Saturday, January 29, 2022
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सिंचाई विभाग की लापरवाही, पड़ी किसानों पर भारी

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  • गंगा में आई बाढ़ के पानी से हजारों हेक्टेयर फसल जलमग्न, हुई बर्बाद
  • लगातार शिकायत के बाद भी नहीं हुआ सुधार

जनवाणी संवाददाता |

हस्तिनापुर: खादर क्षेत्र में बाढ़ राहत के नाम पर सिंचाई विभाग द्वारा किया गये खेल ने खादर के हजारों किसानों को बबार्दी की कगार पर ला खड़ा किया। दो साल पूर्व बाढ़ राहत के लिए बनाया जाने वाला तटबंध पूरा होने से पहले ही धराशाई हो गया। धराशाई तटबंध और विभागीय अधिकारियों की लापरवाही ने खादर के दर्जनों से भी अधिक गांव के लोगों की हजारों बीघे गन्ना धान और चारे की फसलों नष्ट हो गये, लेकिन प्रशासन और सिंचाई विभाग की कुंभकर्णी नींद है कि टूटने का नाम ही नहीं ले रही है। सिंचाई विभाग की लापरवाही के चलते सालों से बर्बाद होते आ रहे किसानों को बाढ़ से कब राहत मिलेगी? ये कह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

तीन माह पूर्व पहाड़ी क्षेत्रों और गंगा में बाढ़ आई, लेकिन सिंचाई विभाग की लापरवाही और निर्माण कार्यों में प्रयोग हुई घटिया सामग्री के कारण गंगा किनारे लगभग 22 करोड़ रुपये की लगात से गंगा किनारे दो किमी लंबा तटबंध धराशाई हो गया। जिसके बाद गंगा किनारे बसे दर्जनों गांवों बधुवा़, खेड़ीकलां, दुधली, भीकुंड, मखदूमपुर, बंगाली बस्ती मखदूमपुर, बधुवी, फतेहपुर प्रेम, सिरर्जेपुर, गांवड़ी, हंसापुर, परसापुर के किसानों की धान, गन्ना और चारे के हजारों एकड़ फसल बर्बाद कर दी। तटबंध टूटने के बाद किसान अभी बबार्दी के मंजर से निकले भी नहीं थे कि सोमवार को अचानक गंगा का जलस्तर फिर से बढ़ने लगा और मंगलवार देर शाम तक गंगा ने विकराल रूप धारण कर लिया। विभागीय लापरवाही के चलते सरकार के महज 22 करोड़ रुपये ही पानी में बर्बाद हुए, लेकिन किसानों को यह बबार्दी बहुत महंगी पड़ी और उनकी हजारों हेक्टेयर तैयार धान, गन्ना और खीरे की फसल बर्बाद हो गई।

लगातार शिकायत, लेकिन नहीं हुआ सुधार

खादर के किसानों की माने तो गंगा पर करोड़ों रुपये की लागत से बनाये जा रहे तटबंध में प्रयोग हो रही घटिया निर्माण सामग्री की शिकायत उन्होंने कई बार आलाधिकारियों से की, लेकिन उनके कानों पर जूं तक रेंगी और तटबंध में लगातार घटिया निर्माण सामग्री का प्रयोग होता रहा।

जिसके चलते तटबंध गंगा के पहले उफान में ही टूट गया, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने टूटे तटबंध को सही करना उचित नहीं समझा। जिसका खामियाजा खादर के किसानों को चुकाना पड़ रहा है। किसान नेता जजसिंह का कहना है कि उनके साथ खादर क्षेत्र के सैकड़ों किसान दर्जनों बार तटबंध में घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग किये जाने की शिकायत लेकर अधिकारियों से मिले, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

नाले सफाई और बाढ़ चबूतरों के नाम हुई पैसे की बबार्दी

खादर में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ में सिंचाई विभाग के अधिकारियों को पौ बारह रहती है। विभागीय अधिकारी सरकार की आंखों में धूल झोंकते आ रहे हैं। 2010 में सिंचाई विभाग द्वारा लगभग छह करोड़ रुपये खर्च कर दर्जन भर से भी अधिक गांवों में बाढ़ चबूतरों का निर्माण कराया। वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ चबूतरों में भी घटिया निर्माण सामग्री का प्रयोग हुआ। बाढ़ चबूतरों के निर्माण की जांच भी की गई, लेकिन न तो कोई कार्रवाई हुई और न ही बाढ़ चबूतरों पर आजतक किसी ग्रामीण ने बाढ़ के समय शरण देने के काम आये। ऐसे में यह पैसे की बबार्दी महज ही है। विभागीय अधिकारी प्रतिवर्ष बाढ़ क्षेत्र से गुजरने वाले नालों की सफाई पर भी लाखों रुपये खर्च करते आ रहे हैं।

