Saturday, June 15, 2024
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शिकायत की पैरवी से कन्नी काट रहा कैंट बोर्ड

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जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: रक्षा मंत्रालय में की गयी शिकायत की बजाए पैरवी के कन्नी काट रहा है कैंट बोर्ड। सरकारी जमीन पर कब्जा व अवैध निर्माण करने वाले वार्ड सात के सदस्य की सदस्यता समाप्त करने की रक्षा मंत्रालय से शिकायत करने के बाद मामले की पैरवी के बजाए कैंट बोर्ड इसलिए चुप्पी साधे बैठा है क्योंकि आरोपी बनाए गए मैंबर ने पाला बदल लिया है और सत्ताधारी खेमे से हाथ मिला लिया। यह पूरा मामला कैंट बोर्ड के वार्ड सात से सदस्य धर्मेंद्र सोनकर से जुड़ा है।

उनके खिलाफ रजबन इलाके में सरकारी जमीन पर कब्जा कर वहां कारोबार के तौर पर टैंट हाउस चलाना है। इसके अलावा टंडेल मोहल्ला में जो उनका मकान है उसको लेकर सरकारी जमीन पर कब्जा कर अवैध निर्माण का आरोप है। सबसे बड़ा आरोप उन पर रजबन में एक धर्मशाला व मंदिर के नाम पर अवैध निर्माण करने का है।

साल 2016-17 में इसको लेकर मेरठ से लेकर नई दिल्ली रक्षा मंत्रालय तक हंगामे की स्थिति बनी हुई थी। हुआ ये कि फिल्ड स्टाफ की सूचना पर तत्कालीन सीईओ राजीव श्रीवास्तव ने एक टीम अवैध निर्माण रोकने के लिए भेजी, लेकिन कैंट बोर्ड की टीम को अवैध निर्माण के आरोपियों ने वहां से दौड़ा दिया।

उसके बाद खुद सीईओ राजीव श्रीवास्तव वहां ध्वस्तीकरण कराने पहुंचे तो धर्मेंद्र सोनकर वहां पहुंच गए थे। उन्होंने राजीव श्रीवास्तव के घर पहुंचकर उनसे से ध्वस्तीकरण न कराने की गुहार लगाई और वादा किया कि आगे कोई निर्माण नहीं कराया जाएगा।

रातों रात पड़ गया लिंटर

सीईओ से वादा किए जाने के बाद भी अवैध रूप से कब्जायी गयी सरकारी जगह पर किए गए अवैध निर्माण पर रातों रात लिंटर तक डलवा दिया गया। इस कारगुजारी में अपरोक्ष रूप से उन सदस्यों का संरक्षण बताया जाता है जो आज अवैध निर्माण के नाम पर सबसे ज्यादा हो हल्ला मचा रहे हैं। रातों रात लिंटर गिराए जाने की कार्रवाई से तत्कालीन सीईओ राजीव श्रीवास्तव बेहद नाराज हुए थे। उसके बाद ही धर्मेंद्र सोनकर के खिलाफ लिखा पढ़ी की गयी।

मंत्रालय से सिफारिश कर भूला

रातों रात अवैध निर्माण पर लिंटर गिरने के बाद कैंट बोर्ड की बैठक में धर्मेंद्र सोनकर की सदस्यता समाप्त किए जाने का प्रस्ताव पास किया गया। पूरे बोर्ड न उस पर हस्ताक्षर किए। प्रस्ताव पास कर मंत्रालय को भेजा गया, लेकिन आरोप है कि प्रस्ताव पास कर मंत्रालय को भेजने वाले अफसर उसकी पैरवी करना भूल गए। बताया गया है कि रक्षा मंत्रालय ने इसको लेकर कुछ पत्रावली भी तलब की थी वो भी आधी अधूरी भेजी गयी।

सत्ता से हाथ मिलाते ही भयमुक्त

अवैध निर्माण मामले में जब रक्षा मंत्रालय की कार्रवाई की तलवार लट रही थी तो बगैर देरी किए धर्मेंद्र सोनकर भगवाधारी बन गए। उसके कुछ समय बाद सीईओ राजीव श्रीवास्तव का भी यहां से तबादला हो गया। तवादला होने के बाद बोर्ड के मैंबरों के सूर भी बदल गए। अब न तो उनके अवैध निर्माण की बात होती है न ही किसी अफसर को सरकारी जमीन पर कब्जे व अवैध निर्माण की फाइलें खंगालने का वक्त मिलता है।

सिर्फ स्टाफ पर तलवार

अवैध निर्माण की यदि बात की जाए तो हमेशा स्टाफ पर ही तलवार लटकती है। बोर्ड के सदस्यों ने कब और कहां कब्जे किए हुए हैं उनकी चर्चा नहीं की जाती। रजबन में अवैध निर्माण व कब्जे इसका सबसे बड़ा सबूत है। दूसरा सबसे बड़ा सवाल करियप्पा स्ट्रीट बंगला नंबर 105 है। जिसको सेना ने रिज्यूम किया जाना है। वहां भीअवैध निर्माण की तैयारी है।

अवैध रूप दीवारों खड़ी कर वहां भी गेट लगा दिया गया है। इस निर्माण को पुराना दिखाने के लिए रंगाई पुताई भी कर दी गयी है, लेकिन शोर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि यह कारगुजारी सदस्य के इशारे पर की गयी है। यहीं काम यदि किसी स्टाफ ने किया होता तो अब तक दर्जनों नोटिस और तमाम कार्रवाई कर दी गयी होती। कैंट बोर्ड में सदस्य करे तो रास लीला, स्टाफ कराए तो करेक्टर ढीला।

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