Saturday, May 23, 2026
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जातिगत जनगणना की मांग घातक

Samvad 1


05 24नीतीश कुमार के साथ अब राहुल गांधी ने भी जाति आधारित जनगणना की वकालत शुरू कर दी है। कुछ अन्य विपक्षी दल पहले ही नीतीश के सुर में सुर मिला चुके हैं। फर्ज कीजिए जाति आधारित जन गणना हो भी गई तो उससे क्या हासिल होगा? आरक्षण कुछ और बढ़ाना पड़ेगा। सामान्य वर्ग के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर और कम हो जाएंगे। यही तो इस मांग का आधार है। मंडल की भांति देर सबेर राजनैतिक दबाव के चलते यह भी हो ही जायेगा। परंतु इसके पैरोकारों की दृष्टि अत्यन्त संकुचित है। तात्कालिक राजनैतिक लाभ के लिए कोई भी आंदोलन छेड़ देना नीतीश जैसे नेताओं का कुल राजनैतिक कौशल है। देश और समाज पर उसका कितना घातक असर पड़ेगा, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं होती।

सामाजिक न्याय की अपनी सिद्धहस्त लफ्फाजी के बल पर वे किसी भी विभाजनकारी विद्वेषमूलक नीति को सही ठहराने की कला में माहिर हैं।
लेकिन इस प्रसंग में वे एक बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। हिंदुओं में कई हजार जातियां और उपजातियां हैं।

किसी जाति विशेष को किस जाति समूह के अंतर्गत रखा जाना चाहिए, इसी प्रकार किस उपजाति को किस जाति के अंतर्गत रखा जाए, इन प्रश्नों को लेकर अभी ही बहुत संशय और ऊहापोह की स्थिति है। जाति आधारित जनगणना के बाद इस प्रकार की बहुत सारी अन्य समस्याएं निश्चित ही पैदा होंगी।

तो फिर उनका समाधान कैसे कीजिएगा? लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है कि आरक्षण के 70 या 80 प्रतिशत को हजारों जातियों में कैसे बांटोगे जिससे कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ जैसे वादों की पूर्ति हो सके? वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में ही कितनी जातियों की शिकायत है कि उनके संख्या बल के अनुरूप कोई लाभ नहीं मिल रहा, कि दलित और पिछड़ों के लिए आरक्षित अधिकांश पदों और सीटों पर एक ही जाति के लोग कब्जा किए चले जाते हैं और ये वंचित ही रह जाते हैं।

इन सब प्रश्नों का कोई उत्तर है आपके पास, सुशासन बाबू? नहीं है और आपको कोई फिक्र भी नहीं है। क्योंकि आपका उद्देश्य एकदम्मे निजी है। आप 2024 के आम चुनावों को प्रधानमंत्री बनने की अपनी चिर संचित अभिलाषा की पूर्ति का अंतिम अवसर मान कर चल रहे हैं।

इसी हेतु से भाजपा से गठबंधन तोड़कर पूर्व जंगल राज वाले भैय्या जी हाथ मिलाया और अब आप विपक्षी एकता का राग अलाप रहे हैं। विपक्षी दलों के नेतृत्व को हथियाने के लिए यह जाति आधारित जनगणना की मांग का नायाब हथियार इजाद कर लाए हैं। चल गया तो तीर नहीं तो तुक्का।

बन गए प्रधानमंत्री तो जीवन भर की साध पूरी जाएगी। अब नहीं तो कभी नहीं। इन जातिवादी राजनीतिज्ञों की सारी कसरत से इतर जन्मना जाति के बारे में थोड़ा सोचना समीचीन होगा क्योंकि जातिवाद भारत का सदियों पुराना सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

ना ही कोई इसकी उपेक्षा कर सकता है। हिंदू, सिख और बौद्ध ही नहीं, भारत में तो मुस्लिम और ईसाई समुदायों और सिखों तक में जाति विद्यमान है। जन्मना जाति की अवधारणा को चुनौती देने वाले भी हैं जो मानते हैं कि महाभारत के बहुतेरे प्रमुख पात्र स्वयं वर्ण संकर थ, जिन में सभी पांडव, उनके पिता, विदुर आदि भी शामिल हैं।

चारित्रिक शुद्धता के तमाम दावों के बावजूद इतिहास के सुदीर्घ काल प्रवाह में वर्ण संकरता सत्य है। सभी देशों में, सभी समाजों में यह बहुत आम है। जन्मना जातीय शुद्धता की अवधारणा काफी हद तक मिथक है। तथापि हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का मध्यमवर्गीय नैतिकता में आबद्ध रहने के कारण कई-कई पीढ़ियां सदियों तक वर्ण संकरता से मुक्त रहती आई हैं।

अभी भी हैं। हालांकि वर्तमान समय की व्यापक यौन उन्मुक्तता के चलते अब वर्ण संकरता की संभावना पिछली सदियों की तुलना में अति प्रबल हो गई है। सारांश यह कि जातिवाद अभिशाप है। इसके चलते हिंदू समाज पिछले एक हजार वर्षों तक विभाजित होकर विदेशी आक्रांताओं द्वारा लुटता पिटता और बर्बाद होता रहा, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विनाश का मूक और असहाय साक्षी बना रहा।

डर के मारे विधर्मी बना, फिर अपने ही पूर्व धर्म बंधुओं पर अत्याचार करने के अभियान में विदेशी आक्रांताओं का सहायक बनता रहा। पर विडंबना यह कि इतने विनाश से भी इसकी आंखें नहीं खुली। आज इतनी शिक्षा और पश्चिम की उदारवादी संस्कृति की गिरफ्त में आने के बाद भी जातिवाद की दीवारें पूरी मजबूती से खड़ी हैं।

एक ओर जहां तथाकथित ऊंची जाति वाले, विशेषकर ब्राह्मण, अपने विगत के गौरवशाली अधिपत्य की कल्पना से चिपके हुए झूठे श्रेष्ठता बोध के शिकार हैं तो तथाकथित पिछड़ी और दलित जातियों के लोग अतीत के अपुष्ट अत्याचारों को आधार बनाकर आरक्षण के रास्ते से अधिकाधिक आर्थिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक और राजनैतिक लाभ उठा रहे हैं।

राजनैतिक दल वोटों की राजनीति के चलते इसे बढ़ावा दे रहे हैं। यह दशा हिंदुओं के लिए आत्मघाती है। हजार वर्षों की कुटाई पिटाई से कुछ नहीं सीखा और ना ही आगे कुछ सीखने की इच्छा है। (लेखक पूर्व रक्षा संपदा अधिकारी हैं)


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