- मेला परिसर में सर्कस के मैदान और तालाब में बन गयी हैं फैक्ट्री, साल-दर-साल सिकुड़ता रहा रकबा
- उत्तर भारत के प्रसिद्ध मेले का स्वरूप सबसे ज्यादा अफसरों ने ही बिगाड़ा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: किसी दौर में उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध मेले के रूप में पहचान रखने वाले मेला नौचंदी का जितना नुकसान अफसरों की लापरवाही ने किया, इतना यहां अवैध रूप से कब्जे करने वालों ने नहीं। जो लोग कब्जा करते रहे फर्जी कागजातों पर मेले की जमीन के बैनामे जिन्होंने कर लिए उनका तो लालच समझ में आता है, लेकिन जिन अफसरों की नौचंदी की इस बेशकीमती जमीन की रखवाली या कहें देखभाल की जिम्मेदारी थी, वो क्यों नींद में रहे, यही सवाल जनवाणी उठा रहा है।
मुट्ठी में सिमटे नजर आने वाला नौचंदी मेले का स्वरूप कभी बेहद विस्तृत हुआ करता था। करीब चार दशक पहले मेला स्थल कोतवाली इलाके की यदि बात करें तो यह शाहपीरगेट से शुरू हो जाता था। सड़क के दोनों ओर फड़ लगाकर छोटे दुकानदार कांच के बर्तन बच्चों के खिलौने बेचा करते थे। इसी तर्ज पर गोला कुंआ से शंभूदास गेट तक सड़क के दोनों ओर सड़क पर मेले में आने वाले छोटे दुकानदार फड़ लगाकर सामान बेचा करते थे। हापुड़ रोड पर तिरंगा गेट के सामने से होकर जहां वर्तमान में सिटी हॉस्पिटल है, वहां तक मुस्लिम मार्केट और सड़क के दोनों छोटे दुकानदारों की फड़ सजा करती थीं। जिला पंचायत का जहां वर्तमान में कार्यालय है। यहां भी सड़क के दोनों ओर छोटे दुकानदार फड़ लगाया करते थे।
खजला व नानखताई की दुकानें सजा करती थीं। मेले के भीतर जो लोग घूमने आया करते थे वो जब थक जाया करते थे तो मेले की भीतर सरफराज पार्क में बैठक कर सुस्ताने का काम करते थे। मेले का स्वरूप विशाल होता था। मेला नौचंदी में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों व उनके स्तर तथा मेला स्थल में कब्जों को लेकर मेले का कार्य देख रही सीडीओ नूपुर गोयल से सवाल किया तो उन्होंने बताया कि जो लोग आवंटन पर सवाल उठा रहे थे, शाम होते-होते उन्होंने यूटर्न ले लिया। पटेल मंडप के आयोजनों को लेकर समय की बाध्यता कमेटी का निर्णय है,
हो सकता है कि किसी दौर में रात भर आयोजन होते रहे हों, लेकिन यह निर्णय सामूहिक है। मेला स्थल पर कब्जे की जहां तक बात है तो कुछ वाद कोर्ट में चल रहे हैं। मेला नौचंदी में जहां सर्कस का मैदान वहां अब फैक्ट्री लग गयी है। कमोवेश यही स्थिति जहां नाव चला करती थी, उस कुंड के आसपास की है। कुंड का स्वरूप ही खत्म कर दिया। साल दर साल यह चलता रहा। शंभूदास के गेट से भीतर की तरफ आलू वाले मैदान पर कब्जे करा दिए गए। लोगों ने मेला साइड में घरों की खिड़की व दरवाजे खोल लिए।
डीएम साहब ! जांच करा लो
साल दर साल मेले के खत्म किए जा रहे स्वरूप के कारणों को जानने के नगर निगम कार्यकारिणी के पूर्व पार्षद अब्दुल गफ्फार में डीएम को दिए ज्ञापन में मेला स्थल पर अवैध कब्जों की जांच कर कार्रवाई का आग्रह किया है।

