Friday, March 20, 2026
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कांवड़ यात्रा बनी बाजार का हिस्सा

Samvad 49

40कोरोना काल के बाद श्रावण मास की कांवड़ यात्राओं का तीव्र क्रम जारी है। 12 अगस्त को चैथा सोमवार बीत चुका है। अंतिम सोमवार 19 अगस्त को है। उसी दिन रक्षाबंधन भी है। लिहाजा उस दिन कांवड़ यात्रा समापन पर रहेगी। दरअसल सावन का यह पूरा महीना भगवान शिव की भक्ति और आराधना एवं समर्पण से जुडे सनातन धार्मिक इतिहास का एक हिस्सा है।

इस मास में शिवलिंग पर गंगाजल से जलाभिषेक करना शिव भक्ति की प्रमुख गोचर गतिविधि मानी जाती है। इस क्रिया को अमली जामा पहनाने के लिए भक्तगण देश की विभिन्न पवित्र नदियों से जल इकठ्ठा करके प्रसिद्ध शिवलिंगों पर जलाभिषेक करते हुए गृह स्थल पर जाकर अपनी कांवड़ यात्रा सम्पन्न करते हैं। जो भक्त इस कांवड़ यात्रा में शामिल नहीं हो पाते, वे कांवड़ यात्रा के बीच कांवड़ियों के ठहरने व उनके लिए खान-पान की व्यवस्था करके इस पुण्य में शामिल होते हैं।

कांवड़ यात्रा का इतिहास बताता है कि जो शिव भक्त कांवड़िया अर्थात भोला बनकर अपनी यात्रा तय करते हैं, वे जप, तप व व्रत इन तीनों त्यागमयी वृत्तियों को एक साथ पूर्ण करते हैं। अत: साफ है कि शिव भक्त अपनी इस यात्रा के दौरान मन्त्रों के उच्चारण के माध्यम से शारीरिक कष्टों को सहन करते हुए जलाभिषेक तक अन्न ग्रहण न करने का व्रत पूर्ण करते हैं। अत: कांवड़ यात्रा में हिस्सा लेने वाले शिव भक्तजनों से अपने अन्त:करण को शुद्ध रखने के साथ-साथ उनसे शांत व सहनशील बनने की अपेक्षा भी की जाती है। इसके दर्शन के वाबजूद भी पवित्र लक्ष्य को लेकर धार्मिक यात्रा पर निकले शिव भक्तों के बीच आक्रोश व उग्रता के अंश देखने को मिल ही जाते हैं।

सच्चाई यह है कि कोरोना काल के बाद देशमें इस वर्ष कांवड़ियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस बार इन कांवड़ियों की संख्या चार करोड़ के आस-पास पहुंचने का अनुमान है। कांवड़ यात्रा के धार्मिक बाजार से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि कोरोना काल से पूर्व के सालों में अकेले हरिद्वार आने वाले कांवड़ियों की संख्या तीन करोड़ को पार कर गयी थी। इस बार इनकी संख्या चार करोड़ से भी अधिक हो जाने का अनुमान है।

अवलोकन यह भी बताते हैं कि हरिद्वार के साथ में ब्रज घाट पर इस कांवड़ मेंले से प्रति वर्ष 500 करोड़ रुपयों से अधिक का कारोबार होता है। इस कांवड यात्रा में एक और खास बात यह भी देखने में आ रही है कि इसमें बालकों के साथ ही युवाओं व युवतियों का रुझान अधिक बढ़ा है। इस कांवड यात्रा में जातियों का समीकरण देखने से पता चलता है कि इसमें उच्च जातियों का प्रतिशत काफी कम है।

सामाजिक-आर्थिक आंकडे बताते हैं कि वर्तमान में मध्यम एवं निम्न वर्गों के बीच कांवड़ यात्रा का आकर्षण अधिक दिखाई पड़ रहा है। इनके अतिरिक्त इस कांवड यात्रा के प्रति उन युवाओं का आकर्षण अधिक दिखाई पड़ रहा है, जिनमें शिक्षा का कम प्रभाव, धार्मिक आस्था के प्रति सघन लगाव, सामुदायिक भावना का गहन आन्तरीकरण, वर्गीय चेतना एवं श्रमसाध्य जीवन जैसे गुणों की बाहुल्यताअधिक है।

आज जिस तरह मीडिया ने धर्म व धार्मिक आस्था को उपभोक्तावाद से जोड़ा है, उससे भी कांवड़ यात्रा बाजार का हिस्सा बन गई है। कांवड़ यात्रा के प्रति आकर्षित होने वाले इन युवाओं में शिवभक्त बनने की धार्मिक प्रवृत्ति तो है, परंतु पिछले दिनों इनकी जीवन शैली में जिस प्रकार भीड़-उन्मुख आक्रामक शैली का प्रस्फुटन हुआ है, उससे इन कांवड यात्राओं का चरित्र थोड़ा बदलता प्रतीत हो रहा है। आज के इन मध्यम वर्गीय युवाओं के लिए धर्म एवं धार्मिक विश्वास, उनकी सांसारिक एवं भौतिक लक्ष्यों की पूर्ति का साधन अधिक बन रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ये कांवड़ यात्राएं मौज मस्ती के साथ-साथ एडवेंचर बनकर भी उभर रही हैं।

