Wednesday, May 20, 2026
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युवाओं को रोजगार न देने जैसी साजिश

Ravivani 34


26 2हम विश्व गुरू होने के दावे लाख कर लें, हकीकत यह है कि आज हम अपने ही नागरिकों के दवाई, पढ़ाई कमाई के मसलों तक का समुचित समाधान नहीं ढूंढ पा रहे हैं। पेपर लीक, नौकरी घोटाले, फर्जी डिग्री, भारी डोनेशन देश के युवा को निराशा, अवसाद, आक्रोश, गरीबी, बीमारी से भर रहे हैं और संस्थानों में उसका विश्वास चुक रहा है। इसके व्यापक सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रभाव व परिणाम हैं।
आज दुनिया के बड़े देशों में भारत सबसे ज्यादा युवा है। प्रतिशत व संख्या दोनों में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या भारी है। यह खुशी की बात है। दु:ख की बात यह है कि सबसे ज्यादा शिक्षित बेरोजगार भी भारत में ही हैं। जहां हम भारी जनसंख्या के कारण संसाधनों पर बोझ को झेल रहे हैं, वहीं इस मानव संसाधन को उत्पादकता से न जोड़ पाने के कारण इस संपदा के लाभ से भी वंचित हैं। यह दोहरी हानि है और यही इस देश की विपदा की सारांश में कहानी है।
कनाडा, जर्मनी, आस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी कम जनसंख्या के कारण मानव संपदा की कमी की भरपाई दूसरे विकासशील देशों के दक्ष, उपयोगी व उत्पादक युवा जनसंख्या को अपने देशों में बसा कर कर रहे हैं। भारत इस मानव संपदा का समुचित इस्तेमाल न कर पाने के कारण आज इसे बर्बाद कर रहा है। कुछ वर्षों बाद युवा उम्रदराज होकर देश पर दो तरफा मार का कारण बनेंगे।

चुनिंदा लोगों के अरबपति और करोड़ों लोगों के बेरोजगार-गरीब बनने या बने रहने से देश नहीं बनते। समाधान, ‘हर हाथ को काम’ और ‘काम का वाजिब दाम’ ही है। ‘रोजगार का अधिकार’ नागरिकों के मौलिक अधिकारों में से 4 से सीधे जुड़ा है। गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का आजीविका बिना कोई मायने नहीं। मायने, रोजगार बिना बराबरी, आजादी, शोषण मुक्ति व शिक्षा के अधिकार के भी नहीं हैं। आज युवाओं को 91 प्रतिशत रोजगार असंगठित क्षेत्र में है, जहां कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। मात्र 9 प्रतिशत संगठित क्षेत्र में और उसमें मात्र 4 प्रतिशत सरकारी है। 50-60 लाख 15 वर्ष से ज्यादा आयु के रोजगार आकांक्षी युवा प्रति वर्ष और जुड़ जाते हैं। कृषि का जीडीपी में योगदान भले 15 प्रतिशत ही हो पर आज भी 45 प्रतिशत देश की श्रम शक्ति को कृषि क्षेत्र ही खपाता है। जाहिर है इस श्रम शक्ति का उत्पादकता की दृष्टि से कमतर उपयोग ही हो रहा है। कोराना में यह प्रतिशत और बढ़ा है। कृषि पर भी आज संकट है। बेरोजगारी सबसे ज्यादा 12.9 प्रतिशत, 15-29 वर्ष के आयु वर्ग में है। महिलाओं के लिये सुरक्षित, लाभकारी रोजगार की स्थिति और भी विकट है। बडी संख्या में युवाओं को उनकी शैक्षणिक योग्यता या कौशल के अनुपात में अवसर एकदम उलट है।

कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ सौ चपरासी की भर्तियों के लिए कई लाख लोगों ने आवेदन किया, जिसमें कई सौ पीएचडी व हजारों प्रोफेशनल डिग्रीधारक भी थे। हालांकि इन पदों के लिए शैक्षणिक योग्यता 5वीं-दसवीं पर्याप्त है। अभिभावक बच्चों को अपनी गाढ़ी कमाई से शिक्षा देने से पीछे नहीं हटते, पर निराश होते हैं। देश में डिग्री के लिए निजी संस्थानों और प्रवेश परीक्षाओं के लिए महंगे कोचिंग सेंटरों की भरमार है। नौकरियां निकल नहीं रही हैं। स्थान रिक्त पड़े हैं लंबे समय से। दफ्तरों-विभागों का अधिकृत से कम कर्मचारी होने का रोना है। कुछ नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आते हैं और सरकारों व संस्थानों ने प्रवेश परीक्षा शुल्क या फीस को ही कमाई का धंधा बना लिया है। परीक्षाओं के पर्चे लीक आए दिन होते हैं। परीक्षा निरस्त हो जाती है। नतीजे लंबे समय तक नहीं आते। नतीजे आने के बाद भी कानून बदल सकते हैं। फिर कई वर्ष की मुकदमेबाजी। कई-कई वर्ष के बाद नियुक्ति। यह सब युवाओं के खिलाफ नौकरी रोजगार न देने की साजिश जैसे लगते हैं।

