Tuesday, March 31, 2026
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मानवता के लिए

सिरोही नामक राज्य में भयानक अकाल पड़ा। सिरोही नरेश ने खजाने से काफी धन खर्च किया। कई तरह के प्रयास किए, लेकिन कोई असर नहीं हो रहा था। उन्होंने राज्य के विचारशील नागरिकों की सभा बुलाई। कई सुझाव आए। एक वृद्ध नागरिक ने कहा, ‘अन्नदाता, नंदीवर्धन पुर के नगर सेठ शाह झांझड़वाले काफी धनवान एवं धर्मात्मा हैं। वे अवश्य मदद करेंगे। किंतु इसके लिए राज्य को स्वयं उनसे याचना करनी होगी।’

सभासदों को यह सुझाव नहीं भाया। पर नरेश अत्यंत उदार और प्रजावत्सल थे। उन्होंने सभी का संकोच तोड़ते हुए कहा, ‘इसमें अपमान की बात नहीं। शाह भले व्यक्ति हैं। उनके सामने लोकहित के कार्य हेतु मांगने में शर्म कैसी? यदि शाह जी को निवेदन करने पर प्रजा की रक्षा हो जाए, तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?’ उनके आदेश पर उनके मंत्री और राज्य कर्मचारी नंदीवर्धनपुर के चौराहे पर पहुंचे और लोगों से शाह का पता पूछा। उनकी हवेली के आगे एक व्यक्ति पशुशाला की सफाई कर रहा था।

मंत्री ने रौबीले स्वर में कहा, ‘ऐ मजदूर, जाकर शाह साहब से कहो कि सिरोही राज्य के मंत्री मिलने आए हैं।’ वह व्यक्ति अंदर गया और साफ-सुथरी पोशाक पहनकर मंत्री महोदय के सामने हाथ-जोड़ कर विनम्र भाव से बोला, ‘आप संदेश भिजवाते, तो मैं स्वयं आपकी सेवा में हाजिर हो जाता। नरेश कुशल तो हैं। मेरे लिए उनका क्या हुक्म है?’ मंत्री महोदय यह जानकर लज्जित हो गए कि उन्होंने शाह को मजदूर समझा। वह झिझकते हुए बोले, ‘राज्य में अकाल पड़ा है। खजाना खाली हो चुका है और….।’

बीच में ही शाह बोले, ‘महाराज ने इतनी छोटी-सी बात के लिए आपको यहां भेजा। आप दरबार में बैठे हुए आज्ञा देते, तो भी आपका यह सेवक तैयार था। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब राज्य का ही तो है।’ यह सुनकर सब भावविभोर हो उठे।

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