Monday, July 22, 2024
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संसद में कम होती मुस्लिम नुमाइंदगी

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Ravivani 34


Zahid Khanमुसलमान, आबादी के लिहाज से संसद में क्यों नहीं पहुंच पाते ? इसके पीछे एक और बड़ी वजह है। देश में कई विधानसभा, लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 45 से 50 फीसद है। लेकिन यह सीटें अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित होने की वजह से वे संसद में नहीं पहुंच पाते हैं। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में निर्वाचन क्षेत्र में मौजूदा ऐसी विषमताओं को दूर करने के लिए सरकार से सिफारिश की थी कि जिन विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र में मुसलमानों की आबादी ज्यादा है, वहां परिसीमन अधिनियम की समीक्षा की जाए। देश में हर आम चुनाव में मुस्लिमों की नुमाइंदगी आहिस्ता-आहिस्ता कम होती चली जा रही है। 18वीं लोकसभा में मुसलमानों की यदि नुमाइंदगी देखें, तो 543 सांसदों वाले सदन में इस मर्तबा कुल 26 मुस्लिम सांसद ही निर्वाचित हुए हैं। जो कि बेहद कम हैं। संसद में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व बढ़ने की बात तो छोड़िए, अब तमाम सियासी पार्टियां उन्हें टिकट देने से भी कतराती हैं। कहीं बीजेपी उन पर मुस्लिम-परस्त होने का इल्जाम न लगा दे। और यह हुआ भी है। पार्टी के कुछ बडे़ लीडर इस मुद्दे पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का कोई भी मौका अपने हाथ से नहीं जाने देते। 17वीं लोकसभा के चुनाव में मुख़्तलिफ सियासी पार्टियों ने 115 मुस्लिमों को टिकट दिया था, लेकिन इस बार उन्होंने सिर्फ़ 78 मुस्लिम प्रत्याशियों पर ही अपना दांव लगाया। जबकि देश में 100 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है। यदि पार्टियां मुस्लिमों को टिकट बांटने में और उदार हों, तो उनकी तादाद सदन में बढ़ेगी, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं। पिछली लोकसभा यानी सत्रहवीं लोकसभा में 27 मुस्लिम सांसद संसद में पहुंचे थे। इस चुनाव में एक सांसद और कम हो गया।

18वीं लोकसभा में मुस्लिम नुमाइंदगी का संख्यावार विश्लेषण करें, तो सबसे अधिक छह मुस्लिम सांसद पश्चिम बंगाल से संसद में पहुंचे हैं। सूबे के जंगीपुर, बहरामपुर, मुर्शिदाबाद, बशीरहाट, माल्दा दक्षिण और उल्बेरिया छह सीटों से मुस्लिम उम्मीदवारों ने लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की है। जिसमें पांच सीटों पर तृणमूल कांग्रेस, तो एक सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीता है। पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा उलटफेर बहरामपुर सीट पर हुआ। जहां से टीएमसी ने क्रिकेटर यूसुफ पठान को कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी के सामने चुनाव मैदान में उतारा था। पहली बार चुनाव लड़ रहे यूसुफ पठान ने सभी को चौंकाते हुए, छह बार के सांसद अधीर रंजन चौधरी को 85 हजार से ज्यादा वोटों से शिकस्त दे दी। देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी उत्तर प्रदेश में है, जो कि राज्य की कुल आबादी का 20 फीसद है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने चार मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। और ये चारों ही उम्मीदवार जीत दर्ज कर, संसद में पहुंच गए हैं। सहारनपुर लोकसभा सीट पर इंडिया गठबंधन की ओर से कांग्रेस नेता इमरान मसूद चुनाव मैदान में थे। और उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी को 64 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। इस तरह उत्तर प्रदेश से पांच मुस्लिम सांसद देश की संसद में अपनी आवाज उठाएंगे। इस लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने सबसे ज्यादा 35 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था, लेकिन अफसोस! सभी इलेक्शन हार गए।

देश के बाकी राज्यों की अगर बात करें, तो बिहार जहां मुसलमानों की तीसरी बड़ी आबादी निवास करती है, वहां से सिर्फ़ दो मुस्लिम उम्मीदवार ही लोकसभा में पहुंचे हैं। सूबे की कटिहार सीट से कांग्रेस के तारिक अनवर, तो किशनगंज सीट से कांग्रेस के मोहम्मद जावेद जीते हैं। इसके अलावा केरल और जम्मू और कश्मीर से तीन-तीन मुसलमान सांसद चुने गए हैं। तो वहीं असम से भी इस मर्तबा दो मुस्लिम सांसदों ने संसद में पहुंचने में कामयाबी हासिल की है। तेलंगाना, कर्नाटक, लद्दाख, लक्ष्यद्वीप और तमिलनाडु से एक-एक मुस्लिम सांसद के तौर पर निर्वाचित हुए हैं। लक्षद्वीप से कांग्रेस के मुहम्मद हमदुल्लाह सईद ने जीत दर्ज की, तो असम के धुबरी से कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने एआईयूडीएफ के प्रमुख मोहम्मद बदरुद्दीन अजमल को 10 लाख से ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। वहीं लद्दाख में निर्दलीय उम्मीदवार मोहम्मद हनीफा ने चुनाव जीतकर, सभी को हैरान कर दिया है। दिलचस्प बात ये भी है कि कश्मीर के बारामूला से एक और निर्दलीय प्रत्याशी अब्दुल रशीद शेख ने नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला को बड़ी शिकस्त दी। अनंतनाग से नेशनल कांफ्रेस के मियां अल्ताफ अहमद ने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती को हराया।

