Sunday, May 10, 2026
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फसल विविधीकरण से बढ़ेगी आमदनी

KHETIBADI 1


बढ़ती जनसंख्या शहरीकरण के फैलते विस्तार के कारण कृषि में विविधीकरण आज की महती आवश्यकता बनकर उभरी है। उल्लेखनीय है कि कृषि एवं कृषि से जुड़े व्यवसाय के भरोसे टिकी 67 से 70 प्रतिशत आवाम को अब जीने के लिए कृषि के पुराने तर्ज छोड़कर नये तौर-तरीकों को अपनाकर आर्थिक उत्थान किया जाना ही एकमात्र मार्ग बचा है। कृषि विविधीकरण खेती के पारम्परिक तरीकों को बदलकर नये तरीकों का अंगीकरण यथासम्भव जल्द से जल्द किया जाना चाहिये जो साठ वर्ष पहले होता था।

खरीफ अथवा रबी की एक फसल भूमि, जलवायु, वर्षा की परख करके लगाना और काटना बस, परंतु आज इतने से काम चलना संभव नहीं है। आज पारम्परिक फसलों की जगह मुनाफे वाली फसलें जैसे मसाला फसलें, औषधि फसलें, फूल एवं फलों की खेती का समावेश कुछ रकबे में किया जाना जरूरी हो गया है। खेती के साथ खेती से प्राप्त बेशुमार कीमती अवशेषों का समुचित उपयोग भी इस पद्धति का उद्देश्य है खेती के साथ पशुपालन तो मानो सदियों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कार्य है।

बीच में मशीनीकरण के चलते जरूर इस दिशा में कुछ शिथिलता आई थी वह भी जैविक खेती की संजीवनी के साथ पुन: वापस आने लगी है। मशरूम पालन बिल्कुल कम लागत में खेत के एक कोने में किया जाना संभव है तो मधुमक्खी पालन के लिये खुले में पड़ी थोड़ी सी भूमि का सद्उपयोग किया जा सकता है।

कहना ना होगा परंतु यह सत्य है कि इन सभी कार्यों के करने हेतु संचालन हेतु शासन द्वारा विभिन्न कृषि विज्ञान केन्द्रों पर प्रशिक्षण मुफ्त प्राप्त करने की सहूलियत भी है यही कारण है कि व्यवसायिक फसलों एवं अन्य कृषि से जुड़े व्यवसायों की ओर विविधीकरण का विचार ना केवल हमारे देश में बल्कि सभी विकासशील देशों के लिये एक आवश्यकता बन कर उभरा है।

ताकि कृषि आमदनी में बढ़ोत्तरी की जाकर एकल फसल उत्पादन के खतरे से भी बचा जा सके। अमूमन देखा गया है कि मानसून के मिजाज में वर्तमान में भारी परिवर्तन हो रहे है। उससे निपटने के लिये कृषि में यदि विविधीकरण का विस्तार हो जाये तो मानसून द्वारा प्रायोजित खतरों से सरलता से निपटा जा सकता है और एक ईकाई क्षेत्र से अधिक आमदनी प्राप्त करने का जरिया भी बढ़ाया जा सकता है।

खाद्यान्न फसलें गेहूं, धान में हरितक्रांति प्राप्त करने के बाद से कृषि विविधीकरण ने जोर पकड़ा है सतत कृषि तकनीक का विकास और विस्तार ने कृषकों में एक जागृति पैदा हो चुकी है और वे परम्परागत फसलों के स्थान पर फल/सब्जियां, फूल तथा मशरूम उत्पादन में विश्वास करके आगे बढ़ रहे हैं।

इस विविधीकरण क्रिया को गति देने में केंद्र तथा राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं से तथा राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा किसानों को दी जाने वाली सुविधाओं का हाथ नकारा नहीं जा सकता है। इन सभी प्रयासों के सुखद परिणाम सामने हैं। देश में खेती योग्य भूमि को बढ़ाना असंभव है परंतु अन्य संसाधन जैसे विशाल समुद्रीय तटों पर मछली पालन, फल/फूल का प्रोसेसिंग आदि नवीन कार्यों को हाथ में लेकर इस दिशा में प्रगति करने की अपार संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।


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