Wednesday, June 24, 2026
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एक देश एक चुनाव पर हो सहमति

 

Samvad 9


Laljee Jaswal.jpg 01पांच राज्यों में चुनाव परिणाम की घोषणा के साथ ही एक बार फिर से एक देश एक चुनाव की बात सामने आती दिख रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने एएनआई के साथ एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि चुनाव आयोग पूरी तरह से तैयार है और एक साथ चुनाव कराने में सक्षम है। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के अनुसार, सभी चुनाव एक साथ होने चाहिए। मालूम हो कि पिछले समय में संसदीय समिति ने संसद के दोनों सदनों में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अगर देश में एक चुनाव होता है, तो न केवल इससे सरकारी खजाने पर बोझ कम पड़ेगा बल्कि राजनीतिक दलों का खर्च कम होने के साथ मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग किया जा सकेगा। साथ ही मतदान के प्रति मतदाताओं की जो उदासीनता बढ़ रही है, वह भी कम हो सकेगी।

हालांकि, एक देश एक चुनाव की बात कोई नई नहीं है, क्योंकि वर्ष 1952,1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और राज्य विधानसभा दोनों के चुनाव साथ-साथ हो चुके हैं। लेकिन वर्ष 1967 के बाद कई बार ऐसी घटनाएं सामने आर्इं हैं, जिनमें लोकसभा और राज्य विधानसभा अलग-अलग समय पर भंग होती रही हैं। इसका विशेष कारण अपना विश्वास मत खो देना और गठबंधन का टूट जाना था। लेकिन वन नेशन, वन इलेक्शन आज अपरिहार्य है। वर्ष 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का समर्थन किया था।

लेकिन इसके लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत होगी। क्योंकि यह देखा गया है कि पूर्व में विधानसभाएं समय रहते ही भंग होती रही हैं। जाहिर है कि कई राज्य विधानसभाओं का समय सीमा भी कम करना होगा और कई का समय सीमा बढ़ाना भी पड़ेगा। यही समस्या लोकसभा में भी हो सकता है।

अत: इन तमाम मुश्किलों से निदान पाने के लिए अनुच्छेद 83, 85, 172 और अनुच्छेद 174 में संशोधन के साथ ही लोक प्रतिनिधि कानून में भी बदलाव की जरुरत होगी।

देश एक चुनाव के अनेक फायदे है, जो देश की प्रगति को एक नई दिशा प्रदान करेंगे, क्योंकि बार-बार चुनावों में खर्च होने वाली धन राशि बचेगी, जिसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और जल संकट निवारण आदि ऐसे कार्यों में खर्च कर सकेगें, जिससे लोगो का जीवन स्तर का सुधार संभव हो सकेगा। लोगों के आर्थिक जीवन के साथ सामाजिक जीवन मे सुधार सुनिश्चित हो सकेगा। कई देशों ने विकास को गति देने के लिए एक देश एक चुनाव का फामूर्ला अख्तिआर कर रखा है। जैसे-स्वीडन में पिछले साल आम चुनाव, काउंटी और नगर निगम के चुनाव एकसाथ कराए गए थे। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, स्लोवेनिया, अल्बानिया, पोलैंड, बेल्जियम भी एक बार चुनाव कराने की परंपरा है।

गौरतलब है कि एक साथ चुनाव से आर्थिक बोझ कम होगा, क्योंकि वर्ष 2009 लोकसभा चुनाव में ग्यारह सौ करोड़ वर्ष 2014 में चार हजार करोड़ और वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति बहत्तर रुपये खर्च हुआ था। इसी प्रकार, विधानसभाओं के चुनाव में भी यही स्थिति नजर आती रही है। साथ ही बार-बार चुनाव के कारण आचार संहिताओं से राज्यों को दो चार होना पड़ता है, जिससे सभी विकास कार्य बाधित होते हैं। इससे शिक्षा क्षेत्र भी अत्यधिक प्रभावित होता है और अलग-अलग चुनाव से काले धन का अत्यधिक प्रवाह भी होता है। यदि एक साथ चुनाव होगा तो काले धन के प्रवाह पर निश्चित ही रोक लग सकेगी। साथ ही लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ होने से आपसी सौहार्द बढ़ेगा, क्योंकि चुनाव में बार-बार जाति-धर्म के मुद्दे नहीं उठेंगे और आम आदमियों को भी तमाम परेशानियों से मुक्ति मिल सकेगी।

