- ठेका लूटने के बाद हुआ था मलियाना में दंगा
- जिसने देखा और जिसने सुना वो कांप उठा, लाशों के ढेरों में ढूंढे गए अपने
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: हिंदुस्तान के दंगों के इतिहास में मलियाना कांड काफी वीभत्स माना जाता है। इस दंगे ने मलियाना में सदियों से चले आ रहे सांप्रदायिक सदभावना को तार तार करके रख दिया था। 23 मई 1987 को जब दंगा हुआ उस वक्त रमजान का पवित्र महीना चल रहा था और शनिवार को जब अदालत का फैसला आया उस वक्त भी रमजान का महीना चल रहा है।
अदालत ने जब 39 आरोपियों को हत्याकांड के आरोप से बरी किया तो उन लोगों की आंखें भर आई जो इस दंगे के चश्मदीद गवाह थे और जिन लोगों ने अपनों को आंखों के सामने दुनिया से रुखसत होते हुए देखा था। मलियाना में दंगा पड़ोस के संजय नगर में देशी शराब के ठेके को लूटने के बाद हुआ था। आरोप था कि पुलिस और पीएसी की मौजूदगी में इस दंगे को अंजाम दिया गया था।
23 मई 1987 को रमजान की 25वीं तारीख थी। शाम सात बजे प्रशासन की तरफ से ऐलान किया गया कि मलियाना में घर-घर तलाशी होगी और गिरफ्तारियां होंगी। मलियाना के लोगों को इस संदेश का अर्थ समझ में नहीं आया और लोग तमाम तरह के कयास लगाने लगे। दरअसल 18 और 19 मई की रात से पूरे मेरठ में भयानक दंगा भड़का हुआ था और तमाम जगहों पर कर्फ्यू लगा हुआ था, लेकिन प्रशासन ने मलियाना में कर्फ्यू भी नहीं लगाया गया था।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि 23 मई की दोपहर को पड़ोस के संजय नगर में लोगों ने देशी शराब के ठेके को लूट लिया था। इसके बाद उन्मादी भीड़ मलियाना की मुस्लिम बस्ती में घुसी और घरों में तोड़फोड़ करके लोगों को निकाल कर मारने लगी। आरोप था कि यह सब उन्मादी भीड़ ने पुलिस और पीएसी के सामने किया। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि होली चौक पर सत्तार के परिवार के 11 सदस्यों के शव उसके घर के बाहर स्थित एक कुएं से बरामद किए गए।
कुल 73 लोग मारे गए थे। मारे गए लोगों में केवल 36 लोगों की शिनाख्त हो सकी। बाकी लोगों को प्रशासन अब भी लापता मानता है। हालांकि उनके वारिसान को यह कहकर 20-20 हजार का मुआवजा दिया गया था कि यदि ये लोग लौट कर आ गए तो मुआवजा राशि वापस ले ली जाएगी। मौहम्मद सलीम ने बताया कि उनकी आंखों के सामने वाकया हुआ था।

एक मुखबिर ने 1987 में आकर कहा था कि मलियाना में चेकिंग की जाएगी। पहले ठेका लूटा गया फिर पीएसी के जवानों ने शराब के नशे में हत्याकांड को अंजाम दिया। यामीन बताते हैं कि इस दंगे में उन्होंने अपने पिता को खोया था। सरकार ने दंगा पीड़ितों को बीस बीस हजार रुपये का मुआवजा दिया लेकिन न्याय के लिये 36 साल इंतजार करना पड़ा।
याकूब की फाइल गायब
सीनियर वकील अलाउद्दीन सिद्दकी ने बताया कि हैरानी की बात यह है कि मलियाना कांड के प्रत्यक्षदर्शी मौहम्मद याकूब की फाइल कोर्ट से गायब हो गई थी। 10 साल तक कोर्ट इस फाइल को ढुंढवा नहीं पाया था। इस फाइल में पूरा मलियाना कांड दर्ज था। 36 साल में 800 तारीखें पड़ चुकी, लेकिन अभियोजन पक्ष ने 35 गवाहों में से सिर्फ तीन गवाहों की अदालत ने जिरह की थी।
हलचल मच गई थी दिल्ली में
मलियाना में करीब 106 घरों को आग के हवाले कर दिया गया था। चारों तरफ भारी संख्या में सेना के अलावा पैरामिलेट्री और पीएसी ही शहर की सड़कों पर नजर आती थी। मलियाना का अधिकांश भाग तहस नहस हो गया था। दंगाइयों ने दुकानों और घरों में आग लगाने के साथ ही पीएसी और फोर्स के सामने ही कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया। दो दिन में दो बड़े दंगों ने लखनऊ और दिल्ली को भी हिलाकर रख दिया था।
पीड़ितों के वकील ने कहा-जान बूझकर मामले को लटकाया गया
मलियाना कांड के पीड़ितों के वकील अलाउद्दीन सिद्दीकी का कहना है 36 लोगो की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और 35 लोगो की इंजरी रिपोर्ट थी। क्या आपस में लोग लड़ कर मरे है। बार-बार कोर्ट बदलते गए। ऐसे कोर्ट में फाइल भेजी गई जो खाली पड़े थे। याकूब की फाइल 10 साल तक गायब रही। इसको ढूंढने की कोशिश तक नही की गई। उन्होंने कहा कि उनको कोर्ट के फैसले पर कुछ नही बोलना, लेकिन 36 साल की लड़ाई का फैसला हैरानी भरा है। अब इसकी अपील उच्च अदालत में की जाएगी।