केरल की बात करें, तो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के दो मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते हैं। मलप्पुरम से मोहम्मद बशीर और पोन्नानी से डॉ. एम.पी. अब्दुस्समद समदानी। वाम मोर्चे ने केरल के अलप्पुझा से एक मुस्लिम सांसद को लोकसभा में भेजा है। तमिलनाडु में रामनाथपुरम लोकसभा सीट से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ही के. नवस्कानी संसद में पहुंचे हैं। गौरतलब है कि वहां आईयूएमएल, डीएमके नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा थी। हैदराबाद (तेलंगाना) से ‘आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर जीत दर्ज की है। लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाली पार्टियों में से बीजेपी एक अदद ऐसी पार्टी है, जिसकी तरफ से इस चुनाव में भी एक भी मुस्लिम सांसद लोकसभा नहीं पहुंचा है। यही हाल सत्रहवीं लोकसभा का था।

साल 2006 में मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनैतिक दशा बयां करने वाली सच्चर कमेटी ने अपनी बहुचर्चित रिपोर्ट में भारतीय लोकतंत्र की इस विसंगति की ओर खास तौर पर इशारा किया था कि ‘‘भारत जैसे बहुसांस्कृतिक, सामाजिक संरचना वाले देश में सभी वयस्कों को मताधिकार के आधार पर स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अक्सर जातीय, भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को कम आबादी की वजह से निर्वाचित होने का मौका नहीं मिल पाता। इससे सत्ता में हिस्सेदारी का उन्हें कम मौका मिलता है।’’ अभी तलक के लोकसभा चुनावों के रिकार्ड उठाकर देखने पर, इस बात की तस्दीक खुद-ब-खुद हो जाती है। लोकसभा चुनाव में अभी तक मुस्लिम नुमाइंदगी 21 से 49 सीटों के आंकड़ों को ही छू पाई है। यानी लोकसभा की कुल सीटों में 4.3 से 6.6 फीसद ही मुसलमानों का प्रतिनिधित्व हो पाता है। स्वतंत्र भारत में जब पहली बार 1952 में चुनाव हुए, तो 25 मुसलमान संसद पहुंचे थे। भारतीय संसद में सबसे ज्यादा मुसलमान सांसद, साल 1980 में चुने गए। इस चुनाव में 49 मुसलमान निर्वाचित हुए थे। वहीं 1984 के आम चुनाव में भी मुसलमानों की नुमाइंदगी थोड़ी तसल्लीबख़्श थी। उस वक़्त 45 मुसलमान सांसद चुने गए थे। उसके बाद, तो लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार कम होता जा रहा है।

सच्चर रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण बात कहती है कि ‘‘मुसलमान अपनी जनसंख्या बाहुल्य वाले चुनाव क्षेत्रों से भी नहीं जीत पाते हैं।’’ 16वीं, 17वीं और 18वीं लोकसभा में कई मुस्लिम बाहुल्य सीटों के रिजल्ट, इस बात की पुष्टि करते हैं। आजाद हिन्दुस्तान में संसद में मुसलमानों की नुमाइंदगी दिन पर दिन मुश्किल होती जा रही है। देश के बंटवारे ने भारतीय समाज पर जो साम्प्रदायिक प्रभाव डाला, वह आज भी साफ दिखाई पड़ता है। जहां बहुसंख्यक समाज ‘हम’ और बाकी अल्पसंख्यक समाज जिसमें भी खास तौर से मुसलमान, ‘वे’ में विभाजित हो गए हैं। देश में मुस्लिम आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर ही नहीं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं। देश के कई राज्यों में अच्छी आबादी होने के बाद भी, आबादी के अनुपात में ना तो उनकी विधानसभा में और ना ही लोकसभा में नुमाइंदगी होती है। तल्ख हकीकत यह है कि 18वीं लोकसभा में देश के कई राज्यों से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि राज्यों से एक भी मुस्लिम सांसद संसद नहीं पहुंचा है। गुजरात जहां की आबादी में मुस्लिमों की भागीदारी 9.5 फीसदी है, वहां से आखिरी बार साल 1984 में कोई मुस्लिम सांसद लोकसभा में चुनकर पहुंचा था।

मुसलमान, आबादी के लिहाज से संसद में क्यों नहीं पहुंच पाते ? इसके पीछे एक और बड़ी वजह है। देश में कई विधानसभा, लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 45 से 50 फीसद है। लेकिन यह सीटें अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित होने की वजह से वे संसद में नहीं पहुंच पाते हैं। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में निर्वाचन क्षेत्र में मौजूदा ऐसी विषमताओं को दूर करने के लिए सरकार से सिफारिश की थी कि ‘‘जिन विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र में मुसलमानों की आबादी ज्यादा है, वहां परिसीमन अधिनियम की समीक्षा की जाए।’’ सच्चर कमेटी की इस सिफारिश पर कदम बढ़ाते हुए तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने विधानसभा, लोकसभा में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया था। लेकिन बाद में इस कमेटी की रिपोर्ट का क्या हश्र हुआ,, किसी को कुछ नहीं मालूम। साल 2014 में केन्द्र की सत्ता में भारी बहुमत से बीजेपी के आने और प्रधानमंत्री पद पर नरेन्द्र मोदी के आसीन हो जाने के बाद, सच्चर कमेटी की इस सिफारिश पर कोई कार्यवाही होगी, इसकी रही—सही उम्मीद भी खत्म हो गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक तरफ ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा बुलंद करते हैं, तो दूसरी ओर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों की संसद में मुस्लिम नुमाइंदगी से बेपरवाह हैं। मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिए जरूरी है कि संसद में इस समुदाय की नुमाइंदगी बढ़ाई जाए। तभी सच मायने में ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा चरितार्थ होगा।


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