Saturday, May 23, 2026
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अभिशाप बनती जंगलों की आग

Samvad 1


06 16जंगल की आग से निकलने वाले धुएं से हर साल दुनिया भर में समय से पहले 2 लाख से अधिक मौतें हो जाती हैं। हाल के वर्षों में जंगल में आग लगने की घटनाओं में तेजी आई है। जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में सूखे और लू को बढ़ा रहा है। यह उस क्षेत्र को लगभग दोगुना कर रहा है, जहां चिंगारी सूखी वनस्पति में आग लगा सकती है और खतरे को भयावह रूप दे सकती है। नतीजतन, दुनिया भर में जंगलों में बार-बार लगने वाली आग का आकार और तीव्रता बढ़ रही है और धुएं के मौसम लंबे होते जा रहे हैं। गोवा के जंगल इस महीने की शुरुआत से ही धधक रहे हैं। समूची महादेई वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी ऐसी झुलसी है कि सही होने में कम से कम 5 साल लगेंगे। यह आग सिर्फ गोवा नहीं, 23 राज्यों के जंगलों में लगी है। भारतीय वन सर्वेक्षण 2021 के अनुसार पिछले 13 सालों में 733625 वर्ग किलोमीटर के वन में आग लगे है। पिछले दो दशकों के 10 गुणी वृद्धि हुई है जो कि चिंता का विषय है। एक रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2020 से जून 2021 तक 398774 आग की सामान्य घटनाएं हो चुकी है।

उसके बाद नवंबर 2021 से जून 2022 तक 223333 आग की सामान्य घटनाएं देखने को मिली है तो वहीं जनवरी 2022 से मार्च 2022 तक में ही 136604 आग की सामान्य घटनाएं हो चुकी है। इस वर्ष मार्च 2023 तक 42799 जगह आग की लपटो के चपेट में आ चुका है। जिसमें सिर्फ कर्नाटक में 2942 घटनाएं हो चुकी हैं, जो सिर्फ 15 फरवरी से 2 मार्च के बीच हुई हैं। उत्तराखंड के जंगलों में आग हर साल आने वाली ऐसी आपदा है जिसमें इंसानी दखल मुख्य कारण माना जाता है। हर साल सैकड़ों हेक्टेयर जंगल आग से खाक हो जाते हैं और इससे जैव विविधता, पर्यावरण और वन्य जीवों का भारी नुकसान होता है।

आग का यह भयावह रूप निश्चित रूप से वायु प्रदुषण को भी जन्म दे रहा है। जंगल की आग के धुएं में दर्जनों अलग-अलग तरह के कण होते हैं, जैसे कालिख और रसायन, जिनमें कार्बन मोनोआॅक्साइड शामिल है, लेकिन वायु गुणवत्ता के विशेषज्ञों के लिए मुख्य चिंताओं में से एक धुएं में पाए जाने वाले सूक्ष्म कण पीएम 2.5 हैं। पीएम 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम की माप के अंतर्गत आते हैं।

पीएम 2.5 इंसान के बाल की चौड़ाई के औसतन 1/40वें भाग के बराबर होते हैं। डब्लूडब्लूएफ की रिपोर्ट में कहा गया था कि 1970 से 2014 तक 60 प्रतिशत जीव नष्ट हो चुके हैं, जो जैव सुरक्षा को चुनौती दे रहा है। एक तरफ हम विश्व मंच पर जैव सुरक्षा और पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए प्रयासरत हैं, दूसरी ओर जंगलो में मानव जनित आग द्वारा जीवों और पर्यावरण का नष्ट होना हमें सोचने पर मजबूर कर देता है।

जंगलों में लगने वाले कारणों की बात करें तो जंगलो में आग लगने के विभिन्न कारण होते हैं। आग लगने के लिए तीन चीजों की जरूरत होती है। र्इंधन, आॅक्सीजन और गर्मी। गर्मियों में जब सूखा अपने चरम पर होता है तो ट्रेन के पहिए से निकली हुई एक चिंगारी भी उग्र आग का रूप ले सकती है। कभी-कभी आग प्राकृतिक रूप से आग लग जाती है। ये आग या तो अधिक गर्मी की वजह से लगती है या फिर बिजली कड़कने से। बिजली

