Wednesday, May 6, 2026
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बसपा के लिए बागी ही बनेंगे बड़ी बाधा

ब्राह्मण और दलित गठजोड़ के लिए की जा रही कवायद

सन 2007 वाला अतीत लौटाना इतना आसान नहीं


अवनीन्द्र कमल |

सहारनपुर: सन् 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने जिस धूमधड़ाके के साथ सत्ता प्रतिष्ठान पर कब्जा किया था, सन 2022 में भी क्या वैसा कुछ संभव है? फिलवक्त यह सवाल सौ टके का हो चुका है। इसलिए कि अगले बरस होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती एक बार फिर उसी जातीय रणनीति पर हाथ आजमा रही हैं।

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और ब्राह्मण चेहरा कहे जाने वाले सतीश मिश्र ने पिछली 23 जुलाई से जिस प्रबुद्ध विचार गोष्ठी की अयोध्या से शुरुआत की थी, उसका एक रोज पहले समापन हो चुका है। लेकिन लगता नहीं कि इस बार बसपा सन् 2007 वाला सुनहरा अतीत ला पाएगी।

दरअसल, इस पार्टी के बड़े-बड़े धुरंधर हाथी की सवारी छोड़ चुके हैं। इनमें कुछ भाजपा में चले गए तो कुछ इस बार सपा का रुख करने वाले हैं। ऐसे में मायावती और उनके कारकुनों के लिए सत्ता की राहें फिसलन भरी और रपटीली साबित हो सकती हैं।

अगर पीछे मुड़कर देखें तो सन् 2007 का चुनाव बसपा के लिए बड़े काम का था। इस दफा मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटीं। इसकी वजह उनकी सोशल इंजीनियरिंग रही। चूंकि 2007 के चुनाव में 13 फीसद ब्राह्मण और 23 फीसद दलितों के साथ अन्य जातियों और मुस्लिमों को साधने में बसपा सफल रही, लिहाजा कुल 403 विधान सभा सीटों में से बसपा ने 206 पर फतह की थी।

इनमें 41 सीटों पर ब्राह्मण विधायक निर्वाचित हुए थे। लेकिन, इसके बाद सन 2012 और फिर 2017 के विस चुनाव में हाथी बेहाल हो गया। बसपा का इन दोनों चुनावों में बहुत खराब प्रदर्शन रहा। सत्रह के चुनाव में मायावती की पार्टी से केवल 19 विधायक चुने जा सके।

बाकी सीटों पर बसपा प्रत्याशियों को मुंह की खानी पड़ी। अब जबकि निकट भविष्य में उप्र में विधान सभा चुनाव होने हैं तो लगभग सभी दल जातीय समीकरणों पर ही काम कर रहे हैं। जहां तक बात बसपा की है तो इस बार फिर ब्राह्मणों को रिझाने का जतन किया जा रहा है।

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्र ने प्रबुद्ध विचार गोष्ठी के जरिये पूरे उत्तर प्रदेश का भ्रमण किया। सियासी टीकाकारों का कहना है कि इस बार बसपा के प्रति ब्राह्मणों का वैसा रुझान नहीं लग रहा, जैसा कि सन 2007 के चुनाव में था।

कहने को सतीश मिश्र के अलावा बसपा में नकुल दुबे, गोरखपुर के चिल्लूपार से विधायक विनय तिवारी, पूर्व एमएलसी ओपी त्रिपाठी, पूर्व कैबिनेट मंत्री अनंत मिश्रा, राकेश पांडेय और पवन पांडेय जैसे ब्राह्मण नेता हैं। लेकिन, इतने भर से काम नहीं चलने वाला।

पूर्व कैबिनेट मंत्री रामवीर उपाध्याय, पूर्व सांसद और वर्तमान कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक, पूर्व विधायक श्रीभगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित जैसे ब्राह्मण नेता अब हाथी की सवारी छोड़ चुके हैं। सबसे अहम ये है कि ब्राह्मणों के अलावा बसपा सुप्रीमो ने अपने पार्टी के उन पहरुओं को भी किनारे कर दिया जो बुनियाद के पत्थर की मानिंद थे। इनमें उक्त ब्राह्मण नेताओं के अलावा इंद्रजीत सरोज, पूर्व मंत्री राम अचल राजभर, पूर्व एमएलए लालजी वर्मा, पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, पूर्व कैबिनेट मंत्री धर्म सिंह सैनी, सुखदेव राजभर, बसपा में कैबिनेट मंत्री रहे और अब भाजपा में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, दयाराम पाल, चंद्रदेव राम यादव के नाम शामिल हैं।

और तो और पिछले राज्य सभा चुनाव के दौरान मायावती के भाजपा की ओर नरम रुख से नाराज जिन सात विधायकों ने निलंबन की मार झेली है, उनमें असलम अली, असलम राईन, सुषमा पटेल, वंदना सिंह, हाकिम लाल बिंद और हरगोविंद भार्गव सरीखे नेता भी बसपा के लिए रोड़ा बनेंगे। तो कुल मिलाकर 2022 का महासंग्राम बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए मुश्किलों भरा होगा। बसपा के सपनों में अपनों का स्थान अभी तो रिक्त है।

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