Friday, January 28, 2022
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जटिल है असामनता का विमर्श

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विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 के आंकड़ों के बाद भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता फिर चर्चा में है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1 प्रतिशत सर्वाधिक अमीर लोगों के पास 2021 में कुल राष्ट्रीय आय का 22% हिस्सा था, जबकि शीर्ष 10% लोग राष्ट्रीय आय के 57 प्रतिशत भाग पर काबिज थे। हमारे देश की आधी आबादी सिर्फ 13.1 फीसदी कमाती है। रिपोर्ट के आने के बाद होने वाली चर्चाएं प्राय: शीर्ष के एक प्रतिशत संपन्न लोगों पर केंद्रित हो जाती हैं। किंतु अभाव एवं गरीबी में जीवन गुजार रही आधी आबादी की दशा पर विमर्श कहीं अधिक आवश्यक है। आर्थिक समानता हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की समानता की अवधारणा को साकार करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। हाशिए पर धकेले गए समुदायों को समान अवसर और अधिक प्रतिनिधित्व मिले यह सुनिश्चित करने में आर्थिक समानता की बड़ी भूमिका है। आर्थिक असमानता अर्थव्यवस्था को अस्थिर बना सकती है। इसके कारण स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अनुसंधान जैसे आवश्यक क्षेत्रों में निवेश में कमी आ सकती है। हाल में किए गए अध्ययनों ने यह दर्शाया है कि कोरोना काल में घटती हुई मजदूरी और आय ने कुल मांग पर विपरीत प्रभाव डाला है, क्योंकि आम लोगों के उपभोग में कमी आई है।

जहां तक भारत का संबंध है यहां आर्थिक गैरबराबरी के लिए केवल वितरण की असमानता को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। जाति प्रथा और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक कुरीतियां तथा श्रम बाजार में जातिगत भेदभाव वे कारक हैं, जो दलितों को भूमि और संपत्ति तथा उनके श्रम के उचित मूल्य से वंचित रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। लैंगिक असमानता की स्थिति भी कम भयानक नहीं है। श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी के मामले में वैश्विक दृष्टि से भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार कार्यक्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में भारी गिरावट देखने में आई है। वर्ष 2011-19 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी 35.8% से घटकर 26.4% ही रह गई। महिलाओं पर ऐसे घरेलू काम का बोझ बहुत ज्यादा है जिसके लिए किसी भुगतान का प्रावधान नहीं है। महिलाओं को मिलने वाली मजदूरी पुरुषों की तुलना में बहुत कम होती है। श्रम बाजार में लैंगिक भेदभाव इतना अधिक है कि बहुत से कार्य एवं व्यवसाय पुरुषों के लिए आरक्षित हैं। तमाम कानूनी प्रावधानों तथा सामाजिक जागरूकता अभियानों के बावजूद संपत्ति और भूमि के अधिकार से महिलाओं को वंचित रखा जाता है। महिलाएं शहरों और ग्रामों को मिलाकर हमारी कुल पेड वर्क फोर्स का 18 से 19 प्रतिशत हैं। कोई महिला अपने पुरुष समकक्ष को होने वाली आय का केवल 62.5 प्रतिशत ही कमा पाती है।

भारतीय समाज में अंतर्निहित विसंगतियों के कारण आर्थिक असमानता का विमर्श पहले ही अनेक जटिलताओं से युक्त था। इसी दौरान नव उदारवाद और वैश्वीकरण के उभार ने ऐसी आर्थिक नीतियों को जन्म दिया जिनमें असमानता विकास प्रक्रिया का एक अपरिहार्य बाय प्रोडक्ट थी। विश्व असमानता रिपोर्ट के पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े यह दर्शात हैं कि शीर्ष पर स्थित 1 प्रतिशत जनसंख्या की संपत्ति में असाधारण वृद्धि हो रही है। नवउदारवादी नीतियों के कारण शहरों में आर्थिक असमानता बढ़ी है। गांवों और शहरों के मध्य आर्थिक असमानता की खाई गहरी हुई है जिसके परिणाम स्वरूप अलग अलग क्षेत्रों में विकास की मात्रा एवं स्वरूप में गहरा अंतर पैदा हुआ है।

