Friday, May 1, 2026
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मशरूम की खेती से लाभ कमा सकते हैं किसान

जनवाणी संवाददाता |

मोदीपुरम: आज के समय में खेतों में खर्च के अनुपात में मुनाफा नहीं होने के चलते किसान भी अपनी खेती में बदलाव करने लगे हैं। वहीं, सब्जी आदि की खेती में लगातार इजाफा हो रहा है। किसान भी मानते हैं कि अब कठिन परिश्रम से सब्जी आदि की खेती से ही अपने परिवार को चलाया जा सकता है।

हालांकि, इसके लिए उन्हें खेतों की फसल सुरक्षा के लिए कई तरह की व्यवस्था करनी होती है। अभी के समय में सब्जी खेती की ओर ज्यादा संख्या में युवा ही भाग रहे हैं। इसके बदौलत वे न सिर्फ अपनी बेराजगारी दूर कर रहे हैं, बल्कि पूरे परिवार को भी आर्थिक संकट से उबार रहे हैं। जिसमे अधिकांश किसानों का रुझान मशरूम उत्पादन की ओर बढ़ा है।

पौष्टिकता से भरपूर सब्जी के रूप में मशरूम का तेजी से विकास हो रहा है। बाजार के अनुरूप मांग को देखते हुए मशरूम की खेती पर भी बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है।

किसानों के लिए कम भूमि में तथा कम खर्चे में और कम समय अधिक उत्पादन के साथ मुनाफा देने वाली फसल बनते जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बाजार में मशरूम की मांग तेजी से बढ़ी है, जिसके हिसाब से बाजार में इसकी मांग है, उस हिसाब से अभी इसका उत्पादन नहीं हो रहा है, ऐसे में किसान मशरूम की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। मशरूम पोषण का भरपूर स्त्रोत है और स्वास्थ्य की दृष्टि के लिए काफी लाभदायक होते हैं।

इसमें वसा की मात्रा न के बराबर होती है। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट जैसे कई अम्ल पाए जाते हैं। इसमें जो हृदय व हृदय संबंधित प्रक्रिया के लिए आदर्श भोजन हो सकते हैं। वहीं, मशरूम एक पूर्ण स्वास्थ्यवर्धक है जो सभी लोगों बच्चों से लेकर वृद्ध तक के लिए अनुकूल है इसमे प्रोटीन, रेशा, विटामिन तथा खनिज लवण प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।

मशरूम की ऐसी खेती है अगर इस खेती को किसान वैज्ञानिक विधि से करे तो किसान अच्छा मुनाफा कर सकते हैं। मशरूम में वैज्ञानिक दृष्टि से कई रोगों में फायदेमंद साबित हुई है। औषधीय गुणों से भरपूर व खाने में स्वादिष्ट मशरूम की डिमांड आज लगातार बढ़ती जा रही है।

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यदि किसान इसका उत्पादन करें तो अपनी आय बढ़ा सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक डा. गोपाल ने बताया कि किसान मशरूम की खेती अपने घर पर ही एक छोटे से कमरे में भी कर सकते हैं।

ऐसे करें खेती

मशरूम की खेती के लिए गेहूं के भूसे को बोरे में रात भर के लिए साफ पानी में भिगो दिया जाता है। यदि आवश्यक हो तो सात ग्राम कार्बेन्डाइजिन (50 प्रतिशत) तथा 115 मिली फार्सलीन प्रति 100 लीटर पानी की दर से मिला दिया जाता है। इसके पश्चात भूसे को बाहर निकालकर अतिरिक्त पानी निथारकर अलग कर दिया जाता है और जब भूसे से लगभग 70 प्रतिशत नमी रह जाये तब यह बिजाई के लिए तैयार हो जाता है।

ऐसे करे बिजाई

इसमें ढिंगरी मशरूम की तरह की बिजाई की जाती है परन्तु स्थान की मात्रा ढिंगरी मशरूम से दोगुनी (5-6 प्रतिशत) प्रयोग की जाती है। जुलाई से सितंबर माह तक मशरूम की बिजाई की जाती है। बिजाई करने के बाद थैलों में छिद्र नहीं बनाये जाते हैं। बिजाई के बाद तापक्रम 28-32 डिग्री होना चाहिये। बिजाई के बाद इन थैलों को फसल कक्ष में रख देते हैं।

ऐसे करे आवरण मृदा तैयार

बिजाई के 20-25 दिन बाद फफूंद पूरे भूसे में सामान रूप से फैल जाती है, इसके बाद आवरण मृदा तैयार कर दो से तीन इंच मोटी पर्त थैली के मुंह को खोलकर ऊपर समान रूप से फैला दिया जाता है। पानी के फव्वारे से इस तरह आवरण मृदा के ऊपर सिंचाई की जाती है कि पानी से आवरण मृदा की लगभग आधी मोटाई ही भीगने पाये। आवरण मृदा लगाने के लगभग 20 से 25 दिन बाद आवरण मृदा के ऊपर मशरूम की बिन्दुनुमा अवस्था दिखाई देने लगती है। इस समय फसल का तापमान 32 से 35 तथा आर्द्रता 90 प्रतिशत से अधिक बनाये रखा जाता है। अगले तीन से चार दिन में मशरूम तोड़ाई योग्य हो जाती है।

उपज

सूखे भूसें के भार का 70 से 80 प्रतिशत उत्पादन प्राप्त होता है। धान के पुआल का मशरूम (वालवेरियल्ला प्रजाति) इस मशरूम को चाइनीज मशरूम तथा गर्मी का मशरूम भी कहा जाता है। इसकी खेती सर्वप्रथम 1822 में चीन में शुरू हुई थी यह सबसे कम समय में तैयार होने वाला मशरूम है। भारत वर्ष में इसकी खेती प्राय: समुद्र तटीय राज्यों जैसे-पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश में की जाती है। वर्तमान में इसकी खेती देश के मैदानी भागों में जुलाई से सितम्बर तक की जाती है।

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