Thursday, June 18, 2026
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समाज सेवा का मुखौटा कमाई का साधन

दरअसल जब उनकी मूंछें उगनी शुरू हुई थीं और चाहते न चाहते एक अच्छी जगह नौकरी भी लग गई थी, तब से वे लगातार सोचते थे..यार गुरु भीड़ का हिस्सा बन कर और नौ से पांच की नौकरी करते जिंदगी निकाल दी तो क्या जिये..? हमें तो भीड़ से अलग होकर जीना है। न सिर्फ जीना है धन भी कमाना है।खुराफाती दिमाग के मालिक थे ही।नौकरी करते अपने जैसे खोपड़ी के दो चार साथी ढूंढ लिये जिनका काम में कम और दीगर बातों में मन ज्यादा रमता था। इन्हें लगता था या तो पुलिस या कोई बड़ा प्रशासनिक अधिकारी या दादा पहलवान या राजनीति में चमकता नेता या समाजसेवी भीड़ में भी अलग ही चमकता है। अब पुलिस अफसर क्या सिपाही भी बन नहीं पाये। दब्बू स्वभाव के चलते दादा पहलवानों से इस तरह झुक कर मिलते कि लगता इनकी रीढ़ की हड्डी ही नहीं है। हां, चमचों को साथ लेकर इस उस नेता के यहां हाजिरी जरूर लगा देते थे। इन्हें लगा कि समाजसेवी का मुखौटा ओढ़ना ज्यादा फायदे का सौदा है ।

नौकरी करते-करते मंडली ने पहला काम ये किया कि बड़ी पोस्ट पर आने वालों और छोड़कर जाने वालों को एक सौ एक किलो के हार से स्वागत या बिदाई की शुरुआत कर दी। आने वाला हो या जाने वाला उच्च अधिकारी, उन्हें अजगर हार पहनाकरइन्होंने देखा हार के बहाने जीत इनका दरवाजा खटखटाने लगी है और ये भीड़ में रहकर भी भीड़ से अलग नजर आने लगे। बस फिर हो गया सिलसिला शुरू। फूलों के ‘हार’ को अपनी जीत का हार बनते देख इन्होंने उसे अपना हथियार बना लिया। पहला काम इन्होंने ये किया कि अपनी मंडली को सर्व धर्म की चुनरी ओढ़ा कर उसमें अपने जैसे खुराफाती हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और एक दो फक्कड साधुओं को शामिल कर लिया और फिर शहर में नियुक्ति पर आने जाने वाले बड़े प्रशासनिक अफसरों का स्वागत बिदाई ‘सर्वधर्म’ टीम के हाथों करना शुरू कर दिया।

आने जाने वालों, नेता नगरी मंत्री संत्री का स्वागत कर अपना चेहरा चमकाने के लिए उनके साथ फोटो, उनका महिमामंडन मीडिया की सुर्खियों में बना रहे इसलिए उपहारों और भेंट पूजा के साथ समय-समय पर मीडिया के गले में भी अपनी जीत का हार डालने से वे नहीं चूकते। मीडिया मे छपने वाले फोटो का एंगल कैसा हो वे खूब जानते थे। शहर में होने वाले धार्मिक आयोजनों में प्रतिवर्ष उन्होंने भोजन भंडारे के पंडाल लगाना भी शुरू कर दिया और उसके नाम पर इससे उससे उगाई भी। हालांकि उनके ‘हींग लगे ना फिटकरी रंग भी चोखा आए’ वाले फार्मूले और उनकी नीयत को पहचान कर लोगों के बीच उनकी पहचान अजगर हार वाले नकली समाजसेवी जादूगर की बन गई थी। आज वे अपने समाजसेवी के मुखौटे के साथ भीड़ से अलग भी दिखाई दे रहे हैं। लोगों के लिए उदाहरण भी बने हुए हैं कि भीड़ से अलग दिखते हुए कैसे नकली समाजसेवी का मुखौटा ओढ़कर भरपूर कमाई भी की जा सकती है। बेरोजगार युवा चाहें तो उनके अजगर हार वाले ‘फन’ को अपना कर समाजसेवी बन सकते हैं।

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