- राज्यपाल के विशेष सचिव ने जिला प्रशासन से मांगी पूरी रिपोर्ट
- लंबा होता इंतजार: अदालतों में भी तारीख पर तारीख, छह साल से कोई सुनवाई नहीं
- आरटीआई में पूछे गए सवालों का भी नहीं दिया जा रहा कोई जवाब
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कुंती और सूर्य के पुत्र कर्ण को जहां जीते जी सम्मान और अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा, वहीं हस्तिनापुर में बना उनका मन्दिर भी आज अपने वजूद के लिए लड़ रहा है। किसी जमाने में साढ़े सत्रह बीघे जमीन के मालिक कर्ण मन्दिर के पास आज सिर्फ दो बिस्सा जमीन ही बची है। बाकी की सभी जमीन चकबंदी में चली गई। कर्ण मन्दिर के लिए लड़ाई लड़ रहे लोगों ने शासन प्रशासन से लाख गुहार लगाई अदालतों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा।
कर्ण मन्दिर आज भी अपनी ‘हड़पी’ गई जमीन के लिए संघर्ष कर रहा है। हालांकि इस मामले में राजभवन अब सख्त हो गया है। राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल के विशेष सचिव ब्रदीनाथ सिंह ने जिला प्रशासन से इस पूरे मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है। सात जनवरी को इस संबध में राजभवन का पत्र जिलाधिकारी कार्यालय को रिसीव हो गया है। जहां से तीन दिन बाद ही इसे एसडीएम कार्यालय को भेज दिया गया। हस्तिनापुर के ‘महाभारतकालीन अस्तित्व’ को बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे प्रो. प्रियंक भारती कहते हैं कि यह पूरा मामला अदालत में है,
लेकिन सबसे बड़ी बदनसीबी यह है कि पिछले छह सालों से तारीख पर तारीख लग रही है। कोई सुनवाई नहीं हो रही। स्वामी शंकर देव इस मामले में लगातार एक्टिव बने हुए हैं। वो मन्दिर के पक्ष में सारी दलीलें पेश कर रहे हैं। दरअसल, पूरा मामला क्या है यह हम आपको बताते हैं। हस्तिनापुर के कौरवान पांडवान में इस मन्दिर के लिए बाकायदा उत्तर प्रदेश सरकार ने जमीन तक खुद आवंटित की थी। यहां 1982-83 में चकबंदी हुई। उस समय कर्ण घाट मन्दिर बूढ़ी गंगा के धार पर था।
इसी चकबंदी के दौरान मन्दिर की जमीन को एक प्रकार से ‘हड़प’ लिया गया। प्रो. प्रियंक भारती के अनुसार इस मामले में एक ओर जहां तहसील प्रशासन तक ने चकबंदी के दौरान हुई गलतियां स्वीकार की हैं। वहीं, दूसरी ओर इसे लेकर आरटीआई में पूछे गए सवालों तक के जवाब नहीं दिए जा रहे हैं। कुल मिलाकर इस पूरे मामले में अब राजभवन के एक्टिव होने से इस बात की कुछ उम्मीद जगी है कि हस्तिनापुर के ऐतिहासिक महत्व के साक्षी इस कर्ण घाट मन्दिर को न्याया मिल जाए।