ह्यूमन राइटस व वरिष्ठ पत्रकार ने उठाया था मुद्दा
23 मई 1987 को मलियाना में हुए सांप्रदायिक दंगे में पुलिस और सरकार की लचर कार्रवाई का मामना मानवाधिकार आयोग में उठाया गया था। वरिष्ठ पत्रकार, कुरबान अली, पूर्व आईपीएस विभूति नारायण राय, पीयूसीएल, रिहाई मंच जैसे मानवाधिकार के मुद्दे पर काम करने वाले कई अन्य संगठनों ने जब आयोग का दरवाजा खटखटाया तो हाईकोर्ट ने सरकार को जबाब दाखिल करने के आदेश दिये थे।
मलियाना कांड को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने कुरबान अली और विभूति नारायण राय की इस संबंध में दाखिल जनहित याचिका स्वीकार कर ली थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय यादव और जस्टिस प्रकाश पाड़िया की बेंच ने 19 अप्रैल 2021 को अपने एक लिखित आदेश के जरिये उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि वह इस जनहित याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल करे
जिसमें कहा गया है कि सांप्रदायिक दंगों के दौरान 23 मई 1987 को मलियाना में पुलिस और पीएसी द्वारा 72 बेगुनाह लोगों को मार डाला गया था और जिस मुकदमे में आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी है। उस समय डिवीजन बेंच के समक्ष पेश हुए राज्य सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने तर्क दिया था कि यह मामला बहुत पुराना हो चुका है

और अब इस मामले की कोई वैधानिकता नहीं रह गई है लेकिन खंडपीठ ने लिखित आदेश देते हुए जोर दिया कि राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करना चाहिए और दायर जनहित याचिका में उठाये गए सभी बिंदुओं का विस्तार से पैरा वाइज जवाब देना चाहिए।
मुख्य गवाह बोला-36 साल इंतजार के बाद मिली मायूसी
1987 के मलियाना कांड के मुख्य गवाह रहे मलियाना निवासी वकील अहमद का कहना है कि 36 साल तक अदालती लड़ाई लड़ने के बाद जिस तरह आरोपियों को बरी किया गया है वो निराशाजनक है। गवाह ने बताया कि उसने लगातार 56 दिन तक गवाही दी थी। 35 लोगो की मेडिकल रिपोर्ट भी लगी थी।
लगातार गवाही के दौरान पीएसी के वकील का कहना था कि हिंदू पक्ष के लोगो ने मारा है, हिंदू पक्ष के वकील का कहना था पीएसी की गोली से लोग मरे है। लोग मरे थे और सारे सबूत पेश कर दिए गए थे, इसके बाद भी अदालत ने जिस तरह से 39 लोगो को बरी किया है उससे हैरानी भी हो रही है। पूरी दुनिया में इस हत्याकांड की चर्चा हुई थी, इसके बाद ये नतीजा आया है।
मलियाना कांड के फैसले पर त्वरित टिप्पणी
- फैसले से अचंभित और दुख भी
फैसले से अचंभित भी हूं और दुखी भी हूं। इस कांड में पूरी इंसानियत के मुंह पर कालिख पोत कर इंसानियत को झकझोर कर रख दिया था। मलियाना कांड के सभी दोषियों को फांसी की सजा होनी ही चाहिए थी। -प्रो. जैनुस सजेदीन (शहर काजी मेरठ)
- फैसलों में पक्षपात की ‘बू’
इस प्रकार के फैसलों में पक्षपात की ‘बू’ आती है। यह सभी जानते हैं कि मलियाना में हैवानियत का नंगा नाच हुआ था। बेकसूरों को मौत के घाट उतार दिया गया था। -कारी शफीक उर रहमान कासमी (अध्यक्ष, आॅल इण्डिया मिली काउंसिल, मेरठ)
- सभी आरोपी फांसी के हकदार थे
इस केस में जो फैसला आया है, वह किन साक्ष्यों के आधार पर दिया गया यह मेरी समझ से परे है। इस केस में सभी आरोपी फांसी के हकदार थे। यह फैसला मृतकों के परिजनों को विचलित कर देगा। -कारी अफ्फान कासमी (नायाब मोहतमिम, मदरसा जामिया मदनिया, मेरठ)
- जुल्म की हो गई थी इंतेहा
1987 में मलियाना में जुल्म की इंतेहा हो गई थी। लोगों को बेरहमी से मारा गया था। हमें कोर्ट के ऊपर बहुत भरोसा है। आज के फैसले से कोर्ट की पारदर्शिता पर उंगली उठना लाजमी है। -जैनुल राशेदिन (नायाब शहर काजी, मेरठ)
- फैसला अपने आपमें आश्चर्यजनक
1987 में मलियाना कांड की गूंज पूरे देश में गूंजी थी। दोषियों को सजा दिलाने के लिए सभी सबूत अदालत में पेश किए गए। इसके बावजूद सभी आरोपी रिहा हो गए। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है। -हाजी शीराज रहमान, प्रवक्ता जमीयत उलेमा ए हिंद, मेरठ)

