Saturday, October 23, 2021
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नर्सिंग होम रहे बंद, क्लीनिकों पर लटके ताले

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  • प्राइवेट क्लीनिक और नर्सिंग होम में नहीं लगी ओपीडी
  • आयुर्वेद और युनानी चिकित्सकों ने पिंक पट्टी बांधकर किया कार्य
  • आपरेशन को लेकर आमने-सामने हैं एलोपैथी और आयुर्वेद-यूनानी के चिकित्सक

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: आपरेशन को लेकर एलोपैथी व आयुर्वेदिक यूनानी चिकित्सक आमने सामने हैं। इसको लेकर विरोध के चलते मेरठ के करीब 1500 क्लीनिक और लगभग 500 नर्सिंग होम में शुक्रवार को ओपीडी नहीं लगी। वहीं, दूसरी ओर आयुर्वेद व यूनानी के चिकित्सकों ने सरकार के निर्णय का स्वागत करते हुए पिंक पट्टी बांधकर काम किया। वहीं, दूसरी ओर एलोपैथी के सरकारी डाक्टरों ने भी सरकार के प्रस्ताव को लेकर नाराजगी जाहिर की है। हालांकि सरकारी चिकित्सक हड़ताल पर नहीं हैं, लेकिन इस पर खुलकर राय जाहिर कर रहे हैं।

बड़ा सवाल: कैसे करेंगे बेहोश

आयुर्वेद व यूनानी सरीखे चिकित्सकों को करीब 56 आपरेशन की अनुमति देने वाली सरकार ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि जो मरीज को आपरेशन से पहले बेहोश कैसे किया जाएगा। आयुष पद्धति में तो बेहोशी को लेकर कोई उल्लेख नहीं है। यह कहना है आईएमए के स्टेट प्रेसीडेंट डा. महेश चंद बंसल का। उन्होंने बताया कि 10 साल की पढ़ाई के बाद कहीं जाकर एलोपेथी में एक ऐनेस्थिसिया पैदा किया जाता है।

मरीज लौटे, लटके रहे ताले

क्लीनिक और नर्सिंग होम की ओपीडी न लगने की समुचित जानकारी जिन मरीजों को नहीं थी उन्हें शुक्रवार को बापस लौटना पड़ा। शहर ही नहीं बल्कि देहात में भी एलोपैथी के चिकित्सकों के क्लीनिक व नर्सिंगहोम पर ताले लटके रहे। केवल इमरजैंसी केस ही अटेंड किए गए। ओपीडी न लगने से मरीजों को भी परेशानी हुई।

आयुर्वेद और यूनानी ने किया काम

आयुर्वेद व यूनानी तथा होम्योपैथी सरीखे तमाम चिकित्सकों ने शुक्रवार को अपने दवाखाने व शिफा खाने खोलकर काम किया। आपरेशन की अनुमति से उत्साहित तमाम आयुर्वेद व यूनानी चिकित्सक निर्धारित समय पर अपने दवाखाने व शिफा खानों पर पहुंचे। दिन भर वहां मरीजों को अटेंड किया। हालांकि दिन का ज्यादा वक्त एलोपैथी के चिकित्सकों के विरोध की चर्चा में गुजरा।

सरकारी ओपीडी रही खुली

जो मरीज प्राइवेट क्लीनिक व नर्सिंग होम की ओपीडी के लिए निकले थे वहां ताला देखकर उनमें से कई मरीजों ने मेडिकल और जिला अस्पताल की ओपीडी में पर्चे बनवा कर वहां एलोपैथी के मरीजों को दिखाया और दवाएं लीं। मेडिकल की ओपीडी में पहुंचे बिजनौर से आयी एक महिला मरीज ने बताया कि वो प्राइवेट इलाज करा रही हैं, लेकिन मेडिकल में जिन डाक्टर को उन्होंने दिखाया है, उनके तरीके और प्राइवेट में कोई अंतर नहीं। दवाएं भी लगभग समान ही हैं। सिर्फ इतना ही फर्क है कि पैसे बहुत कम लगे हैं, लेकिन इस महिला मरीज ने पैरवी एलोपैथी चिकित्सा की की है।

आईएमए के अगले आदेश का इंतजार, पीएम को ज्ञापन

आपरेशन को लेकर किए केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ यहां आईएमए हाल में अध्यक्ष डा. अनिल कपूर व सचिव डा. मीनाक्षी त्यागी के संचालन में बड़ी संख्या में पहुंचे चिकित्सकों ने सभा की। सभा के बाद जिला प्रशासन के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर इसको वापस लिए जाने की मांग की गयी।

प्रवक्ता डा. उमंग अरोरा ने बताया कि आईएमए की केंद्रीय कमेटी को जो भी अगला आदेश होगा उसके अनुसार ही आगे की रणनीति पर काम किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर सीनियर चिकित्सक डा. शिशिर जैन ने बताया कि सरकार का निर्णय स्वीकार्य नहीं क्योंकि इससे जनता का अहित है।

