Monday, August 15, 2022
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सामयिक: युवाओं से ही बदलाव संभव

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अशोक कुमार

युवा किसी भी देश और समाज में बदलाव के मुख्य वाहक होते हैं। इतिहास गवाह है आज तक दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी परिवर्तन (सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक) हुए हैं उनके मुख्य आधार युवा ही रहे हैं। भारत में भी युवाओं का एक समृद्धिशाली इतिहास है। प्राचीनकाल में आदिगुरू शंकराचार्य से लेकर गौतम बुद्ध एवं महावीर स्वामी ने अपनी युवावस्था में ही धर्म एवं समाज सुधार का बीड़ा उठाया था। आचार्य कौटिल्य ने मगध की जनता को नन्द वंश के शासन से मुक्ति दिलाने एवं अपने अपमान का बदला लेने के लिए एक युवा चंद्रगुप्त मौर्य को अपना प्रमुख साधन बनाया था। पुनर्जागरण काल में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ विवेकानन्द जैसे युवा विचारक ने धर्म एवं समाज सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वामी विवेकानंद ने तो शिकागो धर्म सम्मलेन (1893) में अपनी ओजस्वी भाषण शैली एवं विद्वता के बलबूते भारतीय धर्म-दर्शन की विजय पताका फहरा दिया था। उनके ओजस्वी भाषण के बाद पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के सभी लोग भारतीय ज्ञान परम्परा से अचंभित हो गए थे जो अपने आपको दुनिया में सबसे सभ्य एवं शिक्षित मानते थे। स्वामी विवेकानंद जी ने 39 वर्ष की अल्पायु में जो योगदान दिया वो आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं।

आधुनिक काल में टीपू सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे युवा क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आंदोलनों को सफल बनाने एवं उनके नेतृत्व में भारत को आजादी दिलाने में कई युवा नेताओं का भी योगदान रहा है। यदि आजादी से लेकर अब तक के सात दशकीय समकालीन भारत के इतिहास की बात की जाए तो इस काल में भी हुए कई आंदोलनों एवं परिवर्तनों का नेतृत्व युवाओं ने ही किया है। भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने (हरित क्रांति) से लेकर परमाणु शक्ति संपन्न बनाने तक का जिम्मा युवा कंधों ने उठाया। कंप्यूटर क्रांति एवं नई आर्थिक नीति भी युवा मस्तिष्क की ही उपज थी।

यदि वर्तमान भारत की बात की जाए तो यह दुनिया का सबसे युवा देश है। जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 25 वर्ष तक की आयु वाले लोग कुल जनसंख्या का 50 फीसदी हैं,  वहीं 35 वर्ष तक वाले कुल जनसंख्या का 65फीसदी हंै। यही कारण है कि इसे दुनिया भर में उम्मीद की नजरों से देखा जा रहा है और 21वीं सदी की महाशक्ति होने की भविष्यवाणी की जा रही है। युवा आबादी ही देश की तरक्की को रफ्तार प्रदान कर सकता है। जैसा की भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि हमारे पास युवा संसाधन के रूप में अपार संपदा है और यदि समाज के इस वर्ग को सशक्त बनाए जाए तो हम बहुत जल्द ही महाशक्ति बनने के लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।

यदि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल विकास में निवेश करके मानव संसाधन को मानव पूंजी में तब्दील कर दिया जाए तो निश्चय ही भविष्य में इसका बेहतर प्रतिफल मिलेगा। यदि मानव संसाधन का उचित दोहन एवं प्रबंधन नहीं किया जाता तो यही विकास में सबसे बड़ी बाधा भी उत्पन्न करता है। उदाहरण के रूप में हम आतंकवाद, नक्सलवाद एवं उग्रवाद में संलिप्त युवाओं को ले सकते हैं। आतंकवाद, नक्सलवाद, एवं उग्रवाद जैसे नकारात्मक तत्व भी अपने मंसूबों को कायमाब करने के लिए युवाओं को ही अपना माध्यम बनाते हैं। ऐसी मुश्किल स्थिति में युवाओं को सही दिशा-निर्देश और उपयुक्त मार्गदर्शन की अति आवश्यकता है। भारत की युवाशक्ति को सकारात्मक कार्यों में प्रयुक्त करने की जरूरत है। आवश्यकता है ऐसे प्रेरणा स्रोतों एवं पथ-प्रदर्शकों की, जो युवा पीढी को सकारात्मक और बेहतर रास्ता दिखा सकें।

युवाओं के दिग्भ्रमित होने और गलत रास्ते पर जाने का एक कारण लोग बेरोजगारी को मानते हैं लेकिन युवाओं को अपनी ये मानसिकता बदलनी होगी कि सरकारी नौकरी ही रोजगार का एकमात्र जरिया है। इसमें समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। भारतीय समाज में यह आमधारणा है कि सरकारी नौकरी ही जीवन की सफलता का पैमाना है। समाज के लोगों को इस धारणा को बदलना होगा। उदारीकरण एवं सूचना क्रांति के आधुनिक युग रोजगार एवं स्वरोजगार की संभावनाओं की कमी नहीं है। इसका उदाहरण अमेरिका और यूरोपीय देशों से ले सकते हैं, जहां के युवा इन संभावनाओं का भरपूर लाभ ले रहे हैं। भारत में भी गुजरात का उदाहरण ले सकते हैं, जहां के लोग उद्यमशीलता के बूते स्वयं को और देश के अन्य लोगों को भी रोजगार प्रदान किये हुए हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है और इसकी गणना दुनिया के सबसे सफलतम लोकतंत्र में की जाती है। इसके बावजूद भारत की राजनीति में युवाओं की भागीदारी बेहद कम है। अक्सर देखा गया है कि राजनीति को लेकर युवाओं में नकारात्मकता का भाव होता है और इसलिए वे राजनीति में आना नहीं चाहते, लेकिन उन्हें ये समझना चाहिए कि जब तक वे राजनीति में भागीदारी नहीं करेंगे तब तक राजनीति से नकारात्मकता दूर नहीं होगी। भारतीय संविधान ने 18 साल से अधिक उम्र के युवाओं को मतदान का अधिकार दिया हुआ है। ऐसे में युवाओं की भूमिका काफी अहम हो जाती है।

युवाओं को बेहतर मानव संसाधन में बदलने के लिए शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में प्राप्तांकों को बहुत महत्व दिया जाता है, जिसकी वजह से बच्चों में रटने की प्रवृत्ति हो जाती है और उनमें मौलिकता एवं रचनात्मकता का विकास नहीं हो पाता है। यही कारण है कि हम नवाचार एवं नवोन्मेष में पिछड़े हुए हैं। इसके लिए हमें शिक्षा के प्राथमिक एवं उच्च दोनों ही स्तर पर सुधार के प्रयास करने होंगे। शोध एवं अनुसंधान की भी स्थिति हमारे देश में अच्छी नहीं है। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तो हमारे युवाओं का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है, लेकिन प्रतिभा-पलायन की वजह से हम उनका लाभ नहीं ले पा रहे हैं। अत: भारत में शिक्षा को व्यावसायिकता से जोड़ने की जरुरत है और यहां की प्रतिभाओं को उचित माहौल एवं अवसर भी उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि युवाओं की तरक्की से ही देश की तरक्की  होगी। जिस दिन राजनीति से लेकर प्रशासन तक,  समाज से लेकर विज्ञान तक, खेल से लेकर कारोबार तक युवाओं की जितनी अधिक भागीदारी होगी, उस दिन देश का भविष्य उतना ही उज्जवल होगा।

(लेखक उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक हैं)    

 


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