वर्ष 2006 में यूपीए सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति हेतु सकारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए एक समिति का गठन किया था। इसका उद्देश्य निजी क्षेत्र में इन वर्गों को नौकरियों में प्रतिनिधित्व दिलाना था। लगभग एक दशक तक इस दिशा में कुछ खास नहीं हुआ। इन वर्गों में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विषय में सितंबर 2018 में एक बैठक ली। इसमें विभिन्न औद्योगिक एसोसिएशनों द्वारा दिए गए आंकड़े निराशाजनक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं। इन एसोसिएशनों से सम्बद्ध 17788 कंपनियों में से केवल 19 प्रतिशत ने ही सकारात्मक कार्रवाई की स्वैच्छिक संहिता को स्वीकार किया है।

अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि उदारीकरण और वैश्वीकरण के लाभ तभी हमारे श्रमिकों को मिल सकते हैं, जब उनकी कुशलता में सुधार आए। किंतु अकुशल एवं अर्द्ध कुशल श्रमिकों को कुशल बनाने की आशा कम से कम निजी क्षेत्र से तो नहीं की जा सकती। निजी क्षेत्र का उद्देश्य मुनाफा कमाना है न कि हमारे विशाल अप्रशिक्षित श्रमिक वर्ग को स्किल डेवलपमेंट की प्रक्रिया द्वारा योग्य बनाकर उनकी आय बढ़ाना। उसकी पसंद तो पूर्व प्रशिक्षित, कुशल एवं अनुभवी श्रमिक ही होंगे। जाहिर है कि इसकी जिम्मेदारी सरकार को ही उठानी होगी। ऐसा लगा कि मोदी सरकार इस विषय को गंभीरता से लेगी। पहली बार कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की स्थापना वर्ष 2014 में की गई। जुलाई 2015 से प्रारंभ स्किल इंडिया मिशन के अंतर्गत 2022 तक 40 करोड़ लोगों को रोजगार पाने योग्य स्किल ट्रेनिंग देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। 2016 से शुरू हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में कंस्ट्रक्शन, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा हार्डवेयर, फूड प्रोसेसिंग,फर्नीचर एवं फिटिंग, हैंडीक्रॉफ्ट, जेम्स और ज्वेलरी तथा लेदर टेक्नोलॉजी जैसे करीब 40 तकनीकी क्षेत्र सम्मिलित किए गए हैं। इसके तहत 2016 से 2020 की अवधि में एक करोड़ युवाओं को कुशल बनाने का लक्ष्य था। किंतु इस अवधि में 50 लाख युवाओं को ही कुशल बनाया जा सका है। योजना के तहत देश भर में खोले गए 2500 केंद्रों में से अनेक बंद हो गए हैं। इन केंद्रों के संचालकों का आरोप है कि सरकार उन्हें काम न देकर केवल बड़े बड़े औद्योगिक घरानों को ही काम दे रही है।

आॅक्सफेम द्वारा जनवरी 2019 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘पब्लिक गुड आॅर प्राइवेट वेल्थ’ में असमानता खत्म करने हेतु अनेक महत्वपूर्ण सिफारिशें की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार सरकारों को स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य सार्वजनिक सेवाओं की सार्वभौम उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। इनका निजीकरण बंद हो। सामाजिक सुरक्षा और पेंशन तथा शिशु कल्याण सरकारी नीतियों का अंग हों। सरकारों की सभी योजनाएं महिलाओं के लिए समान रूप से लाभकारी हों। हमें असमानता मिटाने के लिए ठोस एवं समयबद्ध नीतियों तथा कार्य योजना का निर्माण करना ही होगा।


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