
हमारे संस्कृति प्रधान मुल्क में गुरु यानि अध्यापक का महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। माता-पिता के बाद अगर भगवान से भी बड़ा किसी का स्थान होता है तो वो केवल और केवल गुरु का होता है। पुरातन काल से हमारे देश में गुरु की महिमा गाई जाती है। इतिहास उठाकर देखें तो हमारे भारतीय इतिहास में महान गुरुओं की गाथाएं भरी पड़ी हैं। गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताए, अर्थात-यदि भगवान और गुरु ; दोनों एक साथ मिल जाएँ तो मैं पहले गुरु को प्रणाम करूंगा फिर परमात्मा को, क्योंकि परमात्मा दिखाई नहीं देते जबकि गुरु प्रत्यक्ष भगवान हैं। देखा जाए तो भगवान श्री कृष्ण ही दुनिया के गुरु हैं, जिनके श्रीमद्भागवत गीत के ज्ञान से आज भी पूरी दुनिया आलोकित हो रही है। किसी भी प्रश्न का उत्तर श्रीमद्भागवत गीता में ढूढ़ सकते हैं।
गुरु की दृष्टि अपने शिष्य के प्रति पुत्र के समान स्नेहित होती है। इसके उदाहरण भगवान भास्कर, गुरु द्रोणाचार्य रहे हैं। भगवान भास्कर को फल समझकर लील जाने वाले भगवान हनुमान को भगवान भास्कर ने शिष्य के रूप में स्वीकार किया था। वहीं गुरु द्रोणाचार्य के पास असीमित शक्ति होने के बाद भी उन्होंने अपने शिष्यों का वध नहीं किया था। चूंकि अपने शिष्यों के प्रति पुत्र से भी अधिक स्नेह लुटाते थे। गुरु द्रोण ने अपने शिष्यों के लिए न जाने कितने आरोप अपने सिर पर ले लिया था, हालांकि गुरु द्रोण को समझने के लिए वेद व्यास रचित महाभारत पढ़े जाने की दरकार है। गुरु द्रोण अपने शिष्य अर्जुन को अपने पुत्र से भी अधिक प्रेम करते थे। हालांकि अर्जुन की प्रमुख पहिचान द्रोण शिष्य के रूप में ही जानी जाती है। महान संत कबीर दास जी ने गुरु की महिमा भी कुछ इस अंदाज में गाई है। गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त॥ अर्थात-गुरु और पारस-पत्थर में अंतर है, यह सब संत जानते हैं। पारस तो लोहे को सोना बनाता है, परंतु गुरु शिष्य को अपने समान महान बना लेता है।
यूं तो शिक्षक दिवस भारत में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के उपलक्ष्य में उनकी याद में मनाया जाता है, जिनका जीवन एक प्रेरणा है। लेकिन उनसे भी सदियों पहले देश में एक ऐसे अध्यापक हुए जिन्होंने जीवन की सारी कठिनाइयों से निकलने के लिए एक ही रास्ता बताया जीवन जीने का सबसे सुगम मार्ग मध्यमार्ग है। गौतम बुद्ध का जन्म 480 ईसा पूर्व में सिद्धार्थ के रूप में हुआ था। वे प्राचीन भारत में रहने वाले एक दार्शनिक, भिक्षुक, ध्यानी, आध्यात्मिक अध्यापक थे वे बौद्ध धर्म के संस्थापक भी थे, और उन्हें कर्म से परे और जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से बचने वाले व्यक्ति के रूप में भी जाना जाता है। बुद्ध कहते थे-मन ही सब कुछ है, आप जो सोचते हैं, वही बन जाते हैं। गौतम बुद्ध के एक-एक विचार पर पूरी दुनिया विमर्श कर रही है। ऐसे अध्यापक का होना भारत के लिए गौरव की बात है।
ऐसे ही एक गुरु और हुए हैं जिन्होंने जंगल में खेल रहे बालक को विजेता राजा बना दिया। आचार्य चाणक्य पहले भारतीय विद्वान थे, जो प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचे जो कौटिल्य या विष्णुगुप्त के नाम से जाने गए। उन्होंने तक्षशिला विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। आज भी आचार्य चाणक्य के वाक्य पथ प्रदर्शन का काम करते हैं। गुरु रवींद्रनाथ टैगोर एक बंगाली कवि, लेखक, संगीतकार, दार्शनिक और चित्रकार थे। जिन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की जो भारत और दुनिया के बीच ‘जोड़ने वाले धागे’ के रूप में काम करता था, जिसने ‘गुरुकुल’ की अवधारणा को फिर से परिभाषित किया था। गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के विचार आज भी अज्ञानियों को ज्ञान की ओर ले जाने का काम करते हैं।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापकों के कारण ही देश में शिक्षकों के प्रति अब तक आदर का भाव बना हुआ है। महान वैज्ञानिक होते हुए देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक पहुंचे लेकिन डॉ। कलाम साहब का ख्वाब था कि दुनिया उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद करे। और आज उन्हें दुनिया सबसे पहले एक शिक्षक के रूप में याद करती है। सावित्रीबाई फुले एक भारतीय समाज सुधारक, शिक्षाविद और कवियत्री थीं। वह भारत की पहली महिला शिक्षिका रहीं हैं जिन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर भारत में महिलाओं के अधिकारों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें भारतीय नारीवाद की जननी भी माना जाता है।। सावित्री बाई फुले जैसी महान अध्यापिका भारत के इतिहास का प्रमुख हासिल हैं। सावित्रीबाई फुले जैसी अध्यापिकाएं समाज के लिए और भी आवश्यक हैं।
आज छात्रों में अध्यापकों के प्रति वह आदर, वह श्रद्धा और विश्वास नजर नहीं आता। क्या इसका सारा दोष केवल आधुनिक छात्रों की बदलती सोच को दिया जाना चाहिए? क्या, इस सोच की उपज भी उतनी ही दोषी नहीं है। अध्यापकों की गरिमा के धुंधलापन के कारण नहीं है? अगर पूरी तरह उन्हें दोषी न भी माना जाए तो क्या, हमारा सिस्टम, हमारी शिक्षा -प्रणाली निर्दोष मानी जा सकती है? आज स्कूल और कॉलेज पैसा कमाने वाले संस्थानों के रूप में दिखाई देते हैं। हमारा देश महान गुरुओं की परम्परा पर चलने वाला एक देश है। जहां गुरुओं के लिए शिष्यों ने और शिष्यों के लिए गुरुओं ने अपना सब कुछ कुर्बान कर देने की परंपरा वाले देश में अब शिक्षा एक व्यापार बन गई है। आज भी अधिकांश अध्यापक अपने शिष्यों के लिए समर्पित हैं, वहीं आज भी अधिकांश शिष्य अपने गुरुओं के लिए समर्पित हैं, लेकिन कुछ गुरु घंटालों ने गुरु परंपरा को धूमिल जरूर किया है, वहीं कुछ शिष्य भी धूर्तता की पराकाष्ठा कर जाते हैं।


