Saturday, March 28, 2026
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सिवाल को लेकर रालोद नेताओं की बेचैनी बनी खास

  • रालोद प्रत्याशियों में रुकने का नाम नहीं रहा तूफान

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: रालोद में कुछ टिकटों को लेकर तूफान खड़ा हो गया हैं। यह तूफान शांत होगा या फिर नहीं? इसको लेकर रालोद के शीर्ष नेताओं में बेचैनी साफ देखी जा रही हैं। मथुरा की मांट सीट पर रालोद राष्टÑीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने योगेश नहदौर को टिकट दिया था। पर्चा भी दाखिल कर दिया गया, लेकिन अब जयंत चौधरी नामांकन वापस करने के लिए कह रहे हैं। ऐसे में योगेश नहदौर ने नामांकन वापसी करने से मना कर दिया हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि मांट में रालोद और सपा के प्रत्याशी आमने-सामने हो गए हैं। जब प्रत्याशी आमने-सामने आ गये हैं तो फिर गठबंधन कैसा? इसको लेकर तमाम तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। मांट ही नहीं, बल्कि मेरठ की सिवालखास सीट पर भी सपा के गुलाम मोहम्मद को चुनाव मैदान में उतारने के बाद जाट समुदाय में विरोध पैदा हो गया है।

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दरअसल, सिवालखास विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम व जाट दो बिरादरी बेहद अहमियत रखती हैं। हालांकि जाट ही निर्णनायक वोटर की भूमिका में रहा हैं। सपा के गुलाम को जाट गले से नीचे नहीं उतार पा रहे हैं, जिसका चुनाव में सीधा नुकसान हो सकता हैं। भाजपा ने मुनिंदरपाल को चुनाव मैदान में उतारा हैं, वह भी जाट हैं। इस विवाद में भाजपा के मनिंदरपाल को लाभ मिल सकता हैं, ऐसी संभावनाएं बनी हुई हैं।

रालोद-सपा गठबंधन पश्चिमी यूपी में बेहद अहम था। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जिस तरह का माहौल पश्चिमी यूपी में पैदा हुआ था, उसके बाद स्व. अजित सिंह ने सद्भावना की पटरी पर लाने का काम किया था, लेकिन उनके द्वारा की गई मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा हैं। पश्चिमी यूपी में सिवालखास की सीट सपा के खाते में जाने के बाद जाट समुदाय में बिखराव हो सकता हैं तथा सपा-रालोद के गठबंधन का खेल बिगाड़ सकता हैं।

इस सीट का नुकसान सरधना, हस्तिनापुर, बुढ़ाना, बागपत, बड़ौत में भी हो सकता हैं। रालोद को पैदा हुए विवाद से बचने के लिए कोई रणनीति बनानी होगी, लेकिन पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद के रवैये से भी जाट समुदाय के लोग नाराज हैं। इसी वजह से इस विवाद को और ज्यादा हवा दी जा रही हैं, जिसके चलते सपा-रालोद को नुकसान हो सकता हैं। गुरुवार को विवाद को शांत करने के लिए पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद व रालोद नेता डा. राजकुमार सांगवान को एक-दूसरे से गले भी मिलवाया गया। ये तस्वीर इटरनेट मीडिया पर वायरल की गई।

गले तो मिले, लेकिन डा. राजकुमार सांगवान के चेहरे पर उदासी साफ झलक रही हैं। वो गहरी चिंता में हैं। क्योंकि पूरी जिंदगी रालोद की सेवा करते हुए बीत गई, लेकिन यह जीवन का अंतिम पड़ाव चल रहा हैं। इसके बाद तो उमदराज हो जाएंगे। भागदौड़ भी नहीं कर सकेंगे। यही वजह है कि रालोद के कार्यकर्ता भी इसको लेकर पार्टी अध्यक्ष जयंत चौधरी के इस निर्णय से नाराज हैं। उनकी नाराजगी का नतीजा पूर्व जिलाध्यक्ष राहुल देव के त्यागपत्र के रूप में सामने हैं। कई और भी रालोद नेता नाराज हैं, जिनकी तरफ से भी रालोद को अलविदा कहा जा सकता हैं।

नल के गढ़ में ही पानी सींचने वालों का टोटा

वेस्ट यूपी में गंगा-यमुना के बीच का इलाका राष्ट्रीय लोकदल का गढ़ कहा जाता है, मगर इस बारचुनाव में नल के पास अपने गढ़ में ही पानी सींचने वालों की कमी साफ दिखाई दे रही हैं। यह हाल तब है जब इस क्षेत्र में किसान आंदोलन का बड़ा असर है और यहां की जनता रालोद की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। इसके बावजूद अपने गढ़ में रालोद ने आधा दर्जन सीटों पर सपाइयों को नल से पानी निकालने की जिम्मेदारी दी है।

अब इसे गठबंधन धर्म की मजबूरी कहे या फिर जिताऊ और टिकाऊ नेताओं की पार्टी में कमी, मगर रालोद के इस कदम से उसका मतदाता आहत दिखाई दे रहा है। अब टिकट वितरण के बाद बना चुनावी माहौल गठबंधन के लिए पहले जैसा नजर नहीं आ रहा है। कुछ क्षेत्रों में हो रहे विरोध ने स्थिति में पहले से अंतर पैदा कर दिया है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि रालोद ने अपने सिबंल पर मेरठ और मुजफ्फरनगर जिले की आधा दर्जन सीटों पर सपाइयों को टिकट दिया है, जो इस बात का साफ संकेत है कि कहीं न कहीं नल के पास अपने सबसे मजबूत इलाके में पानी सींचने वालों का टोटा था।

यहीं वजह रही की मुजफ्फरनगर की चार और मेरठ की जिन दो सीटों पर रालोद के नल पर प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, वह सपा के नेता हैं। पहले चरण के चुनाव में इस तरह के हालात बनने के बाद रालोद के मतदाताओं का भरोसा गठबंधन पर डगमगाने लगा है।

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