डाक कांवड़ियों की संख्या और उनकी धार्मिक आस्था में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे निश्चित ही हिंदुत्व से जुड़ी विचारधारा का प्रभाव और तीव्र हुआ है। उत्तर प्रदेशऔर उत्तराखंड की सरकारों के द्वारा कांवड़ियों पर फूल बरसाने से कांवड़ियों का उत्साह दोगुना हुआ है। परंतु यहां ज्वलन्त प्रश्न ये है कि इन भक्तों की धार्मिक आस्थाओं से शिव भक्ति का दर्शन कमजोर क्यों हो रहा है? जिस कांवड़ यात्रा का प्रमुख ध्येय शरीर को कष्ट देते हुए पवित्र धार्मिक लक्ष्य की प्राप्ति रहा है, उस दर्शन को नकारते हुए आज कांंवड़ियों का स्वभाव असहनीय क्यों हो रहा है?

सरकारों के अनेक प्रयासों के बावजूद हमारी पवित्र गंगा मां प्रदूषण का दंश क्यों झेल रही है? कड़वा सच यह है कि बाजार की नई भौतिक संस्कृति की चमक-धमक ने धार्मिक मूल्यों का क्षरण करते हुए भक्तजनों के यात्रा व्यवहार में भी तेजी से परिवर्तन किया है। यही कारण है कि धीरे-धीरे कांवड़ यात्राएं भीड़ का हिस्सा बनती जा रही हैं। इस सच्चाई को प्रस्तुत करने में कोई हिचक नहीं है कि कांवड यात्रा के भीड के मनोविज्ञान के सामने शिव भक्ति का दर्शन तुलनात्मक रुप से कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। धार्मिक आस्थाओं को बाजार ने इन कांवड़ यात्राओं को भी बाजारू बनाने में कोई कसर उठा कर नहीं रखी।

कांवड़ यात्रा में दिन रात की थकान दूर करने के लिए कभी कभी नशीले पदार्थों के प्रयोग की खबरें भी यदा-कदा सुनने को मिलती ही रहतीं हंै। फिल्मी गीतों की तर्ज पर भौंडे कैसेट, गीत व नृत्य इत्यादि के माध्यम से राज मार्गों पर मौज मस्ती करना किसी से छिपा नहीं है। इन राजमार्गों के किनारे वाले स्कूल व कालेज महीनों तक बंद कर दिए जाते हैं। मरीज अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते। ऊपर से कांवड़िए के किसी वाहन से छू जाने भर से सड़क पर ही उपद्रव शुरू हो जाता है। ऐसा अनुभव होता है कि शिवभक्त कांवड़ियों के धीरे-धीरे पर्यटकों में बदल जाने से उनकी कांवड़ यात्रा एक थ्रिल का साधन अधिक बन रही है।

अन्तत: नगरीय विकास का एक पहलू यह भी रहा है कि सुविधाओं के साथ साथ चौड़े राजमार्ग बन जाने से दुर्घटनाएं भी बढ़ी हैं। यातायात में वाहनों की असीमित बढ़ोत्तरी तथा लोगों को अपना लक्ष्य पाने के तीव्र बोध ने दुर्घटनाओं को भी गति दी है।

श्रावण मास कांवड़ियों के लिए श्रमसाध्य मास है। जहां इन राजमार्गों पर सभ्य व अनुशासित तरीके से चलने का दायित्व कांवड़ियों का है, वहीं इन कांवड़ियों की यात्रा को सुगम बनाने की जिम्मेदारी भी स्थानीय प्रशासन की है। इन पवित्र मास में शिव भक्तों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी पवित्र-त्यागमयी संस्कृति एवं धार्मिक आस्थाओं के संरक्षण के लिए विपरीत परिस्थितियों के आने पर भी संयमित होने का परिचय देंगे। श्रृद्धालुओं के धार्मिक यात्रा के दौरान संयम खोने से जहां धार्मिक आस्थाएं घायल होती हैं, वहीं आम जीवन के अस्त-व्यस्त होने से सामाजिक जनमत के विरोध में खड़ा होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

भारतीय संदर्भ में दुर्खीम के अनुसार धर्म एवं धार्मिक आस्थाएं केवल अफीम का ही कार्य नहीं करती हैं। ये हमारी धार्मिक कर्तव्यों की संपूर्ति की ओर संकेत भी करती हैं। निश्चय ही कांवड यात्रा भोला बनकर भगवान शिव के प्रति हमारी सनातन धार्मिक आस्था और त्यागमयी संस्कृति का एक प्रतीक है।

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