Wednesday, May 6, 2026
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घन मंघड नभ गरजत घोरा

Ravivani 34

आतिफ रब्बानी

हाल ही में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा पोषित एक अन्य अध्ययन ‘डिकोडिंग इंडियाज चैन्जिंग मॉनसून पैटर्न्स’किया गया है। इस शोध में देश की साढ़े चार हजार तहसीलों से गत चार दशकों के वर्षा के आंकड़े जुटाए गए। इन आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया किपिछले एक दशक में मॉनसून का मिजाज बिगड़ गया है। मॉनसून पैटर्न में अनियमित बदलाव आया है। कहीं भारी बारिश होती है तो कहीं सूखा पड़ जाता है। पिछले दिनों भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएँ भी आम होती जा रही हैं। मानो कुदरत अपनी नाराजगी प्रकट कर रही हो।

बारिश कुदरत का कारनामा है, फितरत का नग़्मा है। प्रकृति का मधुर प्रेमगीत है। जेठ की तपिश झेल चुकी धरती पर जब वर्षा की फुहारें पड़ती हैं, प्रकृति मचल उठती है। प्यासी धरती पर छन्न-से पड़ी बूंदें दिलकश संगीत पैदा करती हैं।वातावरण में सोंधी खुशबू बिखर जाती है। ऐसी खुशबू जिससे आत्मा तृप्त हो उठे। रूह आसूदा हो जाए। जिजीविषा जाग उठे। वर्षा प्रकृति को जीवन बरतने का आश्वासन देती है। आशा का संचार होता है। जिÞंदगी की नई लहर दौड़ जाती है। शादमानी रक़्स करने लगती है। कवि कह उठता है झ्र‘धरती के सूखे अधरों पर/ गिरी बूंद अमृत-सी आकर/ वसुंधरा की रोमावलि-सी/ हरी दूब पुलकी-मुसकाई/ पहली बूंद धरा पर आई।’

अषाढ़ के आर्द्रा नक्षत्र की पहली बूंद पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के जीवन में सम्भावना लेकर आती है। वहीं सावन मेंवर्षा ऋतु अपने सुंदरतम रूप में और चरम पर होती है। फिजा में हरियाली फैल जाती है। अच्छी फसल की उम्मीद बनती है। यह संपन्नता के उत्सव का अवसर है। कोयल की कूक, पपीहे के पीहू-पीहू और मेंढकों की टर्र-टर्र से जीवन-राग जाग उठता है। सुदूर गांवों में रोपनी शुरू हो जाती है। महिलाएँ रोपनी का गीत गाती हैं। पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते हैं, दोशीजाएँ झूलती हैं। युवतियाँ बाग-बागीचों में अठकेलियाँ करती हैं। उधर, नवविवाहताओं का मन भी अपने नैहर जाने को हुलकता है। अमीर खुसरो इन नवविवाहताओं के जज्बात को शब्द देते हैं-‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया।’प्रकृति का जादू चल निकलता है।

सावन सबको शराबोर कर देता है। नदियां उफान पर होती हैं। नदी-सरोवर लबालब हो जाते हैं। साथ ही, इंसान के जज्बात भी मचल उठते। सभी अपने प्रियतम के सानिध्य के लिए तड़प उठते हैं। बारिश का मौसम है, बादल गरजते हैं, बिजली कड़कती है, सीता माता भगवान राम से बिछुड़ हुई हैं, तुलसीदास जी लिखते हैं-‘घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।’

प्रकृति का चक्र तभी चलता है जब उत्पादन होता रहे। पेड़-पौधे और कृषि-फसल, जो ग्रीष्म ऋतु में सूख जाते हैं, उनका पुनर्जीवन हो, चहुँ ओर हरीतिमा फैल जाए। इन सबके लिए वर्षा होना आवश्यक है। यदि कभी वर्षा कम होती है तो कृषि उत्पादन पर भी असर पड़ता है। भारत की फलती-फूलती अर्थव्यवस्था के लिए मॉनसून बहुत महत्वपूर्ण है। देश की आत्मा गांवों में बसती है। कृषि ग्रामीण जीवन का आधार है। खेती-किसानी अभी भी काफी हद तक वर्षा पर निर्भर है। अच्छी वर्षा का मतलब है-अच्छा उत्पादन। अच्छे उत्पादन से अर्थव्यवस्था का पहिया भी रवां-दवां रहता है। मॉनसून की वर्षा से ही नदी-नाले, तालाब-जलाशय भरते हैं। भूमिगत जलस्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त वर्षा जरूरी है।

इंसान तो इंसान को सता ही रहा है, अब तो मौसमों के तेवर भी बदलने लगे हैं। पिछले वर्ष भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के जर्नल ‘मौसम’ में एक दिलचस्प शोध ‘वेरिएशंस इन इंडियन समर मॉनसून रेनफॉल पैटर्न्स इन क्लाइमेट चेंज’ प्रकाशित हुआ। इस शोध के मुताबिक देश में दक्षिणी-पश्चिमी मॉनसून के दौरान होने वाली बारिश पश्चिम की ओर स्थानांतरित हो रही है। हाल ही में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा पोषित एक अन्य अध्ययन ‘डिकोडिंग इंडियाज चैन्जिंग मॉनसून पैटर्न्स’ किया गया है। इस शोध में देश की साढ़े चार हजार तहसीलों से गत चार दशकों के वर्षा के आंकड़े जुटाए गए। इन आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया किपिछले एक दशक में मॉनसून का मिजाज बिगड़ गया है। मॉनसून पैटर्न में अनियमित बदलाव आया है। कहीं भारी बारिश होती है तो कहीं सूखा पड़ जाता है। पिछले दिनों भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं भी आम होती जा रही हैं। मानो कुदरत अपनी नाराजगी प्रकट कर रही हो।

सवाल उठता है कि कुदरत गाहे-ब-गाहे अपनी नाराजगी क्यों जाहिर करती रहती है? मॉनसून का मिजाज क्यों बिगड़ा रहा है? मौसम के चक्र में क्यों उलटफेर हो रहा है? इसका जवाब है कि मानव की असीमित इच्छाओं के सामने संसाधन कम पड़ रहे हैं। विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण की नितांत अनदेखी हो रही है। जंगल अंधाधुंध काटे जा रहे हैं। दिन-ब-दिन अनियंत्रित कार्बन उत्सर्जन बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर जलवायु परिवर्तन पर पड़ता। नतीजतन मौसमों के पैटर्न में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आईएमडी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा में पिछले पचास सालों में लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। आने वाले दशकों में वर्षा के पैटर्न में और भी अधिक परिवर्तन की संभावना है। बारिश के पैटर्न में होनेवाला यह बदलाव निश्चय ही कृषि और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालेगा।

मौसम के बदलते चक्र के गहरे निहितार्थ हैं। इससे आर्थिक, सामाजिक और जनजीवन से जुड़ी गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। पोषणीय विकास के बिना खुशहाली संभव नहीं। चाहे कितनी भी तरक़्की कर ली जाए आॅक्सीजन के लिए हम पेड़-पौधों पर ही निर्भर रहते हैं। बारिश वरदान है। बारिश से ही आसमान में इंद्रधनुष नमूदार होता है। इंद्रधनुष जीवन में रंग भरता है। जीवन में रंग तभी होगा जब हम प्रकृति के साथ साम्य बना कर रखेंगे।
(लेखक भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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