Wednesday, May 20, 2026
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अच्छे संस्कार ही सभ्य समाज की नींव है

Sanskar 7


23 16एक बच्चे के जन्म से पहले ही उसके अंदर संस्कारों का समावेश मां द्वारा शुरू कर दिया जाता है। गीता, पुराण आदि पढ़कर एक मां अपने बच्चे के जन्म से पूर्व ही अध्यात्म के ये गुण उसमें डालने का प्रयास करने लगती है। अपने से बड़ों और गुरुजनों का सम्मान करना बचपन से ही उसे सिखाया जाता है। भोजन करने से पूर्व हाथ जोड़कर प्रार्थना करना, भोजन को अपने से ऊंचा स्थान प्रदान करना, दान-धर्म करना, समाज सेवा करना, जरूरतमंदों के काम आना, पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना, अपने से पहले दूसरों के हित के लिए सोचना आदि अनेकों गुण परिवार के सदस्य बच्चों को बहुत कम उम्र से ही देने लगते हैं। संस्कार ही हमारे जीवन का मूलाधार है। यह भी कह सकते हैं कि श्रेष्ठ संस्कार ही संस्कृति का प्राण है। संस्कार एक ऐसा व्यापक शब्द है जो समाज का इतिहास और जीवन की भूमिका प्रस्तुत करने में पूरी तरह समर्थ है। अच्छे संस्कारों से मनुष्य का संपूर्ण जीवन प्रभावित होता है।संस्कार शब्द का मूल अर्थ है, ‘आवश्यक रूप से किए जाने वाले कार्य’। मूलत: संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से था जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रूप से योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के लिए किए जाते थे, किंतु हिंदू संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति में अभीष्ट गुणों को जन्म देना भी था।

प्राचीन भारत में संस्कारों का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व था। संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृत्तियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों का कल्याण करता था। ये संस्कार इस जीवन में ही मनुष्य को पवित्र नहीं करते थे, उसके पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते थे। प्रत्येक संस्कार से पूर्व होम किया जाता था, किंतु व्यक्ति जिस गृह्यसूत्र का अनुकरण करता हो, उसी के अनुसार आहुतियों की संख्या, हव्यपदार्थों और मन्त्रों के प्रयोग में अलग-अलग परिवारों में भिन्नता होती थी

संस्कार रूपी धन एकत्रित करने के लिए सदाचरण की पूंजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है। जब तक गंभीरता से आत्म विवेचन का कार्यक्रम नहीं बनाते तब तक गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन लाना आसान नहीं रहता। सनातन अथवा हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिए संस्कारों का अविष्कार किया।

धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।आप जिस कार्य के लिये भी पूर्ण रुचि लगन और तत्परता के साथ काम करेंगे उसमें सफलता अवश्य मिलेगी।अपने जीवन में अशुभ संस्कारों के निवारण के लिए स्मृतियों, अनुभवों और आदतों का विश्लेषण करना चाहिए ताकि वस्तुस्थिति का सच्चा ज्ञान मिले। मनुष्य प्राय: अज्ञान में ही बुराइयां करता है। इसलिए वह दुख भी पाता है।

बुरे संस्कारों का परिणाम भी सदैव दु:खदाई ही होता है। इसलिए बुराई त्याग करने के लिए साहस और धैर्य का आत्म विवेचन करते रहना चाहिए। यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो संस्कार शब्द का मतलब ही बदल गया है। बड़ों का चरण स्पर्श करना, दंडवत प्रणाम करना, नमस्कार करने का स्थान हेलो, हाय, गुडमार्निंग, गुडइवनिंग, गुडनाइट ने लिया है।

पिताश्री, पिताजी, बाबूजी, पापा, डैड से पॉप, माताश्री से माताजी, मम्मी से मॉम, ग्रैंड पा, ग्रैंड मां..के संबोधन सुनाई देने लगे हैं। भ्राताश्री से भइया, भाई से ब्रो, बहना से दीदी, जीजी से अब सिस पर आकर हमारा समाज ठहर गया है। क्या भविष्य है हमारे समाज का और हमारी आने वाली पीढ़ी का? हम उसी भारत के निवासी हैं जहां पर पर्वतों और नदियों को भी सम्मान से बुलाया जाता है, धरती को धरती माता और गाय को गऊ माता कहकर सम्मान किया जाता था।

हमें बच्चों को पुन: संस्कार की शिक्षा देकर,आदर सत्कार क्या है, ये भी बताना चाहिए,ताकि हमारे भावी नागरिकों को सुसंस्कृत, सदाचारी और चरित्रवान बनाया जाए। हिंदू धर्म के अनुसार हमें चौरासी लाख योनियों के पश्चात मनुष्य जन्म मिला है। अत: इस चोले को धारण करने के बाद भी यदि पशुओं जैसा व्यवहार करते हैं तो हमें मनुष्य कहलाने का कोई हक नहीं है।

यदि हम किसी भी जीव का निरादर करते हैं तो समझ लीजिए हम ईश्वर का ही निरादर करते हैं। मनुष्य का जीवन ईश्वर कृपा से ही मिला है। ईश्वर की कृपा हम पर निरन्तर बनी रहे इसके लिए हमें निरन्तर प्रयास करते रहना है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की इस भूमि के कण-कण में संस्कार बसते हैं। एक बच्चे के जन्म से पहले ही उसके अंदर संस्कारों का समावेश मां द्वारा शुरू कर दिया जाता है।

गीता, पुराण आदि पढ़कर एक मां अपने बच्चे के जन्म से पूर्व ही अध्यात्म के ये गुण उसमें डालने का प्रयास करने लगती है। अपने से बड़ों और गुरुजनों का सम्मान करना बचपन से ही उसे सिखाया जाता है। भोजन करने से पूर्व हाथ जोड़कर प्रार्थना करना, भोजन को अपने से ऊंचा स्थान प्रदान करना, दान-धर्म करना, समाज सेवा करना, जरूरतमंदों के काम आना, पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना, अपने से पहले दूसरों के हित के लिए सोचना आदि अनेकों गुण परिवार के सदस्य बच्चों को बहुत कम उम्र से ही देने लगते हैं।

शुभ संस्कारों के परिणाम सदैव सुखकर ही होते हैं। इन्हीं से मनुष्य का सच्चा आध्यात्मिक विकास होता है। व्यक्तिगत सुख और सामाजिक सुव्यवस्था का आधार भी यही है। अतएव अपने जीवन में शुभ संस्कारों का संचय और अशुभ-संस्कारों के निष्कासन का अभ्यास करते रहना चाहिए,क्योंकि अच्छे संस्कारों से ही सभ्य समाज का निर्माण सम्भव है। इसलिए इन्हें विलुप्त न होने दें बल्कि अमर बनाए रखने में योगदान दें।


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