Saturday, May 23, 2026
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हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व

SAMVAD

 


KRASHAN PRATAP SINGH 1निसंदेह, इसे विडम्बना छोड़ कुछ नहीं कहा जा सकता कि जहां इस समय हिंदू धर्म को अपने समाज के सुधार के लिए व्यापक आंदोलन की दरकार है,उसे हिंदुत्व नाम की उस राजनीतिक विचारधारा से उलझना पड़ रहा है, जिसके प्रवर्तक हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर खुद लिख गए हैं कि उसका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और जो न सिर्फ खुद को हिंदू धर्म से ऊपर मानती आई है, बल्कि उसे भूगोल, रक्त, देश और इतिहास वगैरह से जोड़कर सीमित व हीन भी बनाती रही है। बात को ठीक से समझने के लिए उसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की हिंदू धर्म व हिंदुत्व में फर्क या सलमान खुर्शीद द्वारा अपनी ‘सनराइज ओवर अयोध्या’ शीर्षक पुस्तक में हिंदुत्व की आईएसआईएस व बोकोहरम जैसे अतिवादी संगठनों से तुलना वाली टिप्पणियों से अलग करना और इस मर्म तक जाना होगा कि जिसे हम हिंदू धर्म कहते हैं, वह अतीत में उसे जड़ बना डालने की तमाम कोशिशों के बावजूद सतत प्रवहमान रह सका तो सामाजिक सुधार के आंदोलनों की लंबी परंपरा के ही कारण।

यह परम्परा नहीं होती तो हिंदू धर्म में पैठ बना चुकी सती और कन्या वध जैसी अनेक दारुण कुरीतियों का उन्मूलन संभव ही नहीं होता।

ऐसे आंदोलनों के अवसान का ही कुफल है कि विविधता को सहजतापूर्वक स्वीकार करने की हिंदू धर्म की परम्परा आज जीवन्त के बजाय जड़ होती दिखाई देने लगी है और उसके जाये पदानुक्रम व असमानता जैसे तत्व संस्थागत रूप पा गए हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो यही कारण है कि उसके अनेक अनुयायी इक्कीसवीं सदी में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं समझते, उन्हें अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने तक के अधिकार से वंचित रखना चाहते हैं, साथ ही पुरुषों को पितृसत्तावादी मान्यताएं व विचार नहीं बदलने देते, संविधान के शासन के सात दशकों बाद भी कई जातियों को अनौपचारिक तौर पर दलित, वंचित और अछूत बनाए हुए हैं और जब भी चुनाव आते हैं, उन्हें हर हाल में जातियों के युद्ध में बदल देते हैं। कुछ जातियों को हमेशा बाकियों से ज्यादा महत्व देकर सिर पर बैठाये रखते हैं और शेष को हाशिये पर डाले रखते हैं।

ऐसे में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को यह देखकर दु:ख ही होगा कि इस स्थिति को बदलने के लिए हिंदू धर्म या समाज के भीतर से किसी पहल के दूर-दूर तक कोई आसार नजर नहीं आते।

फिर भी उसकी खुशी का कम से कम एक वायस है कि इस धर्म ने अभी भी बहुत हद तक अपने उन तत्वों को बचाए रखा है, जिनके मद्देनजर कई विचारक उसे धर्म के बजाय जीवन पद्धति के रूप में देखते हैं।

इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि उसका हिंदू नाम भी ‘दूसरों’ का दिया है और उसको अंगीकार किये रखने में उसे कभी कोई परेशानी नहीं होती।

अलबत्ता, आज, नये जमाने के कई हिंदुत्ववादी अपनी राजनीति की सुरक्षा के लिए यह तो चाहते हैं कि सारे हिंदू गर्व से अपने हिंदू होने का एलान किया करें, लेकिन खुद को उसके ‘बड़प्पन’ का वारिस नहीं सिद्ध कर पाते।

उलटे अपने देवताओं व पूजापद्धतियों के चुनाव की हिंदुओं की स्वतंत्रताएं छीन लेना चाहते और एक संस्था के आदेशों के अनुपालन व अनुशासन के प्रति समर्पण की अपनी खास कसौटियों के तहत हिंदुत्ववादी बना देना चाहते हैं।