एक साथ चुनाव से कुछ समस्याओं का सामना भी करना होगा लेकिन सदैव के लिए इससे मुक्ति पाने के बाबत एक देश एक चुनाव जरूरी है। इससे क्षेत्रीय पार्टियों पर संकट आ सकता है और उनके क्षेत्रीय संसाधन सीमित हो सकते हैं, क्षेत्रीय मुद्दे भी खत्म हो सकते हैं और चुनाव परिणाम में देरी भी हो सकती है। साथ ही अतिरिक्त केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की आवश्यकता भी होगी। अत: इनकी भारी संख्या मे नियुक्ति की जरूरत पड़ेगी। एक साथ चुनाव कराने के लिए ईवीएम की पर्याप्त आवश्यकता पड़ेगी, क्योंकि आज वर्तमान समय में बारह से पंद्रह लाख ईवीएम का उपयोग किया जाता है।

लेकिन जब एक साथ चुनाव होंगे तो उसके लिए तीस से बत्तीस लाख ईवीएम की जरूरत होगी। इसके साथ वीवीपैट भी लगाने होंगे। इन सब को पूरा करने के लिए चार से पांच हजार करोड़रुपये की अतिरिक्त आवश्यकता होगी। निश्चित ही पूंजीगत खर्च तो बढ़ेगा ही, क्योंकि एक साथ तीस से बत्तीस लाख ईवीएम की जरूरत को पूरा करना होगा और प्रति तीन बार चुनाव अर्थात पंद्रह साल में इनको बदलना भी होगा, क्योंकि इनका जीवनकाल पंद्रह साल तक ही होता है।

रिपोर्ट के अनुसार, आम चुनाव में राजनीतिक दल लगभग साठ हजार करोड़ रुपए खर्च करते हैं और राज्य विधानसभा चुनाव में भी करीब इतना ही खर्च होता है तो दोनों को मिलाकर 1.20 लाख करोड़ रुपए राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किए जाते हैं। अब जब एक चुनाव से प्रचार भी एक ही बार ही करना होगा इसलिए खर्च घटकर आधा रह जाएगा। निश्चित ही पर्याप्त धन की बचत होगी जो देश कि दशा और दिशा का निर्धारण कर सकेगा और लोंगो को अच्छा जीवन स्तर मिल सकेगा। इसलिए निश्चित ही देश में एक चुनाव को सहमति प्रदान करना देश की प्रगति में चार चांद लगा सकता है।

नतीजन, एक देश एक चुनाव की अवधारणा में कोई बड़ी खामी नहीं दिखती है, किंतु राजनीतिक पार्टियों द्वारा जिस तरह से इसका विरोध किया जाता रहा है, उससे लगता है कि इसे निकट भविष्य लागू कर पाना संभव नहीं हो सकेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हर समय चुनावी चक्रव्यूह में घिरा हुआ नजर आता है। चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिए एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है। लेकिन अब सरकार की प्रतिबद्धता से निश्चित ही यह कार्य संभव हो सकेगा। सरकार का विकासात्मक एजेंडे का ही एक भाग वन नेशन, वन इलेक्शन भी है। वास्तव मे यह देश के हित में भी है। लेकिन इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय बंटी हुई रही है। पिछले साल जब लॉ कमीशन ने इस मसले पर राजनीतिक पार्टियों से सलाह ली थी, तब समाजवादी पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, शिरोमणि अकाली दल जैसी पार्टियों ने ‘एक देश, एक चुनाव’ की सोच का समर्थन किया था।

अत: अब समय आ गया है कि देश के सभी राजनीतिक दलो को एकजुटता के साथ सरकार के एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर चर्चा कर इसे लागू कराने पर अपनी सहमति देनी चाहिए क्योंकि एक देश एक चुनाव राजनीतिक मुद्दा नही अपितु विकास का मुद्दा है, और अब तो चुनाव आयोग ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘एक देश, एक चुनाव’ बाबत पूरी तरह से तैयार है।


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