Wednesday, May 25, 2022
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Homeसंवादसप्तरंगकितनों को रूलाकर वो शख्स चला गया

कितनों को रूलाकर वो शख्स चला गया

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आज का दिन मेरे लिए शोक का दिन है। वह दिन मेरे लिए ही नहीं, वहां जुटे हर साहित्यकार के लिए विशेष था, जब डॉ. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी (वागीश शास्त्री) जी से पहली मुलाकात हुई थी। होटल में ऐसे साहित्यकार भी थे, जिन्हें हम टीवी पर देखते थे। हम पति-पत्नी सब के साथ लखनऊ के होटल से हिंदी संस्थान के लिए निकल रहे थे। मुझे मेरी पुस्तक ‘एक और वैदेही’ के लिए पुरस्कार मिलना था। लिफ्ट में मेरी नजर लगभग 85 वर्षीय व्यक्ति पर पड़ी। मैंने अभिवादन किया तो उन्होंने ‘खुश रहो बिटिया’ उत्तर दिया। नीचे उतरे तो रिसेप्शन के सामने बिना परिचय के मैंने उनके पास खड़े होते हुए पति से कहा, ‘सुनो सर के साथ मेरी तस्वीर खींच दो। पति ने खींच दी। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से आयोजन के बाद होटल लौटे।
रात को मुख्यमंत्री आवास में हम सबका भोज था। वहां अखिलेश जी जब सबसे मिल रहे थे, गुरु जी के पास आकर उन्होंने उनके पांव छुए । तब तक मुझे उनके बारे में कुछ जानकारी न थी। हम घर आ गए थे। पति ने उनके बारे में बेटे से कुछ बातें आदतन पता कर ली थीं। दूधनाथ जी को भारत भारती हिंदी का बड़ा सम्मान मिला था। वे उस आयोजन का दूल्हा रहे थे। गुरुजी मुख्य अतिथि थे।

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दूधनाथ जी ने उन्हें पांव छूकर प्रणाम किया था। तब तक मैं सोच रही थी कि वे कोई विशेष व्यक्ति हैं। घर आने पर एक दिन मैंने पति द्वारा लिए नंबर से बात की। बेटे पहचान गए थे। दीदी बताइये गुरुजी को पुस्तक भेजनी है। लीजिए बात कीजिए। प्रणाम सर। खुश रहो बिटिया, आजकल क्या लिख रही हो? सर बस लगी रहती हूं। आपको अपनी पुस्तक भेज हूं? हां…हां भेजो।

पुस्तक भेजी तो मिलने पर वीडियो पर बोले, बिटिया आपकी पुस्तक मिल गई है। एक दिन उनके बेटे का फोन था। दिल्ली में गुरुजी की पुस्तक का विमोचन और सम्मान था। मुझे निमंत्रण दिया। गाजियाबाद में होने के कारण चली गई। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अनेक पदमश्री हस्तियों के बीच उन्होंने मेरा परिचय कराते हुए मंच से खुद बुलाकर तिलक कर पुरस्कार दिया। आयोजन खत्म होने के बाद पास के ही होटल में जहां रुकने की व्यवस्था थी हम उनके रूम में साथ बैठे। वहां उनसे कुछ वार्ता हुई।

सर आपने लिखने की शुरूआत कैसे की?

मुझे लिखने का शौक था। वाराणसी से प्रकाशित ‘पंडित पत्रिका’, ‘साप्ताहिक संस्कृतम’ में मेरे लेख प्रकाशित होते थे। सप्ताहिक आज, त्रिपथगा, सरस्वती इलाहाबाद में मेरे लेख प्रकाशित होते थे।
आपने कितनी पुस्तकें लिखीं वे किन भाषाओं में हैं?

मेरा साहित्य संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी तीनों भाषाओं में है। 55 मौलिक ग्रंथ हैं। 300 का संपादन किया है।
आपके गुरु प्रेरणा स्रोत सर?

मेरे ऊपर सर्वपल्ली राधा कृष्णन के भाषण का प्रभाव पड़ा। मेरे व्याकरण गुरु पंडित शुकदेव झा और पंडित रघुनाथ शर्मा थे। न्यायशास्त्र का अध्ययन ढुंढीराज शास्त्री के निर्देशन में किया। आधुनिक ज्ञान और शास्त्र की शिक्षा पंडित क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय से ग्रहण की।

सर कुछ संदेश भावी पीढ़ी के लिए?

देश संस्कृति की रक्षा करें। बिना किसी कामना के कर्म करें। ईश्वर सब कुछ देगा।
आपके जीवन की विशेष बाधा और सहयोग?

मेरे आरंभिक जीवन में धन का अभाव रहा। छात्रों को ट्यूशन कर उसका हल निकाला था। शादी हुई तो धन का अधिकांश भाग किताबें खरीदने में जाता था। खाने को पैसे न होते थे। एक वक्त खाना खाते थे। पत्नी नाराज होती थी। धीरे-धीरे समझकर सहयोग करने लगी।

आशु जी ने बताया आपने संस्कृत सीखने की सरल विधि विकसित की?

हां, मैंने अल्पकाल में संस्कृत शिक्षण की हिंदी में वागयोग विधि विकसित की, जिसका भरपूर प्रचार प्रसार, देश विदेश में सफल प्रयोग हुए। विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए। मेरी किसी एक प्रसिद्ध धातु से 64 हजार शब्द व्युत्पादित करने वाली ‘वागीश बीज वृक्ष, धातु निर्भर शब्द कोष’ असाधारण कृति ने देश-विदेश के विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया।

कुछ विशेष ग्रंथ जिन्होंने विश्व स्तर पर पहचान दी?

पाणिनीय धातु पाठ समीक्षा पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कालिदास सम्मान प्राप्त हुआ। तद्धितानता केचन शब्दा, संस्कृत वांग्मयमन्थनम कई और भी हैं।

पुस्तकें उन्होंने जितनी लिखीं, उससे अधिक अध्ययन किया। पुस्तकें इंसान को कहां से कहां पहुंचा देती हैं, इसकी आदरणीय वागीश शास्त्री जी जीती-जागती मिसाल थे। उनके बेटे के बारे में बताए बिना उनका परिचय अधूरा रहेगा। हर कदम पर साथ खड़े उनके बेटे आशु का जीवन पिता के लिए संपूर्ण समर्पित रहा। उनकी पुस्तकें, उनका नाम, उनके साथ यात्राएं सभी छोटे से बड़े काम के लिए वे हमेशा जी जान से एक पैर खड़े रहे। अगर उनकी सभी उपलब्धियों का श्रेय उनके बेटे और उनकी पत्नी को दे दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। गुरुजी की तो साधना रही, उस साधना को प्रकाश में लाने का सारा कार्य उनके बेटे आशापति शास्त्री का रहा।

आशापति का फोन था। कहा, दीदी गुरुजी के जन्मोत्सव में वाग्योग पुरस्कार समारोह का आयोजन भी होगा। आपका नाम भी वागयोग पुरस्कार के लिए है। कौन अल्प परिचय में जूनियर्स के लिए इतना करता है। वे हमारे साथ थे, रहेंगे।
जल-जल के कोई सूर्य सुबह कर चला गया
दिन का हसीन ख्वाब बनाकर चला गया
नक्शेकदम पे चलने की हसरत लिए खड़े
कितनों को कोई शख्स रुलाकर चला गया


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