चमकना,ज्वालामुखीय उदगार, गिरती चट्टानों की रगड़ से उत्पन्न होने वाली चिंगारियां, कोयले की परत में आग लगना, अकस्मात आग का लगना तथा मानवीय कारण-जैसे सिगरेट-बीड़ी के टुर्रा तथा पावर लाइन इत्यादि से। उत्तराखंड के वन विभाग में फॉरेस्ट फायर आॅफिसर के अनुसार जंगल में आग लगने की वजह 98 फीसदी मानव जनित होती है। अक्सर ग्रामीण जंगल में जमीन पर गिरी पत्तियों या सूखी घास में आग लगा देते हैं, ताकि उसकी जगह पर नई घास उग सके।

यह आग भड़क जाने पर बेकाबू हो जाती है, जैसा इस साल भी दिख रहा है। चीड़ के जंगलों में सबसे अधिक आग लगती है, क्योंकि चीड़ की पत्तियां (पिरुल) और छाल से निकलने वाला रसायन, रेजिÞन, बेहद ज्वलनशील होता है। जानबूझकर या गलती से ही अगर इन जंगलों में आग लग जाती है तो वह बेहद तेजी से भड़कती है। उत्तराखंड में 16-17 फीसदी जंगल चीड़ के हैं और इन्हें जंगलों की आग के लिए मुख्यत: जिÞम्मेदार माना जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि जंगलों में आग लगने से सिर्फ नुकसान ही होता है।

इसके कुछ फायदे भी है। यह जैव विविधता संरक्षण, घास के मैदानों और झाड़ीनुमा पयार्वासों को पुनर्जीवित करने में मदद करता हैं। प्राकृतिक तौर पर लगी जंगली आग पुरानी वनस्पतियों को साफ कर पोषक तत्व प्रदान करने का भी कार्य करता है। यही नहीं, यह आग सूर्य के प्रकाश को वन तल तक पहुचाने में सहायता करती हैं, जिससे छोटे पौधे और बीजों के पनपने में मदद मिलती हैं।

जंगल को बचाना है तो अपने फॉरेस्ट ईको-सिस्टम को समझना होगा। चाहे वह चीड़ के जंगल हों या दूसरे वन, सभी जगह रेन वाटर हार्वेस्टिंग की जानी चाहिए। अगर जंगल में और आस-पास नमी होगी तो स्थानीय वनस्पतियां खुद ही फलने-फूलने लगेंगी और उससे भूजल भी बढ़ेगा। जंगलों में आग भड़कने की मुख्य वजह स्थानीय लोगों का जंगलों से संबंध खत्म होना है।

जंगल के आस-पास रहने वाले लोगों को लकड़ी लेने का अधिकार बनाए ही रखा जाए और उनको पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाया जाए, ताकि आग लगने की स्थिति में वे बुझाने तत्पर रहें। वर्तमान में आवश्यकता है कि गांवों को जंगलों की ज्यादा जिÞम्मेदारी दी जानी चाहिए, अधिकार के साथ ताकि आग लगते ही उसे बुझाने के लिए कोशिशें भी शुरू हो जाएं और वन विभाग का इंतजार न हो।

इसके अलावा जंगल में आग लगने पर एक विशेष टूल का इस्तेमाल किया जाता है, जो तापमान, हवा की गति जैसे मानकों की जांच करने में मदद करती है। ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे उन सभी चीजों को हटा दिया जाए, जो चिनगारी पैदा करती हों। मंत्रालय को ध्यान देना चाहिए कि वन विभाग के पास वायरलैस के जरिए संचार करने का बेहतर साधन होना चाहिए, जिससे जंगल में लगी आग पर जल्दी काबू पाया जा सके।

अधिकारियों को अगर वन में सफर करना हो तो वन विभाग के पास एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए तेज वाहन की व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अगर आग लगती भी है तो त्वरित रोका जाए उससे पहले कि व्यापक हो जाए। इन सब के अतिरिक्त सबसे बड़ी समय वित्त की है जिसके लिए वनों की देखभाल और उनके संरक्षण के लिए वन विभाग को पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जाए।

अगर जल्दी से जल्दी जंगलों के आग पर काबू नही पाया गया तो फिर यह व्यापक खतरा बनता दिख रहा है क्योंकि इससे वनस्पतियों का सर्वनाश तो हो ही रहा है, साथ में वन्य जीव भी नष्ट हो रहे हैं। ऐसे में एक ओर जहां हम जैव सुरक्षा के लिए विश्व स्तर पर संधियां और कानून बना रहे हैं, वहीं यूं ही उनका जल के मरना, वन का नष्ट होना, यह सब प्रकृति के लिए बुरा संदेश है।


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