Monday, June 1, 2026
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सिर्फ कागजी कवायद, मर रहीं नदियां

  • काली नदी के अस्तित्व पर मंडराया संकट
  • निर्मल तो हो नहीं पाई और हो रही है काली
  • फैक्ट्रियों के पानी से और हो गई दूषित

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: काली नदी के अस्तित्व को बचाने की मुहिम बरसों से की जा रही है, लेकिन इस मुहिम का कई समाजसेवी संस्थाओं ने लाभ भी उठाया है। नदी के सफाई के नाम पर संस्थाओं के वारे-न्यारे हो गये हैं, लेकिन नदी की सफाई अभी तक नहीं हो पाई है। क्षेत्र के कई विधायक काली नदी के मुद्दे को उठा चुके हैं और इसे शासन तक पहुंचा चुके हैं, लेकिन इसका कोई उद्धार नहीं हो पाया।

पिछले वर्ष जिला प्रशासन की ओर से भी नदी की सफाई की गई। गांवड़ी में यहां सफाई कर पौधरोपण भी किया गया, लेकिन यह अभियान बीच में ही छूट गया। यहां गेसूपुर की बात की जाये तो नदी को देखकर ऐसा लगता है कि यहां नदी की सफाई बरसों से नहीं हुई। नदी में नालों का पानी लगातार गिर रहा है, फैक्ट्रियों का पानी समा रहा है। जिससे नदी का अस्तित्व मानों खत्म हो चुका है।

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कोई भी नदी हो उसमें पानी तीन जगहों से ही आता है या तो ग्लेशियर से, भूजल ऊपर आ जाये या फिर आद्र भूमि जहां घने जंगल हों जहां पेड़ों की जड़ों से पानी आये। वही पानी नदियों में बहता है, लेकिन काली नदी के साथ ऐसा कुछ नहीं है। यहां इसके आसपास के इलाकों में पानी का लेवल 100 फीट से भी नीचे जा चुका है। ऐसे में इसे निर्मल करने के लिये प्रशासन और एनजीओ अपनी वाहवाही करा चुके हैं और करोड़ों रुपये खर्च को चुके हैं, लेकिन आज तक इसकी सफाई नहीं हो पाई।

आज की बात करें तो वर्तमान में इस नदी में मात्र तीन जगहों का पानी चलता है। गांव की नालियों का, शहर के नालों का और नदी किनारे बड़ी बड़ी केमिकल फैक्ट्रियों का दूषित पानी ही इसमें बहता है। कहने को यह नदी काली नदी का रूप लिए है, लेकिन यह एक गंदे नाले के सिवा कुछ नहीं है, बल्कि गंदे नाले में केमिकल का दूषित पानी नहीं छोड़ा जाता। बल्कि यह नदी तो केवल दूषित पानी के लिये ही है।

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प्रशासन इसे साफ करने की कोशिश तो करता है, लेकिन इसे साफ करना इतना आसान नहीं है। यह नदी मुजफ्फरनगर से शुरू होती है और वहां से ही इसमें फैक्ट्रियों और नाले का पानी गिरना शुरू हो जाता है। मेरठ की बात करें तो यहां मवाना रोड स्थित देव प्रिया, बोनांजा, अशोका समेत न जाने कितनी बड़ी-बड़ी कंपनियों हैं। जिनका केमिकल युक्त पानी नदी में जाता है, लेकिन इसे रोक पाना मुश्किल है।

मेरठ में तीन बड़े नाले नदी में गिर रहे, नहीं होता पानी ट्रीट

शहर की बात करें तो काली नदी में मल मूत्र ही बहाया जा रहा है। इस नदी की अविरलता और निर्मलता की बड़ी-बड़ी बातें तो खूब हुईं, लेकिन काली की कालिमा दूर नहीं हो सकी। वर्तमान में हालात पहले से भी बदतर बन चुके हैं। मेरठ नगर निगम अंतर्गत तीन बड़े नाले आबूनाला-एक, आबूनाला-दो और ओडियन नाला सीधे काली नदी में गिर रहे हैं। इन नालों के जरिए शहर का सीवेज बिना ट्रीट किए नदी में गिराया जा रहा है।

शहर में प्रतिदिन 300 एमएलडी सीवेज उत्सर्जित होता है। जिसके सापेक्ष 150 एमएलडी सीवेज ही ट्रीटमेंट होता है। शेष सीधे नालों के जरिए काली नदी में बहाया जा रहा है। सीवेज के अलावा शहर की डेढ़ हजार से अधिक डेयरियों का गोबर भी इन्हीं नालों के जरिए बहकर काली नदी में ही समा रहा है। जिससे काली नदी निर्मल होने के बजाय और काली होती जा रही है। हालात ये हैं कि नगर निगम को हर दूसरे महीने काली नदी में पोकलेन मशीन उतारनी पड़ती है। काली में जमा होने वाली सिल्ट को निकाला जाता है।

योजनाएं नहीं चढ़ी परवान

काली नदी की कालिमा दूर करने के लिए 220 एमएलडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट प्रस्तावित है। कमालपुर में 72 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के पास बनना है। नमामि गंगे योजना में स्वीकृत 220 एसटीपी विश्व बैंक की मदद से बनना है। डेढ़ साल हो गए हैं। अभी तक टेंडर तक नहीं हो पाया है।

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जल निगम के अधिकारी हों या फिर नगर निगम के अधिकारी उनके पास शासन को पत्र लिखने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इस एसटीपी के निर्माण से आबूनाला-एक और ओडियन नाला दोनों सीधे काली नदी में गिरने बंद हो जाएंगे। सीवेज ट्रीट होने के बाद बहाया जाएगा। यह जानते हुए भी विभागीय अधिकारी कुछ नहीं कर सकते हैं। क्योंकि योजना को मूर्त रूप देने की कार्रवाई शासन स्तर से होनी है।

एक बार भी नहीं हुई सफाई

गढ़ रोड स्थित गेसूपुर जयभीमनगर निवासी विपिन शर्मा का कहना है कि प्रशासन की ओर से आज तक यहां एक बार भी नदी की सफाई नहीं कराई गई है। यहां सालों से रह रहे हैं। प्रशासन की ओर से गांवड़ी गांव के पास नदी की सफाई कराई गई थी, लेकिन यहां एक बार भी नदी की सफाई नहीं हुई है। नदी में फैक्ट्रियों और नालों का दूषित पानी आ रहा है, लेकिन कोई इसके लिये कुछ नहीं कर रहा है।

हैंडपंपों में आता है लाल पानी

स्थानीय निवासी विशाल कहते हैं कि नदी का पानी तो गंदा है ही, इसके साथ ही आसपास के गांवों में पीने के पानी के भी बुरे हाल हैं। पानी का जलस्तर लगातार घटता जा रहा है। घरों में सबमर्सिबल चल रहे हैं। वह भी हर बार उसकी गहराई बढ़वाते हैं। हैंडपंप का पानी कुछ देर बाद ही लाल हो जाता है और हर साल नलों को रीबोर कराया जाता है। नदी लगातार दूषित हो रही है। जिससे संकट बढ़ता जा रहा है।

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