जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: फर्जी सोसाइटी का महाखेल चल रहा है। फर्जी सोसाइटी बनाकर दूध के व्हाइट कारोबार को दागदार बनाया जा रहा है। एक-दो नहीं, बल्कि कई फर्जी समितियां संचालित की जा रही हैं, जिनकी जांच पड़ताल भी आरंभ हो गई है। दूध खरीदने वाली फर्जी समितियां के मामले में कौन-कौन लिप्त है?

यह तो जांच के बाद ही खुलासा होगा, लेकिन इसमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हैं। ऐसा सूत्र बता रहे हैं। संबंधित आला अफसर इसकी जांच भी कर रहे हैं। इस पूरे फर्जीवाड़े में पराग के अधिकारी भी लिप्त हो सकते हैं। क्योंकि फर्जी समितियों से ही दूध खरीदा जा रहा हैं? समितियों पुरानी थी, फिर नई समितियां कैसे बढ़ गयी? इसकी भी जांच पड़ताल होनी चाहिए।
आखिर इन नयी समितियों को दूध खरीदने की अनुमति किसने दी? इन तमाम बिन्दुओं पर जांच पड़ताल की जानी चाहिए, तभी सच उजागर हो सकेगा। हालांकि डीडीआर के पास इसकी जांच चल रही हैं, जांज अभी पूरी नहीं हुई। जांच पूरी होने के बाद ही किस-किस पर गाज गिरेगी, फिलहाल यह कहना मुश्किल होगा।
डीडीआर कब तक जांच पूरी करते हैं, इसके बाद ही यह पता चल सकेगा कि इसमें कितने लोगों की भूमिका हैं? उन सभी पर शिकंजा कसा जा सकता हैं। इसके लिए भी आला अफसरों के स्तर से बड़ी कार्रवाई की जा सकती हैं।
क्या है समितियां
समितियों के माध्यम से ही पराग दूध की खरीद करता है। ये समितियां पराग में पंजीकृत हैं, ये समितियां ही किसान से दूध खरीदती हैं। फिर इन समितियों से पराग दूध खरीदता हैं, लेकिन यहां समितियां दूध तो खरीद रही है, लेकिन ये तमाम समितियां नई हैं।
पुरानी समितियों का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इसमें कुछ बिचौलिया जुटे हैं, जो किसान को भी आर्थिक चोट पहुंचा रहे हैं। पराग से पूरा पैसा मिल भी रहा है या फिर नहीं, यह भी सवाल उठ रहा हैं? इसकी भी जांच पड़ताल होनी चाहिए। पराग एक अर्द्धसरकारी संस्था हैं, जो किसान से सीधे दूध खरीदने की बजाय समितियों के माध्यम से दूध खरीदने का काम करती हैं।
समितियों में भी वहीं समिति दूध खरीद सकती है, जिसका पंजीकरण हैं। यदि पंजीकरण नहीं है तो उसे दूध खरीदने का अधिकार नहीं है।
पराग के खर्चों को लेकर भी उठ रहे सवाल
पराग में जो खर्चे दर्शाये जा रहे हैं, उनको लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मेरठ पराग आॅफिस से कुछ ऐसे खर्चे दर्शाये जा रहे हैं, जो लोग काम तो किसी अन्य जनपद में कर रहे है तथा उनका वेतन मेरठ पराग आॅफिस से निकाला जा रहा हैं।
इसके रिकॉर्ड में भी यह दर्शाया गया हैं, लेकिन कर्मचारियों की मौजूदगी मेरठ में ही दर्शायी गयी हैं, लेकिन जो सच है उसमें कर्मचारी बाहर जनपद में काम कर रहे हैं। इसकी भी जांच पड़ताल होती है तो कई अफसरों की गर्दन फस सकती हैं।

