Sunday, May 26, 2024
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गोशाला को सरकारी मदद का इंतजार

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  • गोशाला में गोवंशों का हाल बेहाल, पशुओं पर संकट

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सरकार व प्रशासन भले ही गोशालाओं में बेहतर प्रबंधन का खूब दावा करे, लेकिन हकीकत काफी चौंकाने वाली है। जिले की अधिकांश गोशालाओं में गोवंश को भरपेट चारा-पानी तक नहीं मिल पा रहा हैं। कहीं सूखा भूसा दिया जा रहा हैं तो ज्वार के पेड़ खाने को मजबूर हैं। भरपेट चारा न मिलने के कारण गोवंश कमजोर हो रहे हैं। बीमारी से हड्डियां तक निकल रही हैं।

सोमवार को जिले में दैनिक जनवाणी की पड़ताल में इसकी पोल खुल गई। हर गोशाला में अव्यवस्थाओं की भरमार है। कई गोशालाओं में तो रिकार्ड के मुकाबले आधे भी छुट्टा गोवंश नहीं है, जबकि हर दिन लाखों रुपये का बजट ठिकाने लग रहा है। वहीं, सब कुछ पता होने पर भी जिम्मेदार अफसर आंखे मूंदे बैठे हैं। अगर अफसर ढंग से जिले की गोशालाओं की भी पड़ताल कर लें तो सिस्टम की पोल खुल जाएगी।

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बेसहारा गोवंशों का तो हाल बेहाल है ही, लेकिन संरक्षित गोवंशों का भी दम निकल रहा है। एक तो प्रचंड गर्मी। इससे राहत के कोई इंतजाम नहीं और खाने को सिर्फ सूखा भूसा। ऐसे में गोवंश बीमार हो रहे हैं। योगी सरकार की प्राथमिकता में शामिल गोशाला की स्थिति उन्नाव जिले में दयनीय है। चारा पानी के अभाव में गोवंशी दम तोड़ रहे हैं। अस्थाई गोशाला की बाउंड्री न होने के कारण पशु किसानों की फसल बर्बाद कर देते हैं, जिससे किसानों में रोष व्याप्त है।

कंकरखेड़ा क्षेत्र के नंगलाताशी में श्रीराम गोशाला स्थित है। इसके हाल विकट दौर से गुजर रहे हैं। गाजियाबाद में हुई आगजनी की घटना में 49 गाय में मर गई। यह भयानक अग्निकांड हुआ। इस तरह की पुनरावृत्ति मेरठ में भी हो सकती हैं, जहां पर कोई सुविधा गोशाला में नहीं हैं। इसको लेकर गोशाला के संचालक भी मानते है कि यहां पर हालात बेहद विकट हैं। गाय को चारे का भी संकट हैं।

अन्य सुविधा भी सरकार की तरफ से गोशाला के लिए नहीं मिल रही हैं। हाल ही में उस गोशाला को तैयार किया गया है , लेकिन सरकार द्वारा इस पर कोई गौर नहीं किया जा रहा है। गोशाला में पैसे की कमी से गायों को भरपूर चारा भी नहीं मिल पा रहा है। ये गोशाला सुभाष चंद्र पाल की, उसके पास करीब 75 गाय हैं, जिसमें से कुछ हरियाणा नस्ल की और कुछ साहीवाल नस्ल की है।

उनके रखरखाव के लिए सरकार द्वारा कोई सुविधा प्राप्त नहीं हो रही है, जिससे गायों को भरपूर खाना भी नहीं मिल पा रहा है तथा 75 गायों हैं, जिसमें कम गाय दूध देने वाली हैं। अच्छा दूध देने वाली गाय भी इस गोशाला में हैं, लेकिन सुविधा सिफर हैं। बीमार होने पर डॉक्टर भी देखने नहीं आते हैं, जिसके चलते तमाम तरह की दिक्कत गोशाला संचालकों को उठानी पड़ रही हैं। अब गाजियाबाद में जिस तरह की घटना घटी है, उससे भी सबक नहीं लिया जा रहा हैं।

गोशाला में साहीवाल नस्ल

यह गाय 10 से 16 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है। अपने एक दुग्धकाल के दौरान ये गायें औसतन 2270 लीटर दूध देती हैं। साथ ही इसके दूध में पर्याप्त वसा होता है। ये विदेशी गायों की तुलना में दूध कम देती हैं, लेकिन इन पर खर्च भी काफी कम होता है। साहीवाल की खूबियों और उसके दूध की गुणवत्ता के चलते वैज्ञानिक इसे सबसे अच्छी देसी दुग्ध उत्पादक गाय मानते हैं। इनकी कम होती संख्या से चिंतित वैज्ञानिक ब्रीडिंग के जरिये देसी गायों की नस्ल सुधार कर उन्हें साहीवाल में बदलने पर जोर दे रहे हैं, जिसके तहत देसी गाय की पांचवीं पीढ़ी पूर्णत: साहीवाल में बदलने में कामयाबी हासिल हुई है।

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