यह परिस्थितियां आज युवाओं को आश्वस्त नहीं करती, राहत नहीं देती दिखती। वह पकौड़ा तो खुद से भी तल लेगा, पर उसे कोई खरीदने खाने वाला भी तो हो! नतीजन उस शिक्षित युवा को लगता है कि वह अपने परिवार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। वह अपने को बोझ मानता है। तानों-उल्हानों से अवसादग्रस्त होता है। नशे, अपराध, हिंसा में लिप्त होता है। कोई-कोई आत्म हत्या तक करता है।

युवा मोबाइल, व्हाटसअप की आभासी दुनिया में लीन रहता है। जहर उगलता है, और वहीं क्रान्ति करता रहता है। मजहब, जाति आरक्षण पर आधारित दोषारोपण उसका पसंदीदा शगल है। बेरोजगारों में धर्मांधता और कट्टरता तेजी से फैलती है। यह युवा रिटायरमेंट आयु बढ़ने के बुजुर्ग लाभार्थियों के भी खिलाफ हो जाता है। रोजगारपरक न होने और आमदनी न करा पाने के कारण, औपचारिक शिक्षा, युवा की नजर में आज अनुपयोगी और अनाकर्षक हो चली है। शिक्षकों का सामाजिक सम्मान भी इसी अनुपात से घटा है। सीखने में रूचि घटी है, जुगाड़ की सामाजिक मान्यता बढ़ी है। शिक्षकों का भी आत्मविश्वास और आत्मसम्मान घटा है। युवाओं की करियर प्राथमिकता में शिक्षण कार्य बहुत पीछे है। अच्छे छात्रों का इस क्षेत्र में न आना शिक्षण को दरिद्र कर रहा है। शिक्षण संस्थाओं में सभी क्षेत्रों के विशेषज्ञ और भविष्य के नागरिक तैयार होते थे, जो देश समाज का निर्माण करते थे। उदासीन छात्र और औसत शिक्षक कैसा समाज या नागरिक बनाएंगे, कोई पहेली नहीं है। समझना मुश्किल नहीं कि सारा तंत्र और नीति निर्माण पार्टी नेताओं और अधिकारियों के रहमो करम पर है। शिक्षण संस्थान चिंतन, मौलिकता और रचनात्मकता से दूर रोबोट फैक्ट्री रोबोट बन रहे हैं या मुनाफाखोरी के अड्डे। अगर चुनाव युवा विचारशीलता नहीं, रट्टू तोते और रोबोट के बीच है तो वो तकनीक रोजगार बढ़ाएगी नहीं, युवाओं के रोजगार खाएगी।

छात्र राजनीति की परंपरा जो जागरूक, संवेदनशील, निर्भीक नागरिक तैयार करती थी अब उसके नाम पर नेताओं के दुमछल्ले भर पैदा हो रहे हैं। छात्र राजनीति की मूल धारा पटरी से उतर चुकी है और बस मजहब-जातियों के युवा हृदय सम्राट पैदा हो रहे हैं, जो दलाली में भविष्य तलाशते हैं और अपना और साथियों के महत्वपूर्ण साल जाया कर बर्बाद होते हैं।

हम विश्व गुरू होने के दावे लाख कर लें, हकीकत यह है कि आज हम अपने ही नागरिकों के दवाई, पढ़ाई कमाई के मसलों तक का समुचित समाधान नहीं ढूंढ पा रहे हैं। पेपर लीक, नौकरी घोटाले, फर्जी डिग्री, भारी डोनेशन देश के युवा को निराशा, अवसाद, आक्रोश, गरीबी, बीमारी से भर रहे हैं और संस्थानों में उसका विश्वास चुक रहा है। इसके व्यापक सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रभाव व परिणाम हैं। पिछले 8 सालों में सार्वजनिक क्षेत्र के लगभग सात-साढेÞ सात लाख पदों के लिए 22 करोड़ युवाओं ने आवेदन किया। ऐसा नहीं की कभी भी सभी को नौकरी मिली या मिलेगी। पर यह तथ्य कि इस तादाद में युवा नौकरी चाह रहा है पर पा नहीं पा रहा है, क्या डरावना नहीं है? यह तथ्य बेरोजगारी, समुचित रोजगार न होना या छिपी बेरोजगारी के समुंदर की बानगी है, जो मानव संसाधन की बेशर्म बर्बादी है। देश की विफलता भी।

यह युवा उपभोक्ता भी है। भारी तादाद में खाली जेब उपभोक्ता अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर ले जाता है। कल्याणकारी राज्य का यह कर्तव्य है कि नागरिकों की पढ़ाई, दवाई, कमाई सुनिश्चित करे। विस्फोटक अराजक होती स्थिति में यह और भी जरूरी हो गया है। इसके सुरक्षा कवच बनाने, रोजगार गारंटी, खाद्य सुरक्षा, व्यापक न्यूनतम आय, जमीन पर सुनिश्चित करने का यह समय है। मुनाफखोर आवारा वैश्विक पूंजी पर निर्भरता और जिनके एजेंडा में रोजगार सृजन न हो, ऐसे नीति निर्माताओं से निजात पाने का भी यह समय है। देश की आर्थिक सार्वभौमिकता पुर्नस्थापना का भी। वरना भविष्य देश के युवाओं के साथ सब गहरी खाई की ओर ही है और देश को बबार्दी से बचाने से बडा अभी कोई और धर्म नहीं।


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