Wednesday, June 16, 2021
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एलोपैथी पर बेतुके बयान क्यों ?

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भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) की आपत्ति के बाद पतंजलि योगपीठ ने कहा है कि बाबा रामदेव कोरोना काल में कठिन परिश्रम कर रहे डॉक्टरों का पूरा सम्मान करते हैं और उनकी आधुनिक चिकित्सा पद्धति से चिकित्सा करने वाले डॉक्टरों के प्रति कोई गलत मंशा नहीं है। गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में बाबा रामदेव ने कहा था कि एलोपैथी ‘मूर्खतापूर्ण विज्ञान’ है और कोविड-19 के इलाज के लिए मंजूर की गई रेमडेसिवर, फेवीफ्लू तथा ऐसी अन्य दवाएं बीमारी का इजाज करने में असफल रही हैं। एलोपैथी दवाएं लेने के बाद लाखों की संख्या में मरीजों की मौत हुई है। बाबा रामदेव के इस बयान के बाद आईएमए ने नोटिस भेजकर माफी मांगने और बयान वापस लेने को कहा था। इस मुद्दे पर पतंजलि योगपीठ द्वारा कदम पीछे हटाने के बाद बाबा रामदेव ने फार्मा कंपनियों और आईएमए से 25 प्रश्न पूछे हैं। ये प्रश्न कई रोगों के इलाज से जुड़े हैं। इन प्रश्नों में कई रोगों के इजाज में अंग्रेजी दवाओं के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए हैं।

दरअसल बाबा रामदेव के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हर विषय पर अपना ज्ञान झाड़ना शुरू कर देते हैं। पहले भी वे कई बार तर्कहीन बयान दे चुके हैं। चाहे काले धन का मुद्दा हो या फिर राजनीतिक मुद्दे हों, वे हर विषय पर ऐसे बात करते हैं जैसे कोई विशेषज्ञ बात कर रहा हो। वे योग गुरु हैं, इसलिए उनकी बातों के केंद्र में योग होना चाहिए। उन्होंने योग की बात करते हुए धीरे-धीरे अन्य विषयों पर भी बोलना शुरू कर दिया। एक बार उन्होंने रजत शर्मा के कार्यक्रम ‘आपकी अदालत’ में कहा था कि आप 75-80 रुपये लीटर पेट्रोल देने वाले दल को वोट देंगे या फिर 35-40 रुपये लीटर पेट्रोल देने वाले दल को वोट देंगे। आज इतना महंगा पेट्रोल देने वाले दल को सभी देख रहे हैं। बार-बार उनकी यह हरकत देखकर यह शक भी होता है कि कहीं वे अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए तो इस तरह के बयान नहीं देते हैं।

हर चिकित्सा पद्धति के अलग-अलग गुण और सीमाएं हैं। इसलिए चिकित्सा पद्धतियों को एक-दूसरे का प्रतिद्धंदी नहीं बनाया जा सकता। दुखद यह है कि कुछ व्यापारी और चिकित्सा पेशे से जुड़े कुछ लोग अपने स्वार्थों के चलते चिकित्सा पद्धतियों की तुलना कर उन्हें कमतर या श्रेष्ठ सिद्ध करने की जुगत में रहते हैं। जाहिर है कि जब किसी भी प्रक्रिया से हमारा स्वार्थ जुड़ जाता है तो हम सही और तर्कसंगत विश्लेषण नहीं कर पाते हैं।

यह सही है कि इस दौर में एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति को कुछ डॉक्टरों ने अपने क्रियाकलापों से बदनाम कर दिया है। लेकिन इस आधार पर इस पद्धति और सभी डॉक्टरों को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? मुसीबत की इस घड़ी में एलोपैथिक डॉक्टर कंधे से कंधा मिलाकर कई-कई घंटे काम कर रहे हैं। आज जबकि हमें कुछ समय मास्क पहनना भी भारी लगता है, डॉक्टर और अन्य सहकर्मी पूरे दिन मास्क और पीपीई किट पहन कर काम कर रहे हैं। इसलिए संकट की इस घड़ी में एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति और डॉक्टरों पर सवाल उठाना उनके सेवा भाव और परिश्रम का निरादर करना है। यह सही है कि इस दौर में एलोपैथिक चिकित्सा का जो ढांचा है, उसमें नए किस्म के पढ़े-लिखे दलाल पैदा हो गए हैं। अनेक डॉक्टरों ने चिकित्सा के क्षेत्र को भी दलाली का अड्डा बना दिया है। हमने एक ऐसा तंत्र खड़ा कर दिया है जिसमें गरीब रोगी के लिए कोई जगह नहीं है। यह दु:खद ही है कि कोरोना काल में कुछ डॉक्टरों और इस पेशे से जुड़े व्यापारियों ने इस आपदा को भी अवसर बना लिया। लेकिन इस आधार पर पूरे चिकित्सा तंत्र को बदनाम नहीं किया जा सकता।

