ा’।

मालूम हो कि त्रिपुरा-जहां भाजपा का शासन है और जो पिछले माह ‘समुदाय केंद्रित हिंसा’ का स्थान बना, जहां बांगलादेश में दुगार्पूजा के अवसर पर इस्लामिस्टों द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों पर हुए हमलों की प्रतिक्रियास्वरूप हिंसा भड़की और जिसमें कथित तौर पर प्रार्थनास्थल भी हमले की जद में आए।

मालूम हो कि सूबे में भड़की ‘सांप्रदायिक हिंसा’ के बारे में त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने भी दखल दिया और राज्य सरकार से रिपोर्ट मंगाई और उसके प्रतिनिधि को अदालत के सामन हाजिर होने के लिए कहा।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीता कि त्रिपुरा पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों एक दल पर-जो विभिन्न नागरिक अधिकार संगठनों से ताल्लुक रखते थे और राज्य में हुई ‘समुदाय केंद्रित हिंसा’ की पड़ताल करने तथा पीड़ितों को किस तरह की कानूनी सहायता प्रदान की जा सकती है, इसकी संभावना तलाशने दिल्ली से राज्य में पहुंचे थे और वहां एकत्रित तथ्यों के आधार पर एक रिपोर्ट भी जारी की थी।

गौरतलब था कि उनकी रिपोर्ट न केवल पीड़ितों की चर्चा करती है, बल्कि कई स्थानों पर स्थानीय पुलिस की सकारात्मक भूमिका की भी मिसालें देती है, जिन्होंने आपसी विवाद को अधिक बढ़ने नहीं दिया था। वकीलों के इस दल पर भी गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम यूएपीए के तहत मुकदमे दर्ज हुए हैं।

जाहिर है वकीलों, पत्रकारों आदि पर हुई इस कार्रवाई ने प्रबुद्ध एवं इंसाफ पसंद समाज में निश्चित ही चिंता की लकीरें पैदा की हैं। एक अग्रणी राष्ट्रीय अखबार का संपादकीय साफ लिखता है कि ‘किस तरह सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ त्रिपुरा पुलिस की इस कार्रवाई को हम खतरनाक कानूनों के अत्यधिक अंधाधुंध इस्तेमाल की एक और मिसाल कह सकते है।

संपादकीय यह भी लिखता है कि कि आखिर किसी राज्य विशेष में समुदाय केंद्रित हिंसा के मामले में सरकार की कथित कमियों की बात करना और न्यायिक जांच की मांग को रेखांकित करना-ऐसी कार्रवाई जो किसी भी स्वस्थ्य लोकतंत्र के तहत नागरिक समाज की सक्रियताओं का हिस्सा मानी जाती है।

जिसके जरिए लोकतंत्र के कर्णधारों पर दबाव डाला जाता है-वह किस तरह गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम की धारा 13 के तहत ‘अपराध’ में शुमार होगा, जो उस कार्रवाई पर लागू होता है जो ‘अलगाव को बढ़ावा देती है या ‘भारत की संप्रभुता को चोट पहुंचाती है’ या ‘भारत के खिलाफ असंतोष पैदा करती है।

’ एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया के हालिया वक्तव्य में भी इस ‘बेहद खतरनाक प्रवृत्ति ’ के बारे में चिंता प्रगट की है और आला अदालत से यह अपील की है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे और दिशानिर्देश जारी करे।

इसमें कोई दोराय नहीं कि समूचा घटनाक्रम जितनी तेजी से विकसित हो रहा है, उसकी कल्पना तक नागरिक आजादी के लिए सक्रिय उन चार वकीलों-अमित श्रीवास्तव, मुकेश कुमार, एहतेशाम हाशमी और अंसार इंदौरी-ने की नहीं होगी, जो त्रिपुरा सरकार के निशाने पर हैं।

इस समूचे प्रसंग में आगे क्या होगा इसकी तुरंत भविष्यवाणी करना मुश्किल है, लेकिन अब ऐसे दमनकारी कानूनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर जारी बातचीत देश की सीमाओं के अंदर ही नहीं बल्कि बाहर भी तेज होगी।

ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि संयुक्त राट्रसंघ के मानवाधिकार के उच्चायुक्त ने भी कहा है कि भारत में यूएपीए का बढ़ता इस्तेमाल चिंताजनक है। उनकी तरफ से यह भी कहा गया है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ता अंकुश और पत्रकारों पर बढ़ते प्रतिबंध चिंता की स्थिति पैदा करते हैं।

गौरतलब है कि ऐसी रिपोर्टें उपलब्ध हैं जो बताती हैं कि हाल के सालों में किस तरह दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल बढ़ा है। इतना ही नहीं इस बात के प्रमाण भी उपलब्ध हैं कि सरकारें कई दफा सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की भी अनदेखी करती हैं।

आंकड़े बताते हैं कि विगत दशक में राष्ट्रीय नेताओं की आलोचना करने के लिए 400 लोगों पर देशद्रोह की धारा लगायी गई और जिनमें से ‘96 फीसदी मामले’ मोदी के सत्तारोहण के बाद (2014) और भाजपाशसित राज्यों से ही ऐसे मामलों की संख्या अधिक है।

जब हम दमनकारी कानूनों के बारे में उच्च स्तरीय न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय कुछ करेगा, उसकी वजह भी स्पष्ट है।

दरअसल हाल के समय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाने में केंद्र सरकार पर अंकुश लगाने के लिए संकोच नहीं किया।

फिर चाहे पेगासस जासूसी स्पायवेअर मामले में केंद्र सरकार के तमाम विरोध के बावजूद अपने ही निरीक्षण में विशेषज्ञों की कमेटी बनाने की बात हो या लखीमपुरी खेरी में किसान आंदोलन के लोगों को कुचले जाने का मामला हो, जिसमें लिप्त होने के आरोप एक मंत्री पुत्र पर लग रहे हैं, उसमें राज्य सरकार को उलाहना देना हो, वह आगे रहा है


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