Tuesday, June 25, 2024
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विसंगतियों की जमीनी पड़ताल

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समकालीन व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर कैलाश मंडलेकर के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘धापू पनाला’ में हास्य-व्यंग्य का गजब संतुलन हैेकहन का जो तरीका और भाषा मंडलेकर जी के पास है कदाचित किसी और व्यंग्यकार के पास नहीं। वे धावक की तरह केवल लक्ष्य पर नजर नहीं रखते बल्कि पर्यटक की भांति राह में पड़ती हर चीज को निहारते चलते हैं। संग्रह की रचनाओं में अंग्रेजी, उर्दू के साथ-साथ ‘श्रीरामचरितमानस’ की चौपाइयां, संस्कृत की सूक्तियां भी यथास्थान नमूदार होती हैं। लोक मान्यताओं, लोकोक्तियों और देशज शब्दों का उल्लेख भी है। इसके पीछे का उद्देश्य पाठकों को जमीन से जोड़ना है। संग्रह की रचनाओं के शीर्षक अपेक्षाकृत बड़े हैं। कुछेक फिल्मी गीतों के मुखड़े से हैं तो कुछ अखबार की हेडलाइन टाइप। देश की दिग्भ्रमित युवा पीढ़ी को लेकर वे खासे चिंतित दिखाई पड़ते हैं तो इसकी जिम्मेदार सियासत और नई जनरेशन को भी ढंग से खींचते हैं। ‘ये फाकाकशी की कोख से जन्मी बेरोजगार जवानी है जो अकर्मण्यता के टल्ले खाती पार्क के अंधेरे कोने में खड़ी है।’(एंटी रोमियो स्क्वाड और आशिक का गिरेबान) ‘इनके(युवा) पास स्वाभिमान और गैरत के नाम पर कुछ नहीं बचा है। बची है तो फकत रैलियां, पुलिया, चंदा उगाहने की रसीदें और कभी खत्म न होने वाला अवसाद और निराशाएं।’(उत्सव के पंडालों में चंदा उगाही की रोशनी) देश में राष्ट्रवाद को नए सिरे से परिभाषित करने और नाम के बहाने इतिहास बदल डालने के कवायददारों को जमकर फटकार लगाते हैं। ‘ताज पर सियासत’ में व्यंग्यकार ने साफ-साफ शब्दों में लिखा है कि ‘यह स्मारकों और सांस्कृतिक प्रतीकों की बेदखली का दौर है।’ गीतात्मक शीर्षक वाली रचना ‘बोरियत के इन क्षणों में एक क्षण मेरा मिला लो’ में वे मुख्य अतिथि होने के मायने समझाते हुए व्यवस्था की सड़ांध को भी बाहर लाते हैं। धापू पनाला में कुल जमा बयालीस रचनाएं अपनी कहानी खुद बयां करेंगी। आप हंसते-हंसते पढ़ जाएंगे।

पुस्तक : धापू पनाला, लेखक : कैलाश मण्डलेकर, प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर(मप्र), मूल्य: 200 रुपये

मुकेश राठौर


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