मुआवजे के नाम पर मिले सिर्फ आश्वासन

बाढ़ में प्रतिवर्ष बर्बाद होने वाले किसानों का कहना है कि बाढ़ के बाद प्रशासन भी उनके साथ हर साल फसलों के मुआवजे के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिला है। सरकार द्वारा मिलने वाला मुआवजा फसलों की लागत से भी काफी कम होता है। जिससे किसानों को भारी परेशानी होती है। गंगा किनारे बसे दुधली गांव के रहने वाले अजीत, कृपाल, प्रीतमपाल, दलीप आदि किसानों का कहना है कि 2010 और 2013 में गंगा में आई बाढ़ में उनकी फसलें नष्ट हो गई थी, लेकिन प्रशासन ने बाढ़ के बाद किसानों के ऊंट के मुंह में जीरे वाली कहावत कर 2500 रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा देकर इतिश्री कर ली थी। जबकि किसानों की फसल का मुआवजा न काफी ही है।

घट सकता है जलस्तर, लेकिन मुश्किलें जस की तस

हस्तिनापुर: पहाड़ी क्षेत्रों में दो दिन तक हुई भारी बरसात का असर गंगा की तलहटी में बसे गांवों में नजर आ रहा है। गंगा के रौद्र रूप धारण करने के चलते सम्पर्क मार्गों से लेकर दर्जनों गांव भी जलमग्न है। जहां लोगों को बाढ़ के चलते भारी दिक्कतें झेलनी पड़ रही है। वहीं, कई हेक्टेयर फसलें भी बर्बाद हो चुकी है। बैराज बिजनौर से लगातार बढ़ रहे डिस्चार्ज के कारण ग्रामीणों को राहत मिलती नजर नहीं आ रही है।

बुधवार देर शाम बिजनौर बैराज से डिस्चार्ज बढ़कर दो लाख 25 हजार क्यूसेक हो गया। जिसके कारण खादर क्षेत्र की स्थिति और भी अधिक नाजुक हो गई है। हालांकि हरिद्वार से डिस्चार्ज घटकर एक लाख 30 हजार क्यूसेक रहा गया। जिससे आज गंगा के जलस्तर में कमी होने की संभावना है। वृद्धि के चलते गंगा किनारे बसे गांव फतेहपुर प्रेम, भीकुंड, खेड़ीकलां, मनोहरपुर, पटेल नगर, हादीपुर गांवड़ी, मखदूमपुर, बंगाली बस्ती मखदूमपुर आदि के मुख्य मार्गों पर पानी होने के कारण आवागमन लगभग ठप हो गया है। जलस्तर में वृद्धि से भयभीत ग्रामीणों ने पलायन कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचना शुरू कर दिया है।

रात में और भी बढ़ सकता है गंगा का जलस्तर

दो दिन तक गंगा के जलस्तर में लगातार हुई वृद्धि से खादर क्षेत्र जलमग्न है। धान की अधिकांश तैयार फसलें नष्ट हो चुकी है। बेमौसम आई बाढ़ के बाद गेहूं की बुवाई पर भी संकट मंडराता नजर आ रहा है। धान की तैयार फसल नष्ट होने के कारण किसानों के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया है। तारापुर निवास जजसिंह का कहना है कि अधिकांश धान की फसले कटाई के लिए तैयार थी। खेतों में धान कटाई का कार्य चल रहा था।

 

बाढ़ नियंत्रण के फार्मूले सिर्फ कागजी

जिला पंचायत सदस्य कुसुम सिद्धार्थ ने कहा कि भाजपा के बाढ़ नियंत्रण राज्य मंत्री दिनेश खटीक है और उनके ही विधानसभा क्षेत्र हस्तिनापुर के लोग बाढ़ से जूझ रहे हैं। हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र के भीकुंड से होते हुए बिजनौर को जोड़ने वाले पुल की सहायक सड़क में पानी की निकासी के लिए 25 पुलिया व सीमेटिड पाइप लगाने की परियोजना बनायी गयी थी, किंतु अधिकारियों और भ्रष्टाचारियों की मिलीभगत का प्रमाण है कि मौके पर मात्र तीन सीमेंट पाइप लगे हैं, जोकि बाढ़ के साथ बहकर आए मलबे की वजह से ब्लॉक हो गए हैं।

जिसकी वजह से बाढ़ का पानी की निकासी नहीं हो पा रही है। इसी वजह से आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है। दो माह पहले भी इसी लापरवाही की वजह से भीकुंड रोड को तोड़कर पानी की निकासी की गयी थी, लेकिन अधिकारियों आंख मूंदे हुए हैं। उधर, हस्तिनापुर विधानसभा के खादर क्षेत्र के किसान मजदूर बाढ़ की वजह से अपना घर छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं। उधर, क्षेत्रीय विधायक व बाढ़ मंत्री गृह प्रवेश के कार्यक्रम में मशगूल हैं।

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