प्रसंगवश, हिंदू धर्म की प्राचीनता या सनातनता, के विपरीत हिंदुत्व की अवधारणा अभी शताब्दी भर भी पुरानी नहीं पड़ी है। हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर ने अपने सुनहरे दिनों में अपनी राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इसका प्रवर्तन किया तो उसके पीछे ‘हिंदू सभ्यता की पराजयों, आक्रांताओं के हाथों उसे मिलती रही गुलामियों और अपमानों’ जैसे ऐतिहासिक कारकों से पैदा हुई कुंठाएं थीं।

निस्संदेह, ये कुंठाएं हिंदुओं में परंपरा से चली आती ‘भूल जाओ और क्षमा कर दो’ जैसी उदात्त भावनाओं का विलोम थीं और भारत के हिंदूकरण और हिंदुओं के सैन्यीकरण में विश्वास करती थी।

सावरकर के निकट उनकी हिंदुत्व की अवधारणा न सिर्फ राजनीतिक बल्कि हिंदू धर्म से ऊपर भी थी। इसे यों समझ सकते हैं कि हिंदू रहते हुए तो कोई व्यक्ति किसी भी देवी-देवता की किसी भी रूप में पूजा-अर्चना कर सकता और ‘सबै भूमि गोपाल की’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ या ‘हिंद देश के निवासी सब जन एक हैं’ जैसे विचारों को अपने आचरण में उतार सकता है, लेकिन उसके हिंदुत्ववादी होने की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि वह भारत पर पहला हक उनका ही माने, जिनकी वह पितृभूमि भी है, कर्मभूमि भी और पुण्यभूमि भी। यानी जिनकी भारत भूमि के प्रति प्रतिबद्धता अखंड है।

गौरतलब है कि इस मान्यता के तहत मुसलमान और ईसाइयों जैसे अल्पसंख्यक तो क्या, विदेश में पैदा हुए और पले-बढ़े हिंदू भी पितृभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि वालों जितने भारतीय नहीं रह जाते। मुसलमान और ईसाई तो अपने सारे नागरिक अधिकारों का विसर्जन की शर्त पर ही देश में रह सकते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि हिंदुत्व की इस राजनीतिक अवधारणा में वैसी असहमतियों और बहसों की भी गुंजायश नहीं है जो अतीत में सनातन या हिंदू धर्म के अलग-अलग मतों में चलती रही है।

जाहिर है कि यह अवधारणा न हिंदूसम्मत है और न संविधानसम्मत। फिर भी एक राजनीतिक संप्रदाय के अनुयायी, जिनमें हमारे आज के सत्ताधीश भी शामिल हैं, इस तर्क के साथ इसको हिंदू धर्म का पर्याय बनाना चाहते हैं कि वह सावरकर के वक्त में ही नहीं रुकी हुई और समय के साथ खुद को अनुकूलित, विकसित और परिवर्धित करती रही है।

अगर नहीं तो क्या यह भ्रम पैदा कर उसका लाभ उठाने की वैसी ही रणनीति नहीं है, जिसके तहत सावरकर ने बहुत सोच समझकर अपनी राजनीतिक विचारधारा को हिंदुत्व का नाम दिया, ताकि जब भी उसकी आलोचना की जाए, हिंदुओं को लगे कि हिंदू धर्म की आलोचना की जा रही है।

वे यह न समझ सकें कि हिंदुत्व वास्तव में हिंदू धर्म का नहीं, हिंदू राष्ट्रवाद का दस्तावेज है, जिसे किसी भी लोकतांत्रिक संविधान के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता। सच पूछिये तो हिंदुत्व का दस्तावेज हिंदू धर्म को राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़कर उसकी सारी उदात्त अपीलों को संकुचित करता और अपना स्थान उससे ऊपर कर लेता है।

अकारण नहीं कि धर्म की राजनीति वाले उसके पोस्टरों में कृष्ण राधा से, राम सीता से तो शिव पार्वती से अलग कर दिये जाते हैं। उसके समर्थकों को वेलेटाइन डे तो नहीं ही बर्दाश्त होता, प्रेम, श्रृंगार और माधुर्य की हिंदू भक्ति परम्परा से भी उसका कोई लेन-देन नहीं होता।

क्या आश्चर्य कि हिंदुत्व के आलोचकों को लगता है कि वह उस हिंदू धर्म को ही नष्ट करने में लगा है जिसे बचाने का दावा करता है और उनके संकीर्ण राष्ट्रवाद में किसी को भी इत्मीनान या सुकून नहीं हासिल होने वाला।


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