Wednesday, December 8, 2021
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चरमरा गईं स्वास्थ्य सेवाएं

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यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कोरोना काल में हमारी समस्त स्वास्थ्य सेवाएं चमरमरा गई हैं। विशेषज्ञ पहले ही कोरोना की दूसरी लहर की चेतावनी दे रहे थे लेकिन सरकार ने विशेषज्ञों की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया और दूसरी लहर से निपटने की अपेक्षित तैयारी नहीं की। नतीजा हम सबके सामने हैं। नि:संदेह इसमे जनता की लापरवाही भी एक कारण है। लेकिन जनता की लापरवाही के नाम पर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। एक तरफ ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना का संक्रमण बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ कई जगहों पर स्थिति बद से बदतर हो गई है। यह शर्मनाक है कि आॅक्सीजन की कमी से देश के विभिन्न अस्पतालों में अनेक मरीजों की मौत हो गई। पिछले दिनों नीति आयोग ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए खर्च बढ़ाने की जरूरत बताई थी। नीति आयोग के सदस्य वीके पाल ने कहा था कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और उन्हें देश के हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्यों को मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं की मद में खर्च को बढ़ाना होगा। यह कटु सत्य है कि हमारे देश में आबादी के हिसाब से स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय स्थिति में हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का मात्र डेढ़ फीसद ही खर्च होता है।

हालांकि सरकार ने अगले पांच साल में इसे तीन फीसद तक करने का लक्ष्य रखा है। जबकि हमारे देश के हिसाब से यह भी कम है। दुनिया के कई देश स्वास्थ्य सेवाओं की मद में आठ से नौ फीसद तक खर्च कर रहे हैं। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करती दिखाई तो दे रही है लेकिन उसका प्रयास व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित होता दिखाई नहीं दे रहा है।

यदि देश का स्वास्थ्य ढांचा बेहतर होता तो कोराना काल में जनता को ज्यादा सुविधाएं दी जा सकती थीं। कोरोना काल में जहां एक ओर अनेक डॉक्टरों ने कई तरह के खतरे उठाकर कर अपने कर्तव्यों निर्वहन किया वहीं दूसरी ओर अनेक निजी अस्पतालों का ध्यान आर्थिक लाभ प्राप्त करने पर ही रहा। जब इस दौर में भी गंभीर रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए अस्पतालों में स्ट्रेचर जैसी मूलभूत सुविधाएं न मिल पाएं, तो देश की स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठना लाजमी है। इस प्रगतिशील दौर में भी ऐसी अनेक खबरें प्रकाश में आई हैं कि जब अस्पताल गरीब मरीज के शव को घर पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं करा पाए।

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है भारत जैसे देश में एक तरफ कोराना जैसे संक्रामक रोगों को रोकने की कोई कारगर नीति नहीं बन पाई है तो दूसरी तरफ असंक्रामक रोग तेजी से जनता को अपनी चपेट में ले रहे हैं। 1940 के बाद से संक्रामक रोगों से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। अब कई नए रोग हमारे सामने आए हैं और भविष्य में और नए रोग हमारे सामने आ सकते हैं। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार संक्रामक रोगों के बढ़ने की बड़ी वजह मानवशास्त्रीय और जनसांख्यिकीय बदलाव हैं। गौरतलब है कि पिछले दिनों अमेरिका के ‘सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकॉनॉमिक्स एंड पॉलिसी’ (सीडीडीईपी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में लगभग छह लाख डॉक्टरों और 20 लाख नर्सों की कमी है।

भारत में 10,189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर की सिफारिश की है। इसी तरह हमारे देश मे 483 लोगों पर एक नर्स है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में एंटीबायोटिक दवाइयां देने के लिए उचित तरीके से प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है, जिससे जीवन बचाने वाली दवाइयां मरीजों को नहीं मिल पाती हैं।

दरअसल पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि आने वाले समय में हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियां भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी। इस रिपोर्ट के अनुसार सन 2012 से 2030 के बीच इन बीमारियों के इलाज पर करीब 6.2 खरब डॉलर (41 लाख करोड़ रुपये से अधिक) खर्च होने का अनुमान है। रिपोर्ट में इन बीमारियों के भारत और चीन के शहरी इलाकों में तेजी से फैलने का खतरा बताया गया है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि असंक्रामक रोग शहरों में रहने वाली मानव आबादी के स्वास्थ्य के लिए ही खतरा नहीं है बल्कि इसके चलते अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होने का अनुमान है। बढ़ता शहरीकरण और वहां पर काम और जीवनशैली की स्थितियां असंक्रामक रोगों के बढ़ने का मुख्य कारण है। सन 2014 से 2050 के बीच में भारत में 404 मिलियन (40 करोड़ चालीस लाख) आबादी शहरों का हिस्सा बनेगी। इसके चलते शहरों में अनियोजित विकास होने से स्थिति बदतर होगी।

हमारे देश में व्यवस्था की नाकामी और विभिन्नि वातावरणीय कारकों के कारण बीमारियों का प्रकोप ज्यादा होता है। भारत में डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति वियतनाम और अल्जीरिया जैसे देशों से भी बदतर है। हमारे देश में इस समय लगभग 7.5 लाख सक्रिय डॉक्टर हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण गरीब लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने में देरी होती है। यह स्थिति अन्तत: पूरे देश के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर गठित संसदीय समिति ने पिछले दिनों जारी अपनी रिपोर्ट में यह माना है कि हमारे देश में आम लोगों को समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के अनेक कारण हैं। इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं को और तीव्र बनाने की जरूरत है। दरअसल स्वास्थ्य सेवाओं के मुद्दे पर भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। हालात यह हैं कि जनसंख्या वृद्धि के कारण बीमार लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

गरीबी और गंदगी के कारण विभिन्न संक्रामक रोगों से पीडित लोग इलाज के लिए तरस रहे हैं। गौरतलब है चीन ,ब्राजील और श्रीलंका जैसे देश भी स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमसे ज्यादा खर्च करते हैं। जबकि पिछले दो दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि दर चीन के बाद शायद सबसे अधिक रही है। इसलिए पिछले दिनों योजना आयोग की एक विशेषज्ञ समिति ने भी यह सिफारिश की थी कि सार्वजनिक चिकित्सा सेवाओं के लिए आबंटन बढ़ाया जाए।
दलाली के युग में संवेदना के लिए कोई जगह नहीं है।

यही कारण है कि आज अनेक डॉक्टर गांवों की तरफ रुख नहीं करते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का चुस्त-दुरुस्त और ईमानदार होना न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी जरूरी है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है। देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास हेतु बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने के लिए एक गंभीर पहल की जरूरत है। इस समय लोगों को जागरूक करने की सबसे ज्यादा जरूरत है ताकि इस वायरस का सामना किया जा सके।


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