
एक आदमी था। वह हर रोज हनुमानजी के मंदिर में पूजा करने आता था और रोज दीया जलाता था। सर्दी -गर्मी और बरसात का उस पर कुछ असर नहीं होता था। लगता था, जैसे उसे हनुमान से अगाध श्रद्धा थी। वहां मौजूद रहने वाला पुजारी रोज उसे देखता था। एक दिन पुजारी ने हनुमान भक्त से पूछा, ‘ऐसा लगता है कि आपको हनुमान में ज्यादा श्रद्धा है, इसलिए बिना नागा पूजा करने आते हो।’ हनुमान के परम भक्त ने जवाब दिया, ‘ हां, ऐसा ही है, हनुमान जी ने मुझ पर कृपा की थी। मैंने हनुमानजी से मनौती मांगी थी। मुझ पर मुकदमा चल रहा था। मैंने मन ही मन मनाया की हे! प्रभु, यह मुकदमा जीत जाऊंगा तो आपके पास आकर हर रोज दीया जलाया करूंगा। मैं वह मुकदमा जीत गया। तभी से मैं यहां हर रोज दीया जलाने आता हूं।’ पुजारी ने पूछा, ‘वह मुकदमा क्या था?’ हनुमान भक्त ने सब कुछ सच बता दिया। उसने किसी की जमीन दबा ली थी। इसके विरोध में उस भूमिहीन ने मुकदमा दायर कर दिया था। अदालत में पैसे की माया चलती है। बेचारे भूमिहीन के पास इतने रुपए कहां से आते? वह कुछ नहीं कर सका। इधर, हनुमान भक्त को वकील अच्छा मिल गया और वह मुकदमा जीत गया। उसके अनुसार मुकदमा जिताकर हनुमान जी ने उस पर कृपा की है। पुजारी ने कहा, ‘भले मानस यह कृपा कैसे हुई?’ लेकिन इसका क्या किया जाए कि हनुमान भक्त तो उसे कृपा ही समझ बैठा था। बरसों से हनुमानजी के सम्मुख दीया जलाता रहा, पर प्रेम का दीया नही जला पाया। अस्तु, मनुष्य को बुरे कर्मों से बचना चाहिए। बुरे कर्मों में सफल होने से मनुष्य पर कृपा नहीं होती, बल्कि वह पाप की दलदल में फंसता चला जाता है। अत: उसे मन में प्रेम का दीया जलाकर सदैव अच्छे कार्य करने चाहिए।


