Monday, January 17, 2022
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अनिवार्य बातें

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सीटा के ईसाई मठ में महंत लूकास ने एक दिन सभी शिष्यों को प्रवचन देते समय यह कहा, ‘ईश्वर करे कि तुम सभी भुला दिए जाओ’। यह सुनकर सभी शिष्य चुप रहे, उनमें पलटकर सवाल करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। जब एक शिष्य अपनी जिज्ञासा को न दबा सकता तो उसने पूछा, ‘यह आप क्या कह रहे हैं? क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि कोई भी हमसे जगत के कल्याण करने की सीख नहीं ले पाएगा?’ महंत ने मुस्कराकर कहा, ‘तुम सभी यह जानते हो कि पुराने जमाने में सभी सत्य के मार्ग पर चलते थे और ऐसा कोई भी नहीं था, जिसके चरित्र और व्यवहार को सभी अनुकरणीय मानते’। सभी धर्म के मार्ग पर चलते थे। शुभ कर्म करते समय कोई यह नहीं सोचता था कि उन्हें धर्मसम्मत कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं। वे अपने पड़ोसी से इसलिए प्रेम करते थे, क्योंकि इसे वह जीवन का अनिवार्य अंग समझते थे। वे प्रकृति के नियमों का पालन ही तो करते थे! वे आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि वे इस दुनिया में केवल एक अतिथि के रूप में आए थे और ज्यादा बोझा नहीं ढो सकते थे। वे एक-दूसरे के साथ स्वतंत्रतापूर्वक चीजों का आदान-प्रदान करते थे। न तो वे किसी वस्तु पर अधिकार जताते थे, न ही वे किसी से ईर्ष्या रखते थे। यही कारण है कि उनके जीवन के किसी भी पक्ष के बारे में कुछ भी कहा-लिखा नहीं गया। उनका इतिहास भी नहीं है और वे कहानियों में भी नहीं मिलते। जब अच्छाई इतनी ही सर्वसुलभ और साधारण हो जाती है तो उसका पालन करने वालों की प्रशंसा कौन करता है?’


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