Wednesday, April 1, 2026
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भविष्य की रोशनी का वैश्विक संकल्प

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प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से एक अटूट डोर से बंधा रहा है, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हमने उस डोर को इतना खींच दिया है कि अब उसके टूटने की आहट साफ सुनाई देने लगी है। इसी आहट को पहचानने और दुनिया को एक धागे में पिरोने का नाम है—अर्थ आॅवर। हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को दुनिया भर के करोड़ों लोग अपनी मर्जी से अपने घरों और दफ्तरों की लाइटें एक घंटे के लिए बंद कर देते हैं। यह केवल बिजली बचाने का कोई तकनीकी काम नहीं है, बल्कि यह धरती के प्रति हमारी कृतज्ञता और चिंता का एक सामूहिक प्रदर्शन है। 28 मार्च की वह शाम जब घड़ी की सुइयां एक खास वक्त पर आकर ठहरेंगी और शहर की चकाचौंध को एक सुकून भरी खामोशी निगल लेगी, तब वह अंधेरा हमें डराएगा नहीं, बल्कि हमें आईना दिखाएगा।

सोचिए, जिस सूरज की रोशनी और जिस हवा के झोंकों ने हमें जीवन दिया, आज वही हवा जहरीली हो रही है और वही मौसम बेईमान हो चुके हैं। हम एक ऐसी सभ्यता बन गए हैं जिसने उजाले की इतनी हसरत पाल ली कि हम सितारों भरी काली रातों का सौंदर्य ही भूल गए। अर्थ आॅवर हमें उसी प्राकृतिक सौंदर्य की याद दिलाता है। यह साठ मिनट का समय हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक तपती हुई धरती छोड़कर जा रहे हैं या एक सुरक्षित आशियाना? जब पेरिस के एफिल टॉवर से लेकर मुंबई के गेटवे आफ इंडिया तक की लाइटें गुल होती हैं, तो संदेश साफ होता है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, कुदरत के नियमों से ऊपर नहीं हैं।

नदी जैसे बहते इस जीवन में हम अक्सर भूल जाते हैं कि हर छोटी बूंद समंदर बनाती है। कई लोग सवाल करते हैं कि महज एक घंटा लाइट बंद करने से क्या होगा? क्या इससे ग्लोबल वार्मिंग रुक जाएगी? जवाब है—शायद तुरंत नहीं, लेकिन यह एक घंटा हमारे भीतर की सोई हुई चेतना को जगाने के लिए काफी है। यह एक ऐसी प्रतीकात्मक शुरूआत है जो हमें बताती है कि अगर हम एक घंटे के लिए पूरी दुनिया के साथ एकजुट हो सकते हैं, तो हम साल के बाकी दिनों में भी पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बन सकते हैं। यह अंधेरा दरअसल हमारी आत्मा का वह उजाला है जो हमें प्लास्टिक कम इस्तेमाल करने, पानी बचाने और हरियाली बढ़ाने की प्रेरणा देता है।

आज जलवायु परिवर्तन कोई किताबी शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारे दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। कहीं बेमौसम बरसात हो रही है, तो कहीं रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है। पहाड़ों का पिघलना और समंदर का बढ़ता स्तर हमें लगातार चेतावनी दे रहा है। अर्थ आॅवर इसी चेतावनी को एक सकारात्मक आंदोलन में बदलने का जरिया है। यह वह समय है जब हम अपनी मशीनी दुनिया से कटकर अपनों के साथ बैठ सकते हैं और उस खामोशी को महसूस कर सकते हैं जिसे हम दिनभर के शोर-शराबे में अनसुना कर देते हैं।

अखबारों की सुर्खियों में जब प्रदूषण की खबरें आती हैं, तो हम अक्सर सरकार और सिस्टम को दोष देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन अर्थ आॅवर हमें व्यक्तिगत जिम्मेदारी का एहसास कराता है। यह बताता है कि दुनिया बदलने की शुरूआत हमारे अपने घर के स्विच बोर्ड से होती है। हमें यह गहराई से समझना होगा कि यह धरती हमें पूर्वजों से मिली कोई जागीर नहीं है, बल्कि हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है। और उधार ली गई चीज को हमेशा बेहतर स्थिति में ही वापस लौटाना चाहिए।

यह एक घंटा हमें यह भी सिखाता है कि उजाले का असली मोल अंधेरे की कोख में ही छिपा होता है। हमारी बेतहाशा बढ़ती जरूरतों ने धरती के संसाधनों को बुरी तरह निचोड़ दिया है, जिससे संतुलन बिगड़ रहा है। अब समय आ गया है कि हम अपनी विकासपरक सोच को पर्यावरण के साथ जोड़कर एक नई दिशा की ओर कदम बढ़ाएं। यदि हम आज सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास न तो शुद्ध हवा होगी और न ही शांत नीला आसमान। प्रकृति के साथ किया गया हर छोटा समझौता अंतत: मानव सभ्यता के लिए ही एक बड़ा संकट बनकर सामने खड़ा हो जाता है।

इस 28 मार्च को जब आप अपने घर का स्विच बंद करें, तो उसे केवल एक साधारण क्रिया न समझें। उसे एक बड़ा संकल्प समझें। वह एक घंटा इस बात की गवाही दे कि हम अपनी सुख-सुविधाओं के साथ-साथ इस नीले ग्रह की धड़कनों का भी ख्याल रखते हैं। वह अंधेरा हमें यह सिखाए कि असली चमक बाहर की कृत्रिम लाइटों में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने में है। आइए, इस सादगी भरी मुहिम का हिस्सा बनें और दुनिया को दिखा दें कि इंसानियत अभी सोई नहीं है, वह जाग रही है—सिर्फ एक घंटे के उस जादुई अंधेरे के लिए।

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