Sunday, January 23, 2022
- Advertisement -
- Advertisement -
HomeINDIA NEWSकृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना के 2 वर्ष पूर्ण, आयोजित की गयी रबी गोष्ठी 

कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना के 2 वर्ष पूर्ण, आयोजित की गयी रबी गोष्ठी 

- Advertisement -
  • किसानो को रबी गोष्ठी में उचित फसल प्रबंधन कर अधिक उत्पादन के सुझाये तरीके

जनवाणी ब्यूरो |

लखनऊ: किसानो के लिए रबी गोष्ठी का आयोजन केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, लखनऊ के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, हरदोई-द्वितीय के दो साल पूरा होने पर किया गया। गोष्ठी का मुख्य उद्देश क्षेत्र के किसानो को रबी की फसलों में उचित प्रबंधन कर अधिक उत्पादन पर जानकारी देना था। इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं प्रधान मृदा वैज्ञानिक डॉ संजय अरोड़ा ने किसानों को आह्वान किया कि कृषि विज्ञान केंद्र के साथ जुड़कर खेती की नई तकनीकी का लाभ उठाएं।

खेती को टिकाऊ बनाने के लिए फसल अवशेष प्रबंधन आवश्यक है जिस के लिए धान के पुआल को खेतों में सडाए तथा पराली को ना जलाएं। ऊसर मृदा के जैविक सुधार हेतु खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करें, हरी खाद के रूप में ढेंचा लगाए और केंचुए की खाद का उत्पादन करें जिससे खेती अधिक लाभकारी बने। महिला एवं युवा ग्राम वासी कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से किसान उत्पादन संगठन एवं स्वयं सहायता समूह बना कर सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओ का लाभ प्राप्त करने के साथ छोटा व्यवसाय कर सकते है।

गोष्ठी में क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, लखनऊ के अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक  डॉ टी दामोदरन ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा की कृषि विज्ञान केंद्र मिट्टी के स्वास्थ्य, जल के स्वास्थ्य तथा किसानों महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य को उत्तम बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है। हमारा प्रयास है कि हर किसान परिवार की पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके जिस के लिए घर पर नींबू, केला, पपीता, अमरूद, सहजन आदि का एक पेड़ अवश्य हो साथ ही सब्जियों की एक  क्यारी हो।

साथ ही कृषि विज्ञान केंद्र का प्रयास है कि जिले की मिट्टी की लवणता की समस्या को पूर्णता समाप्त किया जा सके जिसके लिए केंद्र द्वारा कई प्रकार के बायो फॉर्मूलेशंस तैयार किए गए हैं जिस में उपस्थित सूक्ष्मजीव जैविक तरीके से मृदा के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए कार्य करते हैं तथा यूरिया, जिंक डीएपी आदि रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं और खेती की लागत को घटाते हैं साथ ही उत्पादन को बढ़ाते हुए खेती को टिकाऊ एवं लाभकारी बनाते हैं। डॉ अतुल कुमार सिंह, प्रधान वैज्ञानिक ने बताया की फसलों में सिंचाई आवश्यक है परंतु अधिक पानी भी फसलों को नुकसान करता है।

आवश्यकता अनुसार ही खेत में पानी देना चाहिए इसके लिए 3 वर्ष में एक बार खेत के  समतलीकरण की आवश्यकता है अतः खेत को समतल कराना आवश्यक है जिससे कि बराबर से पानी खेत में लगाया जा सके तथा पानी की बर्बादी को रोका जा सके एवं बेहतर उत्पादन लिया जा सके।

डॉ सुनील कुमार झा ने बताया कि सिंचाई में जल की गुणवत्ता देखना आवश्यक है क्योंकि जल में कई पोषक तत्व उपस्थित होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य तथा फसलों की बेहतर उपज के लिए आवश्यक है और किनही क्षेत्रो में भूजल में विषैले तत्व भी होते है जो मिट्टी के साथ फसल में पहुँच कर उसको उनुपयोगी बना देते है और इनसे उपजे खाध्यान बीमारी करते है। किसानों को सिंचाई जल का परीक्षण कराकर जल की गुणवत्ता के अनुसार ही उपयोग करना चाहिए।

डॉ  अर्जुन सिंह ने क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित बायोफॉर्मूलेशन के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए बताया की केंद्र द्वारा केले की फसल में उकठा रोग के नियंत्रण के लिए, बीजों के उपचार के लिए, फसल अवशेष को सडाने के लिए, फसलों को जिंक प्रदान करने के लिए, फसलों में फास्फोरस की मात्रा बढ़ाने के लिए कई प्रकार के बायोफॉर्मूलेशन तैयार किए गए हैं जिनके उपयोग से जैविक खेती के साथ मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी सुधारी जा सकती है।

डॉ रवी किरण ने गेहूं, धान, सरसों, मसूर आदि की लवण सहनशील  प्रजातियों की विशेषताएं बताते हुए कहा कि गेहूं की के आर एल 210 तथा केआरएल 283 प्रजाति धान की सीएसआर 46, सरसों की सीएसआर 60 तथा सीएस 58, मसूर की पीडीएल वन तथा पीएसएल 7 प्रजाति लवण सहनशील प्रजाति हैं जोकि उसर क्षेत्र के लिए अनुशंसित हैं अतः ऊसर प्रभावित क्षेत्रों में इन प्रजातियों द्वारा अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

इस गोष्ठी में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना के 2 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर केंद्र की विशेषज्ञ श्रीमती अंजलि साहू ने केंद्र की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए बताया की जनवरी से दिसंबर 2021 के दौरान किसानों के प्रक्षेत्र पर प्रजाति मूल्यांकन, एकीकृत फसल प्रबंधन, महिला एवं बाल स्वास्थ्य, साधन संचार तकनीकी आदि विषयों पर 10 प्रक्षेत्र परीक्षण आयोजित किए गए जिसमें 55 किसान सम्मिलित हुए।

केंद्र द्वारा सरसों, धान, गेहूं, चना, मसूर आदि की लवण सहनशील प्रजातियों पर  लगभग 39 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रदर्शन आयोजित किए गए साथ ही मृदा एवं जल संरक्षण, महिला एवं बाल स्वास्थ्य, मशरूम उत्पादन, मृदा स्वास्थ्य, मिट्टी का नमूना लेने की विधि, जिप्सम के प्रयोग के लाभ, सब्जियों की खेती किसानों की आय दोगुनी करने हेतु कृषि तकनीकी, पराली प्रबंधन, आदि विषयों पर लगभग 42 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए।

साथ ही वर्ष में दो स्वच्छता पखवाड़ा आयोजित किये गए और विभिन्न महत्वपूर्ण दिवस जैसे किसान सम्मान दिवस, महिला किसान दिवस, पोषण महा अभियान, वृक्षारोपण अभियान, विश्व मृदा दिवस आदि का आयोजन किया गया तथा विभिन्न माध्यमों के द्वारा किसानों को नई तकनीकों के प्रति जागरूक करने का कार्य किया गया।

डॉ त्रिलोक नाथ राय ने मृदा नमूना लेने की विधि पर विस्तार से चर्चा की श्री सत्येंद्र यादव ने किसानों को फसलों में पाला को नियंत्रण करने का उपाय बताएं कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन श्री मनीष पांडे द्वारा किया गया गोष्ठी में लगभग 70 किसानों ने भाग लिया।

What’s your Reaction?
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
- Advertisement -

Leave a Reply

- Advertisment -spot_img
- Advertisment -
- Advertisment -

Most Popular

- Advertisment -
- Advertisment -spot_img
- Advertisment -

Recent Comments