Sunday, June 7, 2026
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बढ़ सकता है फंसे कर्ज का मर्ज

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SATISH SINGHभारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी दूसरी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) के बढ़ने का अनुमान लगाया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि कोरोनावायरस के ओमिक्रॉनवैरियंटसे अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। रिजर्व बैंक के अनुसार बढ़ती महंगाई भी फंसे कर्ज को बढ़ाने का काम कर रही है। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार सितंबर, 2022 तक बैंकों का फंसा कर्ज 8.1प्रतिशतसे 9.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जो सितंबर 2021 में महज 6.9 प्रतिशत था। हालांकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास के अनुसार अभी बैंकों की वित्तीय स्थिति अच्छी है। महामारी के दौरान सरकार की समीचीन नीतियों और भारतीय रिजर्व बैंक के नीतिगत समर्थन और केंद्रीय बैंक द्वारा उठाए गए उपायों की वजह से बैंकों ने महामारी के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया है। इस दौरान वित्तीय बाजार में भी स्थिरता बनी रही है। लिहाजा, रिजर्व बैंक को पूरा भरोसा है कि बैंक आसानी से बढ़ने वाले फंसे कर्ज से निपट लेंगे। इसके पहले अपनी पहली वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा था कि मार्च 2022 तक बैंकों का जीएनपीए 9.80 प्रतिशत रह सकता है और यदि हालात ज्यादा खराब होंगे तो यह 11. 22 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच सकता है।

मार्च 2021 तक अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का फंसा कर्ज 61180 करोड़ रुपये घटकर 8.34 लाख करोड़ रुपये पर आ गया था, जबकि मार्च 2020 में यह 8.96 लाख करोड़ रुपये था। मार्च 2021 में बैंकों का सकल फंसा हुआ कर्ज (जीएनपीए) कुल अग्रिम का 7.5 प्रतिशत था, जबकि शुद्ध फंसा कर्ज 2.4 प्रतिशत। इससे यह पता चलता है कि बैंकों ने कोरोना महामारी के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया।
सूचीबद्ध बैंकों का जीएनपीए जून 2021 में 8.11 लाख करोड़ रुपये हो गया और इसमें पिछले साल के मुकाबले 2.5 प्रतिशत की कमी आई, जबकि जून, 2020 में यह 8.32 लाख करोड़ रुपये था। इस मानक पर सरकारी बैंकों का प्रदर्शन निजी बैंकों से बेहतर रहा। उनका जीएनपीए 4.2 प्रतिशत कम हुआ, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों का 3.3 प्रतिशत बढ़ा। इस अवधि में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शुद्ध फंसे कर्ज में 4 प्रतिशत की कमी आई, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों का शुद्ध फंसा कर्ज 22 प्रतिशत की दर से बढ़ा।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी सार्वजनिक क्षेत्र के लगभग सभी बैंकों का प्रदर्शन उम्दा रहा है। इस दौरान सूचीबद्ध बैंकों का सामूहिक शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 61 प्रतिशत बढ़ा, जबकि सालाना आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का शुद्ध लाभ 140 प्रतिशत बढ़ा और 5,847 करोड़ रुपये से वह 14,012 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा। वहीं, निजी क्षेत्र के बैंकों का शुद्ध मुनाफा 28 प्रतिशत बढ़ा और वह 14,127 करोड़ रुपये से बढ़कर 18,083 करोड़ रुपये तक पहुंचा। परिचालन लाभ के क्षेत्र में भी सरकारी बैंकों का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उनका परिचालन लाभ निजी बैंकों से करीब दोगुना होकर 16 प्रतिशत बढ़ा। जून तिमाही में सरकारी बैंकों की शुल्क आय में 35 प्रतिशत का इजाफा हुआ, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों का 20.5 प्रतिशत।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा गया है कि कोरोनावायरस की दूसरी लहर की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई थी, लेकिन अब अर्थव्यवस्था में सुधार साफ तौर पर दृष्टिगोचर हो रहा है, लेकिन माना जा रहा है कि कोरोनावायरस का ओमिक्रॉन वैरियंट भारतीय अर्थव्यवस्था को फिर से नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि इसकी प्रसार क्षमता काफी तेज है। भले ही इस वायरस वैरियंट से मरने का प्रतिशत कम है, लेकिन इसमें प्रसार की अभूतपूर्व क्षमता होने की वजह से यह डेल्टा वैरियंटसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। उदहारण के तौर पर अगर डेल्टा वैरियंटसे 100 लोग संक्रमित हुए हैं और उसमें से 10 प्रतिशत यानी 10 लोग मरे हैं तो ओमिक्रॉन वैरियंटसे 20 से 30 गुणा अधिक लोग यानी 2000 से 3000 लोग संक्रमित होंगे और अगर 2000 का 1 प्रतिशत भी इस वैरियंट से मरेंगे तो मरने वालोंकी संख्या 20 होगी, जो डेल्टा वैरियंट से मरने वाले लोगों की संख्या से दोगुनी होगी।