बाबा रामदेव ने फार्मा कंपनियों और आईएमए से 25 सवाल भी पूछे हैं। उन्होंने रक्तचाप, कोलेस्ट्रोल थायरायड, आर्थराइटिस, हेपेटाइटिस, सिरदर्द, माइग्रेन समेत अन्य कई बीमारियों का उल्लेख करते हुए पूछा है कि क्या एलोपैथी के पास इन बीमारियों का कोई स्थायी उपचार है? यह सवाल बाबा रामदेव से भी पूछा जा सकता है कि क्या आयुर्वेद और योग के माध्यम से इन बीमारियों को स्थायी रूप से ठीक किया जा सकता है? निश्चित रूप से योग और आयुर्वेद के नुस्खे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, लेकिन क्या पतंजलि योगपीठ से जुड़े बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण यह दावा कर सकते हैं कि योग और आयुर्वेद के माध्यम से वे ताउम्र स्वस्थ रहेंगे। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने भी एलोपैथी की सेवाएं ली हैं। इसलिए किसी एक चिकित्सा पद्धति पर जरूरत से ज्यादा विश्वास और अहंकार करना तर्कसंगत नहीं है। नियमित रूप से योग करने और आयुर्वेद अपनाने के बाद भी कई लोग बीमार हुए हैं।

आज एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति और इस पद्धति के व्यावसायीकरण पर सवाल उठाया जा रहा है, लेकिन क्या यह दावा किया जा सकता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति व्यावसायीकरण के शिकंजे से मुक्त है? कटु सत्य यह है कि आज अपने स्वार्थ के लिए आयुर्वेद को भी भुनाने की कोशिश की जा रही है। इस दौर में कुछ मठाधीशों द्वारा यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि आयुर्वेद हर समस्या का समाधान है। योग और आयुर्वेद केंद्रित महंगे-महंगे निरोगाधाम केंद्र भी पैकेज के रूप में उपलब्ध हैं। यहां सभी सुख-सुविधाएं मौजूद हैं। आज बाजार में आयुर्वेद के नाम पर हजारों उत्पाद बिक रहे हैं।

इन उत्पादों के विज्ञापनों में बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन जब इन्हें इस्तेमाल किया जाता है तो उपभोक्ता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। आयुर्वेद को लेकर ऐसे-ऐसे लोग दावे पेश करते हैं जिनके पास न तो आयुर्वेद की कोई डिग्री है और न ही कोई अनुभव है। यह सही है कि आयुर्वेद हमारा परम्परागत ज्ञान है और इसके काफी नुस्खे प्रकृति और हमारे घरों के मसालों और जड़ी-बूटियों से ही तैयार होते हैं। लेकिन जब तब हमें शरीर क्रिया विज्ञान की समस्त जानकारी नहीं होगी, हम आयुर्वेद पर साधिकार बात कैसे कर सकते हैं? दु:खद यही है कि आयुर्वेद पर ऐसे लोग भी ज्ञान पेलने लगते हैं जिन्हें शरीर क्रिया विज्ञान की कोई आधारभूत जानकारी भी नहीं होती है।

हमें यह समझना होगा कि एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धतियां एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं करती हैं। इसलिए इन चिकित्सा पद्धतियों की तुलना करना या किसी पद्धति को छोटा-बड़ा सिद्ध करना तर्कसंगत नहीं है। हर पद्धति के गुण दोष हैं और हर पद्धति मे अच्छे-बुरे लोग हैं। अपने स्वार्थों के लिए किसी भी पद्धति आधार पर बड़बोलापन तर्कसंगत नहीं है। आज जरूरत इस बात की है कि संकट की इस घड़ी में हर चिकित्सा पद्धति में ईमानदारी और जज्बे के साथ काम करने वाले डॉक्टरों और उनके सहकर्मियों को सम्मान दिया जाए। यह समय बेतुके बयान देने और बेवजह विवाद पैदा करने का नहीं है।


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