- मेडिकल प्रशासन जूझ रहा स्टॉफ की कमी से, 1500 है कुल बेडों की संख्या
- रेडियोलॉजी विभाग के पास भी महज चार तकनीशियन
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: सरकारी अस्पताल ऐसे परिवारों के लिए वरदान होते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं होती। इन अस्पतालों में बेहद कम खर्च पर अच्छे इलाज की सुविधाएं उपलब्ध भी है, लेकिन सुविधाओं को मरीजों तक पहुंचाने के लिए जरूरी स्टॉफ की भारी कमी है। मरीजों को चिकित्सा सेवाएं देने के लिए 45 वार्ड हैं, लेकिन इन वार्डों के लिए नर्सिंग स्टॉफ ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है।
मेडिकल कॉलेज की पुरानी बिल्डिंग में 32 वार्ड हैं, जबकि नई बिल्डिंग में छह, चार वार्ड इमरजेंसी में और चार वार्ड अलग से है। इन सभी में करीब 1500 बेड है। एक बेड पर तीन शिफ्टों में नर्सिंग स्टॉफ की ड्यूटी लगती है। यानी एक बेड पर मौजूद मरीज के लिए तीन लोगों की जरूरत है। इस हिसाब से नर्सिंग स्टॉफ की संख्या साढ़े चार हजार होनी चाहिए, लेकिन मेडिकल प्रशासन के पास केवल 100 लोगों का परमानेंट जबकि 350 आउटसोर्सिंग नर्सिंग स्टॉफ है।
सबसे बड़ी परेशानी ये है कि जिस आउटसोर्सिंग नर्सिंग स्टॉफ को रखा जा रहा है, उसे ट्रेनिंग नहीं दी जा रही है। कुछ समय पहले ऐसा ही एक मामला सामने आया था। जब नर्सिंग स्टॉफ इंजेक्शन देने के लिए सीरिंज भी पकड़ने की स्थिति में नहीं था। इसी तरह मरीजों को ड्रिप चढ़ाने के लिए जरूरी कैंडूला कैसे लगाया जाता है? इसको लेकर भी कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर रेडियोलॉजी विभाग में भी एक्स-रे व अल्ट्रासाउंड और एमआरआई कराने के लिए केवल चार तकनीशियन है।
जबकि यहां रोजाना 100 से ज्यादा मरीज पहुंचते हैं। कुल आठ तकनीशियन ही मेडिकल प्रशासन के पास है। मेडिकल में मेरठ ही नहीं बल्कि आसपास के दूसरे जिलों से भी मरीज इलाज के लिए आते हैं, इसके साथ ही यदि कोई बड़ा हादसा हो जाए तो उसमें घायलों को भी मेडिकल में ही इलाज के लिए भर्ती कराया जाता है। ऐसे में यहां जरूरत के मुताबिक नर्सिंग स्टॉफ की नियुक्ति होना जरूरी है।