रिजर्व बैंक की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार निजी निवेश अभी भी कोरोना काल के पहले के स्तर पर नहीं पहुंच सका है, जो यह दर्शाता है कि आम लोगों की आय कोरोना काल से पहले के स्तर पर नहीं पहुंच सकी है और वे अपने खर्च में कटौती करने पर मजबूर हैं। बढ़ती महंगाई भी आम लोगों की जेब में सेंध लगा रही है। बिगड़े बजटकी वजह से लोग खर्च नहीं कर पा रहे हैं। इस पर कुछ हद तक काबू पाने के लिए मांग और आपूर्ति के बीच समन्वय बनाने की जरूरत है, लेकिन इस मोर्चे पर संबंधित तंत्र अग्रतर कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। महंगाई बढ़ाने में कुव्यवस्था का भी बड़ा हाथ है। निर्यात से आयात ज्यादा होने की वजह से चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चालू खाते का घाटा (सीएडी)9.3 अरब डॉलर हो गया, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.3 प्रतिशत है, जबकि चालू वर्ष की पहली तिमाही में चालू खाते का अधिशेष 6.6 अरब डॉलर रहा था, जो जीडीपी का 019 प्रतिशत था।
रिजर्व बैंक के अनुसार वित्त वर्ष 2021-22की दूसरी तिमाही में चालू खाते का घाटा बढ़ने का कारण व्यापार घाटा का बढ़कर 44.4 अरब डॉलर हो जाना है, जो इसके पहले की तिमाही में 30.7 अरब डॉलर था। चालू खाते का घाटा का वित्त वर्ष 2021-22 की तीसरी तिमाही में 25 अरब डॉलर से ऊपर रहने की संभावना है, जबकि वित्तवर्ष 2021-22 में चालू खाते का घाटा 40 से 45 अरब डॉलर प्रतिशत रह सकता है।

व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है और इससे सरकार विविध जरूरी मदों पर अपेक्षित खर्च नहीं कर पा रही है, जिससे मांग में वृद्धि नहीं हो रही है। चूंकि, मांग में बढ़ोतरी से ही आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है, इसलिए अर्थव्यवस्था में सुधार की रफ़्तार धीमी है। अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने से कारोबारी और आम आदमी की आमदनी में कमी आएगी, जिससे लोग अपने ऋण की किस्त एवं ब्याज नहीं चुका पाएंगे और उससे फंसे कर्ज में वृद्धि हो सकती है। यह सही है कि पहले से फंसे कर्ज की वसूली का काम करने वाले कानून या संस्थान फंसे कर्ज की वसूली करने के मामले में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाये हैं, लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि फंसे कर्ज की वसूली में पहले से तेजी आई है। विगत 6 सालों में बैंक 5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा फंसे कर्ज की वसूली करने में सफल रहे हैं और आने वाले दिनों में भी इस मोर्चे पर बेहतर परिणाम देंगे की उम्मीद की जा सकती है। कुछ बड़े बैंक बाजार से पूंजी उगाहने में भी सफल रहे हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि भले ही बैंकों के फंसे कर्ज में वृद्धि होने की संभावना है, लेकिन बैंकों पर बढेÞ हुए फंसे कर्ज का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा की भी पूरी उम्मीद है।


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