- चुनाव का तरीका बदला तो बदल गए लोग भी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: वक़्त ने सब कुछ बदल दिया है। पहले चुनाव में लोग उम्मीदवार की काबिलियत के आधार पर वोट डालते थे, लेकिन अब लोग पैसे वाली पार्टी के पीछे भागते है। अब न तो मुद्दों पर और न ही उसूलों पर चुनाव होते हैं। जीत हासिल करने के लिये लोग समाज को बांटने से भी पीछे नहींं हट रहे हैं।

शहर की सीट हमेशा से संवेदनशील रही है। इस पर हमेशा लोगो की निगाहें रहती है। ताला फैक्ट्री निवासी मोहम्मद कासिम का कहना है कि 50 साल पहले लोग चुनाव आते ही रोमांचित हो जाते थे। बिल्ला और पम्पलेट लेने के लिए लोग भागते रहते थे। सबसे बड़ी बात यह है कि लोग काबिलियत देख कर लोग वोट डालते थे। आपसी तालमेल दिखाई देता था। हर कोई उम्मीदवारों की बात सुनता था।
यही कारण था कि हर कोई चुनाव का इंतजार करता था। कासिम ने बताया कि पहले ज्यादा वोर्ट्स नहीं थे इस कारण ज्यादा मारामारी नहीं थी। हर पार्टी के लोग समझा कर निकलते थे। उस वक़्त पैसे का जोर नहीं होता था। गरीब भी चुनाव लड़ लेता था। व्यवसायी इलियास अहमद का कहना है कि अब लोग जाति और धर्म देखकर वोट डालते है। जबकि पहले ऐसा कुछ नहीं था। इस सीट पर एक से बढ़ कर एक लोग जीते है, जिन पर शहर को गर्व है।
उनका मानना है कि चुनाव आयोग ने जिस तरह से सख्ती की है वो कुछ हद तक सही भी है, लेकिन चुनाव की जो गरमाहट होती है वो अब नहीं दिखती। पहले बच्चे भी चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। एक बात यह अच्छी हुई है कि पहले की तरह लोगों के घरों की दीवारों को खराब नहींं किया जाता है।
एक नजर सीट पर
शहर सीट के इतिहास पर यदि नजर डाले तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके लक्ष्मीकांत वाजपेयी मेरठ शहर विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक रहे हैं। साल 1989 के चुनाव में लक्ष्मीकांत वाजपेयी पहली बार बीजेपी से विधायक निर्वाचित हुए। साल 1993 में जनता दल के टिकट पर मैदान में उतरे हाजी अखलाक ने वाजपेयी को हराया।
1996 और 2002 में लक्ष्मीकांत वाजपेयी विजयी रहे, लेकिन 2007 में यूपीयूडीएफ के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे हाजी याकूब ने उन्हें हरा दिया। 2012 में वाजपेयी मेरठ शहर सीट से चौथी बार विधानसभा पहुंचने में सफल रहे। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में डा. वाजपेयी को हार का मुंह देखना पड़ा। मेरठ शहर सीट से सपा के रफीक अंसारी ने यूपी भाजपा के पूर्व विधायक लक्ष्मीकांत वाजपेयी को हरा दिया। रफीक को एक लाख तीन हजार 217 वोट मिले। जबकि लक्ष्मीकांत वाजपेयी को 74 हजार 448 वोट मिले थे।

