Saturday, January 24, 2026
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हादसों को न्योता दे रही अफसरों की लापरवाही

  • वितरण क्षेत्र बढ़ रहे, हादसों को रोकने के लिए ट्रेड स्टाफ नहीं
  • विद्युत नियामक आयोग की हिदायतों को लेकर नहीं बरती जा रही गंभीरता

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: विद्युत नियामक आयोग की हिदायतों को लेकर लखनऊ में बैठे उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन के उच्च पदस्थ अफसर गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। नियामक आयोग ने हादसों को रोकने के लिए जो हिदायते जारी हैंं तथा शासन को सिफारिश भेजी हैं। उन पर अमल करने के बजाय केवल वितरण क्षेत्र बढ़ाए जा रहे हैं।

वर्तमान में 25 वितरण क्षेत्रों को बढ़ाकर 40 कर दिया गया है। वितरण क्षेत्रों को बढ़ाने की पैरवी करेन वाले अफसरों पर इस बात का कोई उत्तर नहीं कि वितरण क्षेत्र तो बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन इनको मैनेज व रखरखाव के लिए स्टाफ कितना बढ़ाया गया है।

…तो अफसर अब सीढ़ी लेकर घूमेंगे

उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन प्रशासन ने पिछले दिनों वितरण क्षेत्रों की संख्या 25 से बढ़ाकर 40 कर दी है, लेकिन जितने वितरण क्षेत्र बढ़ाए गए हैं। उनके सापेक्ष्य स्टाफ कितना बढ़ाया गया है, इसको लेकर तस्वीर साफ नहीं है। इसलिए सवाल पूछा जा रहा है कि वितरण क्षेत्र तो बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन स्टाफ बढ़ाए जाने के सवाल पर चुप्पी साध ली गयी है। इसको लेकर राज्य विद्युत परिषद प्राविधिक कर्मचारी संघ उत्तर प्रदेश के पश्चिमांचल महासचिव अभिमन्यु कुमार खासे चिंतित हैं।

आखिर किसको दिया जा रहा है धोखा

राज्य विद्युत परिषद प्राविधिक कर्मचारी संघ उत्तर प्रदेश का मानना है कि उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन में पूर्व में कार्यरत 25 वितरण क्षेत्रों को बढ़ाकर 40 कर दिया गया हैं। प्रत्येक उपभोक्ता जानता है कि उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन का कार्य उत्तर प्रदेश के सभी उपभोक्ताओं का बेहतर निर्बाध विद्युत आपूर्ति करना, विद्युत खर्च की बिलिंग करना, विद्युत दुर्घटनाओं को समाप्त करना, विद्युत आपूर्ति में पैदा व्यवधान को समाप्त करना है, लेकिन विभाग में होने वाले आदेशों और क्रिया कलापों को देखने से ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता कि विभाग को चलाने वाले इसको लेकर गंभीर हैं। इस समय नए वितरण क्षेत्रों के निर्माण से ज्यादा जरूरी अन्य मुद्दे हैं।

फिर नियामक आयोग की हिदायतों का क्या?

वितरण व्यवस्था को सुधारने के नाम पर उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन को चलाने वालों के द्वारा वितरण क्षेत्र बढ़ाए जाने की बात तो समझ में आती है, लेकिन उन हिदायतों का क्या जो विद्युत नियामक आयोग ने नवीनतम मानकों के अनुरूप जारी की है। सुरक्षा व निर्वाध बिजली आपूर्ति समेत कई मुद्दों पर नियामक आयोग ने कारपोरेशन को हिदायतें जारी की हैं:-

  • उपभोक्ताओं की संख्या के अनुसार ही नए विद्युत फीडर बनाए जाए।
  • उपभोक्ताओं की संख्या के अनुसार ही बिजली उपकेंद्र बनाए जाएं।
  • उचित संख्या में लाइन के अनुरक्षण के लिया 24 घंटे मानक संख्या में ट्रेंड लाइन स्टाफ तैनात किया जाए।
  • नियामक आयोग ने हिदायत दी कि स्टाफ की तैनाती में मानकों की अनदेखी न कि जाए। नसीहत भरे अंदाज में नियामक आयोग ने कहा है कि अक्सर कम कर्मचारीयों को ही अपने से दुगने या तिगुने कर्मचारियों का कार्य करना पड़ता हैं।
  • मानकों की बात करने वाले स्टाफ की बात सुनने के बजाए अक्सर उन्हें नौकरी से निकल दिया जाता है। नियामक आयोग ने उसको गलत परंपरा बताया है।
  • अक्सर विरोध करने पर निकाल दिया जायेगा पापी पेट का जो सवाल हैं। इसलिए लाइन स्टाफ कैसे भी बीमार/सोते जागते/ थकान/ मानसिक रूप से परेशान होने की स्थिति में भी कार्य करता हैं। वह आपूर्ति तो चालू कर देता हैं, लेकिन कई बार अपनी जान से हाथ धो बैठता हैं।
  • कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण की पूर्ति विभाग टेंडर के नाम पर ठेकेदार को और ठेकेदार नौकरी के नाम पर कर्मचारियों के मत्थे मढ़ देता हैं, खाना पूर्ति के लिए नाम मात्र के लिए बिजलीघर पर भी रख देता, लेकिन कर्मचारियों को तो अपनी जान खुद बिना उपकरणों के बचानी होती हैं तो वह अक्सर सफल भी जो जाते हैं। कई बार सफल नहीं भी हो पाते हैं। इसकी चिंता ठेकेदार/विभाग को नहीं रहती क्योंकि अक्सर मृतक के घरवालों को लाखों रुपए देने से बचने के लिए ठेकेदार विभागिय अधिकारियों की मदद से ये साबित करने में सफल हो जाता है कि लाइन पर कार्य करने वाला उसके द्वारा नियुक्त नहीं था कोई फर्जी व्यक्ति था।

कुल मिलाकर ये समझ आया की जोन के निर्माण से केवल विभाग के उन अधिकारियों को लाभ हुआ है जिनको परमोशन के लिए कार्य क्षेत्र नहीं थे, संभवत: उनके द्वारा ही अपने निजी लाभ के लिए ही जोन के निर्माण के संदर्भ में तर्क ऊर्जा मंत्री, अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक को दिए गए होंगे। जबकि वास्तविक समस्याओं के लिए कोई प्रस्ताव नहीं दिया जाता होगा। ऐसा संभव भी है, क्योंकि निर्णय लेने वालों की मीटिंग कमेटी में यही उए और रए ही होते हैं। जिनको बस अपना भला कैसे हो से मतलब हैं। जबकि सबसे ज्यादा जरूरत उपर लिखे अन्य स्टाफ और संसाधन को बढ़ाने की है। कर्मचारी विभाग की रीढ़ की हड्डी होता हैं, उसको बढ़ाने की बजाय मुख्य अभियंता के पदों का एडजस्टमेंट समझ से बाहर हैं।

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