डा. संदीप जैन का कहना है कि इससे सबसे बड़ा नुकसान ऐसे मरीजों को होने जा रहा है जो आयुर्वेद व एलोपैथिक के चिकित्सकों के बीच अंतर नहीं कर सकेंगे। डा. अनिल नौसरान का कहना है कि ऐसे चिकित्सको ं के क्लीनिक बूचडखाने कहलाएंगे। मरीजो का डेथ रेट बढ़ जाएगा। सरकार सिर्फ डब्लूएचओ के सर्टिफिकेट के लिए ऐसा कर रही है।

दुनियाभर में होगी किरकिरी
आईएमए के प्रस्तावित अध्यक्ष डा. महेश बंसल का कहना है कि सरकार के इस प्रस्ताव से भारतीय चिकित्सा की दुनिया भर में किरकिरी होगी। आज विदेशों से बड़ी संख्या में इलाज के लिए लोग भारत आते हैं। इस प्रकार के कदम से भारतीय चिकित्सा प्रतिष्ठा की छवि खराब होगी। चिकित्सा के क्षेत्र में जो आदर भारत में दुनिया में हासिल किया है, उस पर बुरा प्रभाव पडेगा।

 

जनता के लिए अहितकारी
आईएमए के अध्यक्ष डा. अनिल कपूर का कहना है कि इस फैसले से एलोपैथी से ज्यादा नुकसान सोसाइटी के उस तबके का होगा जो कम पढ़ा लिखा है। जो एलोपैथी व आयुर्वेद चिकित्सकों की डिग्री में फर्क नहीं कर पाएगा। हमारा विरोध सोसाइटी के उसी हिस्से को होने वाले नुकसान को लेकर है।

 

सभी पैथी में करें काम
मेडिकल के प्राचार्य डा. ज्ञानेन्द्र कुमार का कहना है कि सरकार जो करने जा रही है वह उचित नहीं। बेहतर तो यही होगा कि सरकार आयुर्वेद या फिर यूनानी पैथी को बढ़ावा दे, लेकिन आॅपरेशन की अनुमति देकर नहीं हो सकता। बेहतर है कि सभी अपनी अपनी पैथी में ही काम करें। यह समाज के लिए भी अच्छा रहेगा।

 

तीन हजार साल पुरानी है आयुर्वेद शल्य चिकित्सा
अखिल भारतीय आयुर्वेद महासम्मेलन के राष्ट्रीय महामंत्री वैद्य ब्रज भूषण शर्मा का कहना है कि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की यदि बात की जाए तो ये तीन हजार साल पुरानी है। पूरे विश्व भर में शल्य चिकित्सा में आज वो उपकरण प्रयोग किए जाते हैं जो तब किए जाते थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी आयुर्वेद चिकित्सक नाम से पहले वैद्य लगाएं डाक्टर नहीं। नाड़ी के जानकार वैद्य को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

 

आरोपों को बताया अनर्गल
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में सालों से इलाज कर रहे डा. प्रेम प्रकाश शर्मा ने एलोपैथी चिकित्सकों के आरोपों को एक सिरे से खारिज कर दिया है। उनका तर्क है कि आयुर्वेद के चिकित्सक जो बीएएमएस के बाद एमएस की डिग्री लेते हैं वो भी आठ साल की पढ़ाई करते हैं। उसके बाद होम प्रेक्टिस करते हैं फिर कैसे आपरेशन के काबिल नहीं हैं।

 

पहले से करते हैं आपरेशन
नेशनल इंटीग्रेटिड मेडिकल एसोसिएशन के सचिव डा. मिसबा उर रहमान का कहना है कि विरोध तर्क संगत नहीं। आयुर्वेद के चिकित्सक भी दस साल की डिग्री की पढ़ाई के बाद ही सर्जरी के आपरेशन करते हैं। वैसे भी देश में चिकित्सक व अस्पतालों की कमी है। दूरदराज के इलाकों में तो चिकित्सा सुविधा हैं ही नहीं। इसी कमी को दूर करने का प्रयास है।

 

एलोपैथी चिकित्सकों का विरोध अनुचित

आयुर्वेद के डा. एनके राजवंशी का कहना है कि एलोपैथी के चिकित्सकों का विरोध किया जाना अनुचित है। काबलियत की जहां तक बात है तो आयुर्वेद हो या फिर यूनानी अथवा होम्योपैथी के चिकित्सक, सभी अपनी विधा में माहिर होते हैं। आयुर्वेद के चिकित्सक की करीब 10 साल की मेहनत के बाद ही सर्जन बनते हैं। सरकार की ओरसे आपरेशन किए जाने की अनुमति देना बिलकुल ठीक है।

 

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